म्यांमार ड्रोन हमले की जांच: टूरिस्ट वीजा से लेकर सीमा पार तक, कैसे रची गई बड़ी साजिश, NIA कर रही है खुलासा

म्यांमार में एक यात्री विमान पर हुए ड्रोन हमले के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने तिहाड़ जेल में बंद दो विदेशी नागरिकों से पूछताछ के लिए अनुमति ले ली है। जांच में सामने आया है कि इन लोगों ने भारत के वीजा नियमों को दरकिनार कर संवेदनशील सीमाई इलाकों का इस्तेमाल किया और आतंकी संगठनों को ड्रोन तकनीकी का प्रशिक्षण दिया।

जांच का दायरा और विदेशी नागरिकों की भूमिका

म्यांमार में एक असैन्य विमान पर हुए ड्रोन हमले की घटना के बाद से सुरक्षा एजेंसियों की सक्रियता काफी बढ़ गई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए ने अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया है। इस कड़ी में दिल्ली की एक अदालत ने एनआईए को तिहाड़ जेल में बंद दो विदेशी नागरिकों से पूछताछ करने की आधिकारिक अनुमति प्रदान कर दी है। इन विदेशी नागरिकों में एक अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैन डाइक और दूसरा यूक्रेनी मूल का विक्टर कामिंस्की है। एनआईए का मानना है कि इन दोनों के पास ऐसी अहम जानकारी है जो म्यांमार में सक्रिय सशस्त्र समूहों की गतिविधियों और उनके द्वारा किए गए हमले की गुत्थी सुलझा सकती है।

जांच के मुख्य बिंदु और गंभीर खुलासे

एनआईए के अनुसार, यह मामला केवल म्यांमार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार भारत से भी जुड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं। जांच एजेंसी ने गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA की धारा 18 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। इस पूरे षड्यंत्र में कुल सात विदेशी नागरिकों की संलिप्तता का संदेह जताया गया है। जांच के दौरान यह बात सामने आई है कि ये विदेशी नागरिक न केवल भारत में प्रवेश करने के लिए गलत रास्तों और दस्तावेजों का उपयोग कर रहे थे, बल्कि उन्होंने म्यांमार में सक्रिय विद्रोही समूहों को घातक ड्रोन हमले करने का तकनीकी प्रशिक्षण भी दिया।

वीजा नियमों का खुला उल्लंघन

एनआईए की जांच का एक प्रमुख हिस्सा टूरिस्ट वीजा के गलत इस्तेमाल से जुड़ा है। भारत में विदेशी नागरिक जो टूरिस्ट वीजा पर आते हैं, उन्हें केवल पर्यटन या सीमित निजी यात्राओं की अनुमति होती है। लेकिन जांच में पाया गया कि इन आरोपियों का असली उद्देश्य पर्यटन बिल्कुल नहीं था। उन्होंने अपनी पहचान और उद्देश्य छिपाकर भारतीय भूमि का इस्तेमाल एक ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में किया। यह सीधे तौर पर इमिग्रेशन और फॉरेनर्स एक्ट 2025 का गंभीर उल्लंघन माना जा रहा है। यदि कोई व्यक्ति वीजा की शर्तों के विपरीत किसी अन्य देश की हिंसा या आतंकी गतिविधियों में लिप्त पाया जाता है, तो कानून उसे किसी भी प्रकार की राहत नहीं देता है।

संवेदनशील सीमाई इलाकों में बिना अनुमति घुसपैठ

मामले में एक अन्य बड़ा मोड़ तब आया जब जांच एजेंसी ने पाया कि आरोपी गुवाहाटी के रास्ते मिजोरम के बेहद संवेदनशील और प्रतिबंधित सीमावर्ती इलाकों में पहुंच गए थे। भारत के इन इलाकों में प्रवेश के लिए विदेशी नागरिकों को विशेष अनुमति यानी रिस्ट्रिक्टेड एरिया परमिट (RAP) और प्रोटेक्टेड एरिया परमिट (PAP) की आवश्यकता होती है। आरोपियों ने इन कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना तो दूर, इन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। सुरक्षा के दृष्टिकोण से यह बेहद चिंताजनक है कि कैसे विदेशी नागरिक बिना किसी सरकारी मंजूरी के भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास तक पहुंच गए और वहां से म्यांमार की सीमा में घुसपैठ कर ली।

