सत्य निकेतन हादसा: बेहतर भविष्य की तलाश में दिल्ली आए बच्चों के सपने मलबे में दफन, परिवारों का टूटा भरोसा

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में एक इमारत गिरने के हादसे ने सात परिवारों की खुशियां छीन लीं। माता-पिता ने अपने बच्चों को ऊंचे सपनों के साथ राजधानी भेजा था, लेकिन अब वे अपने कलेजे के टुकड़ों को खोकर गहरे सदमे में हैं।

सत्य निकेतन त्रासदी: उम्मीदों का ढहना

दिल्ली का सत्य निकेतन इलाका, जहां अक्सर युवा छात्रों की चहल-पहल रहती है, रविवार को एक ऐसी त्रासदी का गवाह बना जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। एक पांच मंजिला पीजी इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई। इस हादसे में कुल सात लोगों की जान चली गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा, अच्छे कॉलेज और एक उज्ज्वल करियर की आस में दिल्ली भेजा था, आज वे इस स्थिति में हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे क्या कहें। राजधानी की चकाचौंध के बीच सपनों को हकीकत में बदलने आए ये छात्र अब केवल यादों और मलबे की फाइलों में सिमट कर रह गए हैं।

भूपेंद्र जाज का दर्द और संघर्ष

मध्य प्रदेश के देवास के रहने वाले भूपेंद्र जाज के लिए यह हादसा किसी वज्रपात से कम नहीं है। उन्होंने अपने बेटे अंकित को एक होनहार इंसान बनाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। उनके लिए दिल्ली महज एक शहर नहीं, बल्कि उनके बेटे के सुनहरे भविष्य की गारंटी थी। लेकिन रविवार का दिन उनके लिए जिंदगी भर का अंधकार लेकर आया। अंकित की इस मलबे में मौत हो गई। भूपेंद्र ने बताया कि उन्हें इस दुखद घटना की जानकारी एक फोन कॉल से मिली। अंकित के एक दोस्त ने कॉल करके पूछा कि अंकित कहां है और चेतावनी दी कि यदि वह अभी दिल्ली में है तो उस इलाके से दूर रहे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था, क्योंकि अंकित तब तक उस इमारत में पहुंच चुका था।

व्यवस्था से जूझते बेबस पिता

भूपेंद्र का आरोप है कि घटना के बाद उन्हें अपने बेटे के बारे में जानकारी जुटाने के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ी। उन्होंने बताया कि प्रशासन की ओर से परिवार को सही और स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। उन्हें केवल कुछ तस्वीरें दिखाई गईं, जबकि वहां मलबे के नीचे कई और शव दबे हुए थे। एक पिता के लिए इससे अधिक पीड़ादायक और क्या हो सकता है कि उसने जिस बेटे को हजारों किलोमीटर दूर सुरक्षित भविष्य के लिए भेजा, उसके अंतिम दर्शन के लिए भी उसे सरकारी व्यवस्थाओं के सामने बेबस होना पड़ा। अब यह परिवार इस पूरी घटना की गहन और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है।

अंकित का मरणोपरांत नेक काम

इतने गहरे सदमे के बीच भी अंकित के परिवार ने मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश की है। डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि अंकित की एक आंख मलबे में दबने की वजह से गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गई थी, लेकिन दूसरी आंख पूरी तरह सुरक्षित है और उसका दान किया जा सकता है। अंकित के पिता भूपेंद्र ने बिना किसी संकोच के तुरंत नेत्रदान की सहमति दे दी। भूपेंद्र का मानना है कि यदि उनके बेटे की आंख किसी जरूरतमंद की जिंदगी में रोशनी ला सके, तो इससे बड़ी श्रद्धांजलि उसके लिए कुछ और नहीं हो सकती।

