कम उम्र में क्यों घिसने लग रहे हैं घुटने? जानिए किस गलती से खराब होता है कार्टिलेज और क्या जवानी में नी-रिप्लेसमेंट कराना है सही फैसला

आजकल 30 से 40 साल की उम्र में ही लोगों के घुटने खराब होने लगे हैं। फरीदाबाद की ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ डॉ. अनन्या शर्मा से जानिए घुटनों के कार्टिलेज खराब होने के मुख्य कारण, शुरुआती लक्षण और बचाव के उपाय।

एक दौर था जब घुटनों का दर्द और जोड़ों की समस्याएं केवल बुढ़ापे की निशानी मानी जाती थीं। बुजुर्गों को सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत होना या उठने-बैठने में तकलीफ होना आम बात थी। लेकिन आज के समय में यह स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आजकल 30 से 40 साल की उम्र के युवा भी घुटनों के गंभीर दर्द, अकड़न और जोड़ों के घिसने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। युवाओं में तेजी से बढ़ती इस समस्या ने चिकित्सा जगत और आम लोगों के बीच एक बड़ी चिंता पैदा कर दी है। आखिर इतनी कम उम्र में हमारे घुटने क्यों जवाब देने लगे हैं? कार्टिलेज के घिसने के पीछे कौन सी गलतियां जिम्मेदार हैं? और क्या इतनी छोटी उम्र में घुटना बदलवाना यानी जॉइंट रिप्लेसमेंट कराना एक सही फैसला है? इन तमाम महत्वपूर्ण सवालों के जवाब फरीदाबाद के अमृता हॉस्पिटल की सुप्रसिद्ध विशेषज्ञ ने विस्तार से साझा किए हैं।

घुटनों के जल्दी खराब होने की मुख्य वजहें

फरीदाबाद स्थित अमृता हॉस्पिटल में ऑर्थोपेडिक्स एवं जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग की कंसलटेंट डॉ. अनन्या शर्मा बताती हैं कि सामान्य परिस्थितियों में घुटने घिसने की प्रक्रिया 60 से 65 साल की उम्र के बाद शुरू होती है। यह एक प्राकृतिक बदलाव है जो उम्र के साथ आता है। लेकिन आजकल युवाओं में भी यह समस्या बहुत तेजी से पैर पसार रही है। इसके पीछे कई गंभीर कारण और जीवनशैली से जुड़ी गलतियां जिम्मेदार हैं।

डॉक्टर के अनुसार, कम उम्र में घुटनों के कार्टिलेज खराब होने के सबसे बड़े कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • मोटापा और अत्यधिक वजन: आजकल की सुस्त जीवनशैली और खान-पान की गलत आदतों के कारण युवाओं में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। शरीर का अत्यधिक वजन सीधे तौर पर हमारे घुटनों पर दबाव डालता है, जिससे कार्टिलेज समय से पहले ही घिसने लगता है।
  • पुरानी चोट को नजरअंदाज करना: खेलकूद, दुर्घटना या किसी अन्य वजह से घुटने में लगी पुरानी चोट को अक्सर लोग मामूली समझकर छोड़ देते हैं। यही पुरानी चोट आगे चलकर घुटनों के घिसने का सबसे मुख्य कारण बनती है।
  • जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां: कम उम्र में ही डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों का शिकार होना भी जोड़ों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।
  • कार्टिलेज पर लगातार दबाव: जोड़ों के बीच मौजूद कार्टिलेज एक कुशन की तरह काम करता है। जब इस पर जरूरत से ज्यादा और लगातार दबाव पड़ता है, तो यह धीरे-धीरे नष्ट होने लगता है।

इन शुरुआती लक्षणों को कभी न करें नजरअंदाज

डॉ. अनन्या शर्मा का कहना है कि घुटनों की समस्या अचानक से गंभीर रूप नहीं लेती, बल्कि शरीर इसके शुरुआती संकेत काफी पहले से देने लगता है। अक्सर लोग इन लक्षणों को सामान्य थकान या मोच समझकर टाल देते हैं, जो बाद में बड़ी परेशानी का कारण बनता है।

यदि आपको नीचे दिए गए लक्षणों में से कोई भी संकेत महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए:

  • आवाज के साथ दर्द होना: घुटनों से कट-कट की आवाज आना सामान्य हो सकता है, लेकिन अगर इस आवाज के साथ आपको दर्द या चुभन महसूस हो रही है, तो यह गंभीर समस्या का संकेत है।
  • सीढ़ियां चढ़ने-उतरने में तकलीफ: अगर आपको सीढ़ियां चढ़ते या उतरते समय घुटनों में तेज दर्द या कमजोरी महसूस होती है, तो इसे बिल्कुल भी हल्के में न लें।
  • जमीन पर बैठने में कठिनाई: यदि आपको जमीन पर पालथी मारकर बैठने या नीचे बैठने के बाद उठने में बहुत अधिक कठिनाई और दर्द का सामना करना पड़ रहा है।
  • सुबह के समय जोड़ों में अकड़न: सोकर उठने के बाद यदि घुटनों में कड़ापन या अकड़न महसूस होती है और कुछ देर चलने के बाद ही पैर सामान्य हो पाते हैं, तो यह जोड़ों के घिसने की शुरुआत हो सकती है।

बचाव के लिए क्या करें और क्या न करें?