तकनीकी प्रशिक्षण और ड्रोन हमले की साजिश

एनआईए की फाइल के अनुसार, म्यांमार में सक्रिय जातीय सशस्त्र समूहों को दी गई ड्रोन ट्रेनिंग इस पूरे मामले का सबसे घातक पहलू है। आरोपियों ने विद्रोहियों को ड्रोन संचालन, युद्ध के लिए ड्रोन का उपयोग, ड्रोन असेंबली और जैमिंग जैसी तकनीक सिखाई। जांच में यह भी दावा किया गया है कि इन लोगों ने केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि यूरोप से प्राप्त ड्रोन उपकरण भी भारत के रास्ते म्यांमार के गुटों तक पहुंचाए। इन्हीं उपकरणों और प्रशिक्षण का उपयोग करके म्यांमार के सशस्त्र समूहों ने वहां एक नागरिक विमान पर हमला किया था। इस घटना के बाद मामला पूरी तरह से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के दायरे में आ गया है।

आयात और कस्‍टम नियमों का उल्लंघन

ड्रोन और उससे जुड़े उपकरणों की तस्करी का मुद्दा भी अब जांच के केंद्र में है। एनआईए यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आखिर ये विदेशी उपकरण भारत में किसके जरिए और किन दस्तावेजों के साथ आए थे। क्या इन्हें कस्टम विभाग के सामने घोषित किया गया था, या अवैध तरीके से सीमा पार कराए गए? इस संबंध में आरोपियों पर कस्टम एक्ट और फॉरेन ट्रेड एक्ट के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है। भारत के माध्यम से इन घातक उपकरणों का म्यांमार पहुंचना भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती और चूक का संकेत देता है।

प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से साठगांठ

एनआईए की जांच के दस्तावेजों से यह भी संकेत मिलते हैं कि आरोपियों के संबंध भारत में प्रतिबंधित कुछ आतंकी संगठनों से भी हो सकते हैं। इन समूहों को हथियार, रसद और तकनीकी सहायता प्रदान करना सीधे तौर पर भारतीय संप्रभुता को चुनौती देने जैसा है। इसी आधार पर जांच एजेंसियां अब तिहाड़ जेल में बंद इन दोनों विदेशी नागरिकों से उन सभी डिजिटल सबूतों के बारे में पूछताछ करेंगी, जो उनके मोबाइल फोन, लैपटॉप और अन्य उपकरणों से बरामद किए गए हैं। इन उपकरणों में ऐसी तस्वीरें और वीडियो डेटा मौजूद हैं, जो इस साजिश की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त सबूत माने जा रहे हैं।

निष्कर्ष और आगे की कार्रवाई

यह पूरा मामला महज एक हमले से शुरू होकर अब एक अंतरराष्ट्रीय जांच में तब्दील हो चुका है। एनआईए ने अदालत को अवगत कराया है कि मामले में सामने आए नए डिजिटल सबूतों और पूछताछ से मिली जानकारियों का मिलान करना अनिवार्य है। विदेशी नागरिकों का टूरिस्ट वीजा पर आकर भारत की सीमा को एक आतंकी गतिविधियों के बेस की तरह इस्तेमाल करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय है। अब तिहाड़ में होने वाली पूछताछ से यह साफ हो पाएगा कि इस साजिश में और कौन-कौन से चेहरे शामिल थे और उन्हें भारत के भीतर से किन लोगों ने सहायता प्रदान की थी। फिलहाल, जांच जारी है और आने वाले दिनों में और भी कई बड़े खुलासे होने की उम्मीद जताई जा रही है।

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