दादी-दादा और टूटती उम्मीदें

अंकित के दादा माखनलाल जाज का दर्द शब्दों से परे है। उनके लिए अंकित सिर्फ एक पोता नहीं, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदों का स्तंभ था। माखनलाल ने प्रशासन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि इलाके की ऐसी जर्जर इमारतों को बहुत पहले ही खाली करा लिया जाना चाहिए था। उन्होंने रोते हुए कहा कि अब उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं बचा है। उनकी सारी आशाएं और सपने उसी अंकित पर टिके थे, जिसे अब वे कभी वापस नहीं देख पाएंगे।

आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझता नीरज

सत्य निकेतन का यह हादसा सिर्फ उन सात परिवारों तक सीमित नहीं है जिन्होंने अपनों को खोया है, बल्कि उन परिवारों के लिए भी खौफ का सबब बन गया है जिनके बच्चे अभी अस्पताल में भर्ती हैं। जम्मू के रहने वाले 19 वर्षीय नीरज बावा का उदाहरण लें। नीरज दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में दूसरे वर्ष का छात्र है। वह अच्छे कॉलेज की पढ़ाई के लिए दिल्ली आया था, लेकिन अब वह आईसीयू में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा है। हादसे में उसके शरीर के निचले हिस्से में गंभीर चोटें आई हैं।

मीडिया से मिली हादसे की खबर

नीरज के रिश्तेदार अशोक कुमार के अनुसार, उन्हें किसी अधिकारी ने इस हादसे की सूचना नहीं दी, बल्कि उन्हें इसकी खबर मीडिया के माध्यम से मिली। नीरज के पिता भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हैं। जब उन्होंने टेलीविजन पर इमारत गिरने की खबर देखी, तो शुरू में उन्हें लगा ही नहीं कि इसका कोई संबंध नीरज से हो सकता है। लेकिन जब उन्हें ध्यान आया कि उनका बेटा भी उसी सत्य निकेतन क्षेत्र के एक पीजी में रहता है, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। आनन-फानन में परिवार ने टैक्सी की और जम्मू से दिल्ली के लिए निकल पड़ा।

भरोसे का शहर या मौत का जाल?

नीरज की मां सीमा चिब ने बताया कि उनकी बेटी भी दिल्ली आकर पढ़ाई करने की योजना बना रही थी। लेकिन इस घटना के बाद उसने अपना फैसला बदल दिया है। यह एक ऐसी त्रासदी है जिसने न केवल एक परिवार से उनका बेटा छीना है, बल्कि माता-पिता का दिल्ली जैसे शहरों पर से भरोसा भी कम कर दिया है। अब वे अपने बच्चों को दूर भेजने से पहले हजार बार सोच रहे हैं। यह घटना एक कड़वी सच्चाई सामने लाती है कि दिल्ली में पढ़ाई के नाम पर चलने वाले कई पीजी और इमारतें कितनी असुरक्षित हैं।

27 घंटे का लंबा रेस्क्यू ऑपरेशन

सत्य निकेतन की पांच मंजिला इमारत के मलबे से लोगों को बाहर निकालने के लिए प्रशासन द्वारा 27 घंटे तक अथक बचाव अभियान चलाया गया। सोमवार शाम तक चला यह रेस्क्यू ऑपरेशन जब खत्म हुआ, तो मलबे से केवल सीमेंट और कंक्रीट ही नहीं निकला, बल्कि कई परिवारों के भविष्य और अरमान भी बाहर आए। किसी ने अपना बेटा खो दिया, तो किसी ने अपना भाई। ये वे युवा थे जो अपने घर के चराग थे और अपने परिवारों के लिए रोशन भविष्य की उम्मीद जगाए हुए थे। अब इन परिवारों के लिए दिल्ली सिर्फ अवसरों का शहर नहीं, बल्कि एक डरावना अनुभव बन गया है। वे आज केवल एक ही सवाल पूछ रहे हैं- क्या बेहतर शिक्षा पाने की कीमत अपने बच्चों की सुरक्षा और जान से चुकानी होगी?

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