अदालत का बड़ा फैसला
देहरादून स्थित सीबीआई की विशेष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण को फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पासपोर्ट बनवाने के आरोपों से मुक्त कर दिया है। तृतीय अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने सुनवाई पूरी होने के बाद आचार्य बालकृष्ण को मामले में नामजद सभी आरोपों और धाराओं से बरी करने का आदेश दिया। यह कानूनी मामला पिछले लगभग डेढ़ दशक से अदालती गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ था।
क्या था पूरा मामला
आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ विवाद की शुरुआत वर्ष 2011 में हुई थी। उस दौरान यह गंभीर शिकायत सामने आई थी कि उन्होंने नेपाल का नागरिक होने के बावजूद फर्जी दस्तावेजों की मदद से भारतीय पासपोर्ट हासिल किया है। इस प्रकरण ने तब काफी सुर्खियां बटोरी थीं। मामले की गंभीरता को देखते हुए सीबीआई ने वर्ष 2016 में नेपाल सरकार के साथ इस संबंध में पत्राचार भी किया था। जांच एजेंसी ने आचार्य बालकृष्ण के अलावा शिक्षण संस्थान के पूर्व प्रिंसिपल नरेश चंद द्विवेदी के खिलाफ भी जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप में चार्जशीट दाखिल की थी।
कानूनी लड़ाई की समयरेखा
आचार्य बालकृष्ण से जुड़े इस पूरे कानूनी घटनाक्रम का सफर काफी लंबा रहा है, जिसका विवरण इस प्रकार है:
- 2011 में केस का आगाज: अप्रैल 2011 में मिली शिकायत के आधार पर सीबीआई ने जून में प्रारंभिक जांच शुरू की और जुलाई 2011 में आधिकारिक तौर पर प्राथमिकी दर्ज की गई।
- फर्जी डिग्री का आरोप: सीबीआई का यह मुख्य दावा था कि बरेली के पासपोर्ट कार्यालय में पासपोर्ट के लिए जो शैक्षणिक दस्तावेज जमा किए गए थे, वे पूरी तरह से फर्जी थे।
- खुर्जा के कॉलेज से संबंध: इन विवादित दस्तावेजों का संबंध उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के खुर्जा स्थित राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय से बताया गया था। यह संस्थान वाराणसी के सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से जुड़ा हुआ था। जांच एजेंसी ने शुरुआत में इन प्रमाणपत्रों की सत्यता पर सवाल उठाए थे।
- आरोपपत्र की धाराएं: सीबीआई द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी में आपराधिक साजिश की धारा 120-B, धोखाधड़ी की धारा 420, दस्तावेज में हेराफेरी की धारा 468 व 471, और पासपोर्ट अधिनियम की संबंधित धाराएं शामिल थीं।
- गिरफ्तारी पर रोक: जुलाई 2011 में मामला तूल पकड़ने पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उनकी गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक लगाई और उन्हें अपना पासपोर्ट अदालत में जमा करने का आदेश दिया।
- गिरफ्तारी और जेल: जुलाई 2012 में सीबीआई ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। अदालत में पेश न होने पर गैर-जमानती वारंट जारी होने के बाद 20 जुलाई 2012 को आचार्य बालकृष्ण को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें देहरादून की सुद्धोवाला जेल भेजा गया, जहां वे करीब एक महीने तक रहे। अगस्त 2012 में उन्हें उच्च न्यायालय से सशर्त जमानत मिली।
- आरोपों का संशोधन: अक्टूबर 2013 में अदालत ने आरोप तय किए, जिन्हें बाद में चुनौती दी गई। अगस्त 2014 में सत्र अदालत के आदेशानुसार आरोपों को संशोधित किया गया और मामला धारा 471 तथा पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12(1)(B) पर केंद्रित हो गया।
- पासपोर्ट की वापसी: कानूनी कार्यवाही के बीच, वर्ष 2018 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उन्हें अपना पासपोर्ट वापस लेने और उसे रीन्यू करवाने की अनुमति प्रदान कर दी थी।
https://www.indiatv.in/india/national/acharya-balkrishna-acquitted-in-case-obtaining-passport-using-fake-documents-dehradun-cbi-court-decision-2026-09-07-1241822