अंबाला की बेटी का सेना में कमाल, दादा और पिता की गौरवशाली परंपरा को लेफ्टिनेंट बनकर बढ़ाया आगे

हरियाणा के अंबाला की रहने वाली सिमरनजीत कौर चहल ने लेफ्टिनेंट बनकर अपने परिवार की सैन्य विरासत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। घर लौटने पर ग्रामीणों ने ढोल-नगाड़ों के साथ बेटी का ऐतिहासिक स्वागत किया।

सेना की वर्दी में सिमरनजीत की गौरवमयी उपलब्धि

अंबाला के सिरसगढ़ गांव में इन दिनों जश्न का माहौल है। इस गांव की बेटी सिमरनजीत कौर चहल ने भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति पाकर न केवल अपने परिवार का बल्कि पूरे इलाके का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। सेना में चयन होने के बाद जब वह पहली बार अपने पैतृक गांव पहुंचीं, तो ग्रामीणों ने उनका स्वागत किसी वीरांगना की तरह किया। पूरे गांव ने मिलकर सिमरनजीत का इतना भव्य अभिनंदन किया कि यह दिन यादगार बन गया। गांव के लोग एक किलोमीटर पहले से ही उनका स्वागत करने के लिए पहुंच गए थे और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच उन्हें काफिले के साथ गांव तक लाया गया।

शादी से भी बड़ा है यह जश्न

सिमरनजीत के पिता कैप्टन अरविंदर सिंह ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए बताया कि उन्हें यह उपलब्धि किसी बड़े उत्सव से भी ज्यादा महत्वपूर्ण लग रही है। उन्होंने कहा कि उनके घर का माहौल बिल्कुल वैसा ही है जैसा किसी शादी के दौरान होता है, लेकिन बेटी के लेफ्टिनेंट बनने की खुशी कहीं अधिक है। उनके घर पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जहां आसपास के सभी लोगों ने सिमरनजीत को उनकी सफलता के लिए बधाई दी। परिवार के लिए यह केवल एक करियर की सफलता नहीं, बल्कि उस परंपरा का विस्तार है जिसे दशकों पहले उनके पूर्वजों ने शुरू किया था।

तीन पीढ़ियों का सेना से अटूट नाता

सिमरनजीत कौर चहल के परिवार का भारतीय सेना के साथ रिश्ता बेहद पुराना और गहरा है। उनके दादा गनर गुरदयाल सिंह ने 13 फील्ड रेजिमेंट में देश की सेवा की थी। इसके बाद उनके पिता कैप्टन अरविंदर सिंह ने 193 मेड रेजिमेंट में अपनी सेवाएं दीं। अब परिवार की अगली पीढ़ी के रूप में सिमरनजीत ने वर्दी पहनकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। खास बात यह है कि उनके भाई अंशदीप सिंह भी वर्तमान में सेना की 18 सिख रेजिमेंट में तैनात हैं। एक ही परिवार के दादा, पिता, भाई और अब बेटी का सेना से जुड़ना एक मिसाल पेश करता है।

शिक्षा का सफर और एनडीए तक का रास्ता

सिमरनजीत की शैक्षिक यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा बराड़ा के एंजल पब्लिक स्कूल में हुई। इसके बाद उन्होंने अंबाला छावनी के एसडी कॉलेज से बीसीए की पढ़ाई पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का रुख किया, जहां से उन्होंने एमसीए की डिग्री प्राप्त की। उनकी मां सुखविंदर कौर, जो एक पूर्व शिक्षिका रही हैं, ने हमेशा उन्हें हर क्षेत्र में प्रोत्साहित किया। तकनीकी शिक्षा में निपुण होने के बावजूद सिमरनजीत का लक्ष्य हमेशा से सेना ही था। अंततः एनडीए से प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनका वर्षों पुराना सपना हकीकत में बदल गया।

बचपन से थी वर्दी पहनने की चाहत

लेफ्टिनेंट सिमरनजीत कौर ने साझा किया कि बचपन से ही अपने दादा और पिता को वर्दी में देखकर उनके मन में सेना में जाने का विचार पनपने लगा था। कॉलेज के दिनों में उन्होंने एनसीसी से जुड़कर अपनी तैयारी को और मजबूत किया। उन्होंने बताया कि उनसे करीब तीन साल छोटे उनके भाई अंशदीप को सेना में वर्दी पहने देखकर उनका हौसला और अधिक बढ़ गया था। भाई को देश सेवा करते देख उन्हें यह विश्वास हो गया कि वह भी भारतीय सेना का हिस्सा बनकर अपना योगदान दे सकती हैं।

युवाओं के लिए एक प्रेरणा

अपनी इस सफलता पर सिमरनजीत ने देश के युवाओं को संदेश दिया कि बड़े सपने देखना और खुद पर भरोसा रखना सफलता की कुंजी है। उन्होंने जोर दिया कि यदि मेहनत के साथ दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी लक्ष्य हासिल करना मुश्किल नहीं है। सिमरनजीत के पिता कैप्टन अरविंदर सिंह ने कहा कि देशभक्ति उनके परिवार के संस्कारों में बसी है। जहां उन्होंने स्वयं और उनके बेटे ने देश की रक्षा की है, वहीं अब उनकी बेटी का लेफ्टिनेंट बनकर सामने आना परिवार के लिए गौरव का नया अध्याय है। गांव के लोगों के बीच सिमरनजीत की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत बन गई है।

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