दिल्ली में दलित उत्पीड़न पर गरमाई सियासत, क्या उत्तर प्रदेश में बन रहा है नया सियासी समीकरण?

दिल्ली में एक दलित युवती के पिता के साथ हुई मारपीट के मामले में राजनीति तेज हो गई है, जहाँ कांग्रेस और अन्य संगठन एकजुट होकर नए सामाजिक समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

दिल्ली के घटनाक्रम से बदले राजनीतिक सुर

सोशल मीडिया पर चर्चित दलित युवती निशु आजाद ने अपने पिता के साथ हुई मारपीट की घटना को प्रमुखता से उठाया था। इस मुद्दे ने जल्द ही तूल पकड़ लिया और आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद ने मामले में सक्रियता दिखाते हुए दिल्ली पुलिस पर कानूनी कार्रवाई के लिए दबाव बनाया। इस पूरे घटनाक्रम ने राजधानी की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दिया है, जिसे कॉफी पर कुरुक्षेत्र कार्यक्रम में विस्तार से विश्लेषित किया गया है।

मैदान में कांग्रेस की सक्रियता

इस संघर्ष में कांग्रेस ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी के मुताबिक, राहुल गांधी के निर्देश पर AICC के कानूनी विभाग की एक टीम ऋषभ रंजन के नेतृत्व में सक्रिय हुई। इस टीम में छह वकील शामिल थे, जिन्हें विशेष रूप से संबंधित थाने भेजा गया। वकीलों की इस टीम ने पुलिस पर स्वतंत्र भारद्वाज के विरुद्ध एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करने का दबाव बनाया। इसके साथ ही, उन्होंने 72 घंटे के भीतर आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने का आश्वासन लिया और ऑनलाइन मिल रही धमकियों के मामले में एक अलग एफआईआर दर्ज कराई। जानकारों का मानना है कि थाने के भीतर कांग्रेस के दिग्गज नेताओं, वकीलों, चंद्रशेखर आजाद और सीजेपी के प्रतिनिधियों का एक साथ दिखाई देना भविष्य के एक अनौपचारिक राजनीतिक गठबंधन की आहट है।

उत्तर प्रदेश में सीजेपी का दखल

राजनीतिक विश्लेषक इस पूरे घटनाक्रम को केवल दिल्ली तक सीमित नहीं मान रहे हैं। सीजेपी के आशुतोष रांका की सपा प्रमुख अखिलेश यादव से हुई हालिया मुलाकात को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सीजेपी जैसे संगठन अब भाजपा शासित राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में आक्रामक रूप से सक्रिय हैं। विशेषज्ञों का आकलन है कि विपक्ष के बड़े चेहरे, जिनमें राहुल गांधी और अखिलेश यादव प्रमुख हैं, युवा पीढ़ी, जेनजी, अल्पसंख्यकों, दलितों और ओबीसी को मिलाकर एक व्यापक और नया सामाजिक गठबंधन तैयार करने की मुहिम में जुटे हैं।

दलित वोट बैंक के बदलते आंकड़े

उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में दलित मत हमेशा से ही सत्ता की कुंजी रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 से 2022 तक गैर जाटव दलितों का एक बड़ा वर्ग भारतीय जनता पार्टी के साथ मजबूती से खड़ा था। साल 2022 के विधानसभा चुनावों में लगभग 45 फीसदी गैर जाटव दलितों ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनावों में यह स्थिति पूरी तरह पलट गई। इस चुनाव में 54 फीसदी गैर जाटव दलित मतदाताओं ने इंडिया गठबंधन पर भरोसा जताया और बहुजन समाज पार्टी का जनाधार सिमटकर तीसरे स्थान पर आ गया। यह ध्यान देने योग्य है कि सीटों के उतार चढ़ाव के बीच भी उत्तर प्रदेश में भाजपा का कुल वोट शेयर लगभग 0.38 फीसदी बढ़ा है, जो अन्य सामाजिक वर्गों में उनकी पैठ को दर्शाता है।

योगी सरकार की चुनौती और रणनीति

विपक्ष ने 2024 के चुनाव में संविधान के मुद्दे को हवा देकर काफी लाभ उठाया था, लेकिन अब उस नैरेटिव की धार कम होती दिख रही है। राहुल गांधी दलितों को लामबंद रखने के लिए अब मनुस्मृति जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी पुरानी पिच यानी कानून व्यवस्था, हिंदुत्व, विकास और राष्ट्रवाद के एजेंडे पर कायम हैं। युवाओं के असंतोष को थामने के लिए योगी सरकार ने 1 लाख नई सरकारी नौकरियों का ऐलान किया है, जबकि उनके पिछले कार्यकाल में पहले ही 9 लाख नौकरियां दी जा चुकी हैं। यह साफ है कि एक तरफ विपक्ष नए सामाजिक समीकरणों की बिसात बिछा रहा है, तो दूसरी तरफ भाजपा प्रशासनिक और वैचारिक मजबूती के साथ इस चुनौती का सामना करने की तैयारी कर रही है।

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