अमेरिकी हथियारों का भंडार खाली, फिर भी सऊदी अरब के साथ 5 अरब डॉलर की बड़ी रक्षा डील

ईरान के साथ लंबे समय से चल रहे संघर्ष के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब को हथियारों की बड़ी खेप बेचने का फैसला किया है। इस सौदे के बाद सवाल उठ रहे हैं कि जब खुद अमेरिका के अपने मिसाइल डिफेंस सिस्टम के भंडार कम हो रहे हैं, तब वह अरबों डॉलर का गोला-बारूद निर्यात क्यों कर रहा है?

सऊदी अरब को 5 अरब डॉलर के हथियारों की मंजूरी

ईरान के खिलाफ बीते कई महीनों से जारी अमेरिकी सैन्य गतिविधियों के बीच, वॉशिंगटन ने सऊदी अरब के साथ एक विशाल रक्षा समझौते को हरी झंडी दे दी है। इस डील की कीमत करीब 5 अरब डॉलर आंकी गई है, जिसमें हजारों की संख्या में बम और उन्हें सटीक लक्ष्य पर भेजने वाले आधुनिक गाइडेंस किट शामिल हैं। यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, क्योंकि अमेरिका के अपने ही मिसाइल डिफेंस सिस्टम, जैसे Patriot और THAAD, के भंडार में आई भारी कमी पहले ही चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में अपनी सैन्य जरूरतों को दरकिनार कर खाड़ी के अपने सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी को इतने बड़े पैमाने पर हथियार उपलब्ध कराना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।

इस रक्षा पैकेज में क्या-क्या शामिल है?

अमेरिकी विदेश विभाग ने इस प्रस्तावित बिक्री को शुक्रवार को मंजूरी दी है। इस सौदे के प्रमुख हिस्से में JDAM-ER यानी जॉइंट डायरेक्ट अटैक म्युनिशन-एक्सटेंड रेंज सिस्टम शामिल है, जिसका मुख्य ठेकेदार बोइंग को बनाया गया है। इस पैकेज में निम्नलिखित सामग्रियां शामिल की गई हैं:

  • 5,004 KMU-572 JDAM गाइडेंस किट
  • 5,000 KMU-556 गाइडेंस किट
  • 5,004 पांच सौ पाउंड के बम
  • 5,000 दो हजार पाउंड के बम
  • विभिन्न प्रकार के फ्यूज, टारगेट डिटेक्टर, जरूरी स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी सहायता

अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इन हथियारों के मिलने से सऊदी अरब की हवाई सुरक्षा क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इससे सऊदी अरब न केवल अपने वर्तमान सुरक्षा खतरों से निपट सकेगा, बल्कि भविष्य के क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के लिए भी बेहतर ढंग से तैयार रहेगा। इसके अलावा, इस डील के पीछे एक उद्देश्य सऊदी और अमेरिकी सेना के बीच बेहतर तालमेल और सैन्य सामंजस्य बिठाना भी बताया जा रहा है।

खुद के भंडार पर बढ़ता दबाव

इस डील के आलोचकों का मानना है कि अमेरिका खुद इस समय हथियारों की किल्लत से जूझ रहा है। ईरान के साथ महीनों से चल रहे तनावपूर्ण सैन्य अभियानों ने अमेरिकी मिसाइल रक्षा प्रणाली को बुरी तरह प्रभावित किया है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के अनुमानों पर गौर करें तो स्थिति चिंताजनक है। युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिकी बेड़े में Patriot इंटरसेप्टर की संख्या करीब 2,330 थी, जो जुलाई के अंत तक घटकर महज 759 से 827 के बीच सिमट गई है। इसी तरह, THAAD इंटरसेप्टर का स्टॉक भी 452 से लुढ़ककर 234 से 278 के दायरे में रह गया है।

हथियार निर्यात की रणनीति

एक तरफ जहां अमेरिका अपने हथियारों के उत्पादन को तेज करने की कोशिशों में जुटा है, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब को हथियारों की आपूर्ति करना वॉशिंगटन की भू-राजनीतिक प्राथमिकता को दर्शाता है। अमेरिका अपनी उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है, जिसमें PAC-3 MSE मिसाइलों के उत्पादन को तीन गुना और THAAD इंटरसेप्टर के निर्माण को चार गुना तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, इतने दबाव के बावजूद सऊदी अरब को प्राथमिकता देना यह स्पष्ट करता है कि खाड़ी क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाए रखना अमेरिका के लिए कितना आवश्यक है।

संसद की मंजूरी का इंतजार

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सौदा अभी अंतिम रूप से संपन्न नहीं हुआ है। प्रस्तावित बिक्री की विस्तृत जानकारी अमेरिकी कांग्रेस को भेज दी गई है, जहां से इसे हरी झंडी मिलना अभी बाकी है। सांसदों की मंजूरी के बाद ही यह प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी। इस मुख्य सौदे के अतिरिक्त, सऊदी अरब के लिए करीब 75 करोड़ डॉलर के एक अन्य रक्षा समझौते को भी मंजूरी दी गई है। इसमें मुख्य रूप से AGT-1500 इंजन शामिल हैं और इस अलग सौदे में हनीवेल को मुख्य ठेकेदार के रूप में चुना गया है।

https://hindi.news18.com/world/america-us-saudi-arabia-arms-deal-5-billion-weapons-iran-war-10808080.html