नरेंद्र मोदी का करिश्मा और युवा राजनीति
श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स यानी एसआरसीसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए संबोधन ने देश की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या प्रधानमंत्री का राजनीतिक आकर्षण और करिश्मा एक बार फिर पूरी मजबूती के साथ वापस लौट आया है। भारतीय जनता पार्टी के लिए पिछले कुछ महीनों का समय चुनौतियों भरा रहा है, विशेष रूप से युवाओं के बीच पैठ बनाने और संगठन स्तर पर मौजूद कुछ खामियों को लेकर। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी का कोर वोटर अभी भी पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा है। इन तमाम पहलुओं पर कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में गहन मंथन किया गया कि क्या प्रधानमंत्री का मोजो वापस आ गया है।
12 वर्षों का शासन और जनता की उम्मीदें
चर्चा के दौरान यह मुख्य बिंदु उभरकर सामने आया कि वर्ष 2013 और आज के दौर में जमीन-आसमान का अंतर है। उस समय नरेंद्र मोदी केंद्र की सत्ता से बाहर थे, जबकि आज उनके पास शासन के 12 वर्षों का लंबा अनुभव है। जनता अब उनके भाषणों को केवल वादों के चश्मे से नहीं, बल्कि उनके द्वारा पिछले एक दशक में किए गए कार्यों और विकास के दावों की कसौटी पर परखती है। यह स्थिति उनकी राजनीति के लिए एक नई परीक्षा की तरह है जहां उन्हें अपने विजन और ट्रैक रिकॉर्ड दोनों पर खरा उतरना होता है।
युवाओं को जोड़ने की नई रणनीति
पिछले कुछ समय से बीजेपी और केंद्र सरकार के सामने युवाओं की नाराजगी और उनके साथ बढ़ते संवादहीनता के अंतर को पाटने की एक बड़ी चुनौती देखी गई है। इसी दिशा में प्रधानमंत्री ने अब युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करने की कवायद शुरू की है। जंतर मंतर पर मौजूदगी से लेकर सोशल मीडिया के जरिए युवाओं तक पहुंचने और सीधे अपील करने की तकनीक इसी रणनीति का अहम हिस्सा मानी जा रही है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्रियों और कार्यकर्ताओं को भी युवाओं के साथ जुड़ाव बढ़ाने के स्पष्ट निर्देश दिए हैं। एसआरसीसी में छात्रों की प्रतिक्रिया को प्रधानमंत्री की इस नई युवा केंद्रित रणनीति की पहली बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। वडोदरा के उदाहरण का उल्लेख करते हुए बताया गया कि वहां आयोजित कार्यक्रम में ऑनलाइन पोर्टल के जरिए एक घंटे के भीतर सभी सीटें भर गईं और बड़ी संख्या में लोग वेटिंग लिस्ट में थे, जो युवाओं में बढ़ते उत्साह का प्रमाण है।
उत्तर प्रदेश का चुनावी दंगल और असली अग्निपरीक्षा
कार्यक्रम में इस बात पर सर्वसम्मति दिखी कि दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव भले ही कुछ संकेत देते हों, लेकिन बीजेपी के लिए असली लिटमस टेस्ट उत्तर प्रदेश का चुनाव होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं उत्तर प्रदेश से लोकसभा सांसद हैं, इसलिए वहां का चुनावी परिणाम पूरे देश की राजनीति पर असर डालता है। यहां योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री मोदी, दोनों के राजनीतिक प्रभाव की बड़ी परीक्षा होनी है। चर्चा में यह भी स्वीकार किया गया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता में कोई बड़ी गिरावट नहीं आई है, लेकिन पार्टी को लेकर कार्यकर्ताओं और जनता में जो पहले जैसा उत्साह देखने को मिलता था, उसमें थोड़ी कमी जरूर महसूस हो रही है। लोग यह तो मानते हैं कि बीजेपी जीत सकती है, लेकिन उस जीत को लेकर पहले जैसी आक्रामकता अब नजर नहीं आती।
संगठन की मुश्किलें और सत्ता का अहंकार
लंबी सत्ता के बाद किसी भी पार्टी के भीतर आने वाले बदलावों पर भी चर्चा हुई। नेताओं द्वारा परिवारवाद को बढ़ावा देने, टिकट बंटवारे को लेकर कार्यकर्ताओं में पैदा हुई आशंकाओं और नेतृत्व व जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरियों को पार्टी के लिए चिंता का विषय बताया गया। एक लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण नेताओं और कार्यकर्ताओं में सेंस ऑफ एंटाइटलमेंट यानी अधिकार की भावना घर कर गई है। उत्तर प्रदेश में नौकरशाही और संगठन के बीच जो कथित गठजोड़ बना है, वह भी पार्टी के लिए एक बड़ी बाधा बनकर उभरा है। हालांकि, चर्चा का एक पहलू यह भी था कि विपक्ष में अभी भी कोई ऐसा मजबूत विकल्प मौजूद नहीं है जो बीजेपी के कोर वोटर को अपनी ओर खींच सके, विशेषकर समाजवादी पार्टी को लेकर बीजेपी के पारंपरिक मतदाताओं में अभी भी हिचकिचाहट बरकरार है।
राहुल गांधी और अखिलेश यादव की सियासी बिसात
कांग्रेस के राहुल गांधी की राजनीति पर बात करते हुए उनके दलित और ओबीसी केंद्रित एजेंडे पर चर्चा की गई। जातिगत जनगणना, आरक्षण की सीमा और जितनी आबादी उतना हक जैसे नारे उनकी रणनीति के केंद्र में हैं। दूसरी ओर, अखिलेश यादव का पूरा ध्यान पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति को साधने पर है। वे जाट, गैर-जाट और मुस्लिम वोटों के समीकरण को जोड़कर बीजेपी को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। चर्चा में यह भी कहा गया कि जयंत चौधरी पर की गई हालिया टिप्पणियां अनावश्यक थीं और इनसे राजनीतिक नुकसान ही हुआ।
योगी आदित्यनाथ और यूपी का बदलता मिजाज
अंत में यह प्रश्न सामने आया कि क्या योगी आदित्यनाथ का ग्राफ गिर रहा है। मेहमानों ने स्पष्ट किया कि बीजेपी के खिलाफ नाराजगी होने के बावजूद मुख्यमंत्री योगी की स्थिति अभी भी काफी मजबूत है। कई लोगों के बीच तो उन्हें बीजेपी के भीतर ही एक बड़े विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। ब्राह्मण और राजपूत समुदायों की नाराजगी के कयासों पर कहा गया कि नाराजगी के बावजूद यह वर्ग अभी भी बीजेपी से पूरी तरह अलग नहीं हुआ है। कुल मिलाकर, कॉफी पर कुरुक्षेत्र की इस चर्चा का निष्कर्ष यही निकला कि एसआरसीसी का रिस्पॉन्स मोदी के लिए एक संजीवनी जैसा है, लेकिन इसका अंतिम फैसला तो उत्तर प्रदेश की जनता ही करेगी। चुनाव परिणाम ही तय करेंगे कि प्रधानमंत्री का करिश्मा और योगी का प्रभाव किस हद तक कायम है और बीजेपी विरोधी नाराजगी कितनी वोट में बदलती है।
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