पहाड़ों पर छाई नीली चादर
अगर आपको प्रकृति के अनोखे नजारों और पर्वतीय क्षेत्रों में खिलने वाले फूलों से लगाव है, तो यह खबर आपका मन मोह लेगी। पूरे 12 साल के लंबे इंतजार के बाद, केरल के मुन्नार की चोटियां नीलकुरिंजी के अद्भुत फूलों से आच्छादित हो गई हैं। वर्तमान में पश्चिमी घाट का यह पूरा इलाका नीले और बैंगनी रंग की एक सजीव पेंटिंग जैसा प्रतीत हो रहा है। नीलकुरिंजी के फूलों का खिलना एक दुर्लभ घटना मानी जाती है क्योंकि ये बारह साल में केवल एक बार ही अपनी छटा बिखेरते हैं। इस बार के खिले हुए फूलों ने मुन्नार के प्राकृतिक सौंदर्य को कई गुना बढ़ा दिया है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक उमड़ रहे हैं। आखिर इन फूलों की क्या विशेषता है और ये इतने लंबे अंतराल के बाद ही क्यों दिखाई देते हैं, आइए इसके पीछे के वैज्ञानिक और प्राकृतिक कारणों को जानते हैं।
क्या है नीलकुरिंजी का अर्थ
नीलकुरिंजी शब्द का अर्थ इसके रंग और रूप से गहराई से जुड़ा है। स्थानीय भाषा में 'नीला' का अर्थ रंग से है और 'कुरिंजी' का तात्पर्य फूल से होता है। इस प्रकार नीलकुरिंजी का शाब्दिक अर्थ ही नीले फूलों वाला पौधा है। जब ये फूल बड़ी संख्या में एक साथ खिलते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पहाड़ों पर नीले और बैंगनी रंग का कालीन बिछा दिया गया हो। यह पौधा वर्षों तक साधारण झाड़ी जैसा दिखाई देता है और लोगों का ध्यान अपनी ओर नहीं खींचता, लेकिन जब यह खिलता है, तो पूरा परिदृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला हो जाता है।
फूलों के खिलने का चक्र
नीलकुरिंजी के 12 साल में एक बार खिलने के पीछे एक दिलचस्प प्राकृतिक जीवनचक्र है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में प्लीटीएसियल या सामूहिक पुष्पन चक्र कहा जाता है। इस जीवनचक्र के दौरान, पौधे लंबे समय तक केवल अपनी वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करते हैं और 12वें साल में वे सामूहिक रूप से फूल और बीज पैदा करने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। एक साथ बड़ी संख्या में फूल खिलने के बाद पौधे मुरझाने लगते हैं और अपने बीज मिट्टी में छोड़ देते हैं। ये बीज अगली बार खिलने का समय आने तक मिट्टी में सुप्त अवस्था में सुरक्षित रहते हैं।
नीलगिरि पर्वत का नामकरण
जब ये फूल पूरे परवान पर होते हैं, तो पहाड़ियों की ढलानों पर नीले-बैंगनी रंग का घना आवरण छा जाता है। यह नजारा इतना जादुई होता है कि दूर-दूर तक केवल नीला रंग ही दिखाई देता है। माना जाता है कि नीलगिरि पर्वत श्रृंखला का नाम भी इन्हीं नीलकुरिंजी के फूलों के कारण पड़ा है, जिसका अर्थ ही नीले पहाड़ होता है।
कहां देख सकते हैं ये फूल
ये दुर्लभ फूल मुख्य रूप से 1,300 से 2,400 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में उगते हैं। भारत में इनकी मौजूदगी केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक के ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में दर्ज की गई है। केरल के इडुक्की जिले में स्थित मुन्नार इन फूलों को देखने के लिए सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध स्थान है। विशेष रूप से एराविकुलम नेशनल पार्क और मट्टुपेट्टी के आसपास के इलाकों में इनका सौंदर्य देखते ही बनता है। आमतौर पर ये फूल सितंबर और अक्टूबर के महीनों के दौरान ही अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
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