धान की फसल के लिए यह नाजुक दौर
रायबरेली के किसानों के लिए वर्तमान समय धान की फसल के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। खेतों में धान की बालियां निकलनी शुरू हो गई हैं, जो अच्छी उपज की उम्मीद जगाती हैं, लेकिन इसी दौरान फसल पर कई गंभीर रोगों का खतरा भी बढ़ जाता है। इसमें कंडुआ रोग सबसे प्रमुख है, जो धान की बालियों और दानों को पूरी तरह बर्बाद कर सकता है। अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई, तो किसानों को उत्पादन और फसल की गुणवत्ता दोनों में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
कंडुआ रोग की पहचान और लक्षण
राजकीय कृषि केंद्र शिवगढ़ के प्रभारी अधिकारी शिव शंकर वर्मा ने बताया कि धान में बालियां निकलते समय किसानों को खेतों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए। कंडुआ रोग की स्थिति में धान के दाने सामान्य नहीं दिखते। इसके बजाय, दानों की जगह पर प्रभावित हिस्सा असामान्य रूप से दिखाई देने लगता है। कुछ समय बाद इन प्रभावित हिस्सों पर फफूंद का असर स्पष्ट रूप से नजर आने लगता है। यदि किसान इन लक्षणों को नजरअंदाज करते हैं, तो यह रोग पूरी फसल में तेजी से फैल सकता है, जिससे भारी नुकसान होने की आशंका बढ़ जाती है।
खेत में नमी का प्रबंधन है जरूरी
फसल को फफूंद जनित रोगों से बचाने के लिए जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। शिव शंकर वर्मा का कहना है कि धान के खेत में जरूरत से ज्यादा नमी या लंबे समय तक पानी का जमा रहना कई तरह की बीमारियों के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर देता है। बालियां निकलने और फूल आने के समय खेत में उतनी ही सिंचाई करें जितनी फसल की आवश्यकता हो। खेत में अनावश्यक रूप से पानी जमा न रहने दें, क्योंकि अधिक नमी ही फफूंद के पनपने का मुख्य कारण बनती है।
संक्रमित पौधों को नष्ट करने का महत्व
यदि खेत के किसी भी हिस्से में रोग के लक्षण दिखाई दें, तो किसान को तुरंत सक्रिय होना चाहिए। प्रभावित पौधों या बालियों को सावधानीपूर्वक खेत से बाहर निकाल देना चाहिए और उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाकर नष्ट कर देना चाहिए। संक्रमित अवशेषों को खेत में ही छोड़ना बहुत खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे रोग के बीजाणु मिट्टी और हवा के माध्यम से स्वस्थ पौधों में फैल सकते हैं। खेत को साफ रखना और रोगग्रस्त पौधों पर लगातार नजर रखना ही बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
खाद और उर्वरक का संतुलित उपयोग
कई बार किसान फसल की तेजी से बढ़वार के लिए नाइट्रोजन युक्त खादों का अत्यधिक प्रयोग करते हैं, जो घातक साबित हो सकता है। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन का उपयोग पौधों को तो बड़ा कर देता है, लेकिन साथ ही उन्हें रोगों के प्रति अधिक संवेदनशील भी बना देता है। शिव शंकर वर्मा के अनुसार, किसानों को हमेशा कृषि विशेषज्ञों की सलाह माननी चाहिए और यूरिया तथा अन्य उर्वरकों का प्रयोग संतुलित मात्रा में ही करना चाहिए। इसके अलावा, पोटाश और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों का सही प्रबंधन पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है, जिससे फसल बीमारियों से लड़ने में सक्षम होती है।
दवा छिड़काव के समय रखें सावधानी
यदि खेत में कंडुआ रोग या किसी अन्य प्रकार के फफूंद के लक्षण दिखाई दें, तो बिना देरी किए कृषि विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए। विशेषज्ञ की सलाह के आधार पर उचित मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग करें। इस रोग के प्रभावी नियंत्रण के लिए प्रोपीकोनाजोल 25% ईसी का छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। याद रखें कि दवाओं का छिड़काव सही समय पर और अनुशंसित मात्रा में ही किया जाना चाहिए ताकि फसल को नुकसान न पहुंचे और रोग पर पूरी तरह काबू पाया जा सके। नियमित देखरेख और सही समय पर लिया गया निर्णय ही आपकी फसल को सुरक्षित रख सकता है।
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