सत्य निकेतन हादसा तो बस शुरुआत, बीते 5 वर्षों में 33 हजार जिंदगियां निगल गई लापरवाही

दिल्ली के सत्य निकेतन में हालिया इमारत गिरने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है, जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में पिछले पांच वर्षों के दौरान इसी तरह के हादसों में 33 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।

सुरक्षा में चूक और जानलेवा हादसे

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में हाल ही में घटी इमारत गिरने की दर्दनाक घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। इस हादसे ने जहां सात लोगों की जान ले ली, वहीं स्थानीय निवासियों और वहां रह रहे छात्रों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया है। मलबे में तब्दील हुई उस इमारत की गूंज अभी भी लोगों के जेहन में है, जिसके कारण बड़ी संख्या में छात्र अपने पीजी छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की तलाश कर रहे हैं। हालांकि, यह त्रासदी अकेली नहीं है। हालिया सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि देश भर में बुनियादी ढांचे की बदहाली और सुरक्षा नियमों की अनदेखी के चलते पिछले पांच वर्षों में 33 हजार से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है।

पांच साल में 33 हजार मौतों का भयावह आंकड़ा

वर्ष 2020 से 2024 के बीच का समय देश में सार्वजनिक सुरक्षा के लिहाज से बेहद चिंताजनक रहा है। सरकारी रिपोर्टों के मुताबिक, इस अवधि के दौरान इमारतें गिरने, भीषण आग लगने, गहरे गड्ढों या फिर खुले मैनहोल में गिरने जैसी घटनाओं ने लगभग 33,000 लोगों की जान ली है। इनमें से अधिकांश घटनाएं शहरी क्षेत्रों में दर्ज की गई हैं। यह आंकड़े स्पष्ट रूप से इशारा करते हैं कि हमारी शहरी व्यवस्था और सार्वजनिक ढांचे का रख-रखाव किस कदर लचर हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों में सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया गया होता और नियमित निरीक्षण हुआ होता, तो इनमें से अधिकांश मौतों को रोका जा सकता था। गौरतलब है कि 33 हजार की यह संख्या केवल उन मामलों पर आधारित है जो आधिकारिक रिकॉर्ड में दर्ज हैं। नगर निकायों की सीमा के भीतर होने वाले अन्य कई सड़क हादसों और दूषित पानी से जुड़ी समस्याओं का डेटा इसमें शामिल नहीं है, जिसका अर्थ है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कहीं अधिक बड़ा हो सकता है।

क्या टाले जा सकते थे ये हादसे?

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े यह प्रमाणित करते हैं कि देश में प्रतिवर्ष हजारों मौतें ऐसी परिस्थितियों में हो रही हैं जो पूरी तरह से मानव निर्मित आपदाएं हैं। खराब रखरखाव और असुरक्षित निर्माण कार्य इन मौतों के मुख्य कारण हैं। दिल्ली के अलावा गुड़गांव जैसे विकसित शहरों के कुछ इलाकों में भी जलभराव और कचरे के बड़े ढेरों का जमा होना इस बात का प्रमाण है कि म्युनिसिपल गवर्नेंस यानी नगर निगम प्रशासन की कार्यक्षमता में बड़ी गिरावट आई है। सुरक्षा नियमों की अनदेखी और भ्रष्टाचार के कारण जर्जर इमारतों में निर्माण कार्य जारी रहता है, जो अंततः बड़े हादसों को न्योता देता है।

सत्य निकेतन की दुखद घटना का विश्लेषण

सत्य निकेतन में रविवार को जो हुआ, वह लापरवाही की पराकाष्ठा है। वहां पांच मंजिला इमारत, जिसकी उम्र करीब 50 साल बताई जा रही है, देखते ही देखते ताश के पत्तों की तरह ढह गई। इस इमारत का उपयोग छात्रों के पीजी के तौर पर किया जा रहा था। बचाव दल को मलबे से लोगों को बाहर निकालने के लिए लगभग 27 घंटे तक कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। इस हादसे में 7 लोगों की मौत हुई और 5 अन्य घायल हुए। प्रारंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि इमारत की नींव पहले से ही कमजोर थी और बेसमेंट में पानी भरने व चल रहे मरम्मत कार्य ने इसके ढहने की प्रक्रिया को और तेज कर दिया। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में तत्परता दिखाते हुए इमारत के मालिक परिवार के 3 सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या ऐसे हादसों को रोकने के लिए प्रशासन कोई दीर्घकालिक योजना बनाएगा।

https://hindi.news18.com/news/nation/33000-deaths-in-5-years-in-building-collapse-fire-manhole-accidents-in-india-10818233.html