घुटनों को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए डॉ. अनन्या शर्मा ने कुछ बेहद महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव दिए हैं। उनका कहना है कि अपनी रोजमर्रा की आदतों में मामूली बदलाव करके हम घुटनों को गंभीर नुकसान से बचा सकते हैं। इसके लिए वजन को नियंत्रित रखना सबसे ज्यादा जरूरी है क्योंकि वजन कम होने से सीधे तौर पर घुटनों पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाता है।

इसके साथ ही नियमित व्यायाम करना भी बेहद जरूरी है। हालांकि, व्यायाम करते समय अपनी शारीरिक क्षमता का ध्यान रखना आवश्यक है। कई बार लोग घुटनों को मजबूत बनाने के चक्कर में जिम जाकर भारी-भरकम वजन उठाने लगते हैं या क्षमता से अधिक कठिन स्क्वाट्स करने लगते हैं। डॉक्टर के मुताबिक, ऐसी अति सक्रियता घुटनों को फायदे की जगह भारी नुकसान पहुंचा सकती है। व्यायाम हमेशा किसी विशेषज्ञ की देखरेख में और अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए।

क्या कम उम्र में नी-रिप्लेसमेंट कराना सही है?

जब घुटने पूरी तरह खराब हो जाते हैं, तो लोगों के मन में पहला विचार नी-रिप्लेसमेंट यानी घुटना बदलवाने का आता है। लेकिन क्या कम उम्र के मरीजों के लिए यह एक सही कदम है? इस पर डॉ. अनन्या शर्मा का स्पष्ट मत है कि जब तक संभव हो, कम उम्र में इस सर्जरी को टालना ही समझदारी है।

डॉक्टर बताती हैं कि घुटना बदलने की सर्जरी एक बड़ी और बेहद जटिल प्रक्रिया है। आमतौर पर ट्रांसप्लांट किया गया नया कृत्रिम घुटना 20 से 25 साल तक ही काम कर पाता है। ऐसे में यदि कोई मरीज 30 से 40 साल की उम्र में ही यह सर्जरी करवा लेता है, तो उसे अपने जीवनकाल में आगे चलकर दोबारा सर्जरी यानी रिवीजन सर्जरी करानी पड़ सकती है। दोबारा की जाने वाली सर्जरी और भी अधिक जटिल होती है।

इसलिए डॉक्टरों की सलाह होती है कि जल्दबाजी में सर्जरी का निर्णय लेने के बजाय पहले अन्य विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए। कई बार घुटने के कार्टिलेज या मेनिस्कस में मामूली चोट होती है, जिसके लिए पूरे घुटने को बदलने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसी स्थितियों में आधुनिक दूरबीन तकनीक यानी ऑर्थोस्कोपी की मदद से घुटने का सफल इलाज किया जा सकता है, जिससे मरीज को बड़ी सर्जरी से राहत मिल जाती है。

सर्जरी के बाद ठीक होने में कितना समय लगता है?

यदि स्थिति बेहद गंभीर हो और मरीज का रोजमर्रा का जीवन, जैसे चलना-फिरना और सामान्य कामकाज पूरी तरह प्रभावित हो चुका हो, तभी डॉक्टर सर्जरी की सलाह देते हैं। आज की आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में इस सर्जरी के परिणाम काफी बेहतर और त्वरित हैं।

डॉ. अनन्या शर्मा के अनुसार, सर्जरी के बाद रिकवरी की प्रक्रिया इस प्रकार होती है:

  • अगले ही दिन से चलना: सफल सर्जरी के बाद मरीज को अगले ही दिन से धीरे-धीरे पैर जमीन पर रखकर चलने की अनुमति दे दी जाती है।
  • 3 से 4 सप्ताह: ऑपरेशन के बाद होने वाले दर्द, सूजन और टांकों को पूरी तरह से ठीक होने में लगभग तीन से चार हफ्ते का समय लगता है।
  • 1 महीना: करीब एक महीने का समय बीतने के बाद मरीज बिना किसी सहारे के सामान्य तरीके से सीढ़ियां चढ़ने और उतरने में सक्षम हो जाता है।
  • 2 से 3 महीने: सर्जरी के लगभग दो से तीन महीने बाद मरीज पूरी तरह से अपनी सामान्य जीवनशैली में लौट आता है। इसके बाद उसे यह अहसास भी नहीं होता कि कभी उसके घुटने का कोई बड़ा ऑपरेशन हुआ था।

अंततः, डॉक्टर की यही सलाह है कि घुटनों के दर्द को कभी भी मामूली समझकर नजरअंदाज न करें। सही समय पर लिया गया डॉक्टरी परामर्श आपको भविष्य की बड़ी परेशानियों और सर्जरी के दर्द से बचा सकता है।

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