बिहार के सरकारी स्कूलों की बदहाली की कहानियां तो अक्सर सामने आती रहती हैं, लेकिन इसी व्यवस्था के बीच कुछ ऐसे शिक्षक भी मौजूद हैं जो अपनी मेहनत और मजबूत इच्छाशक्ति से असंभव को भी संभव बना देते हैं। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी बिहार के सीतामढ़ी जिले से सामने आई है, जहां एक शिक्षक ने न केवल एक स्कूल की सूरत बदली, बल्कि समाज के सामने एक अनूठी मिसाल भी पेश की है। हम बात कर रहे हैं सीतामढ़ी के बाजपट्टी प्रखंड अंतर्गत मधुबन स्थित आदर्श मध्य विद्यालय के शिक्षक द्विजेंद्र कुमार की, जिन्हें उनके इस अभूतपूर्व योगदान के लिए देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक, राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से नवाजा गया है।
असामाजिक तत्वों का गढ़ बन चुके स्कूल में बदलाव की शुरुआत
वर्ष 2013 में जब द्विजेंद्र कुमार उर्फ द्विजेंद्र सुमन ने आदर्श मध्य विद्यालय, मधुबन में शिक्षक के रूप में अपना योगदान दिया, तब वहां के हालात बेहद चिंताजनक थे। स्कूल के पास न तो कोई चहारदीवारी थी और न ही सुरक्षा की कोई व्यवस्था। स्थिति इतनी खराब थी कि स्कूल का समय खत्म होते ही वहां असामाजिक तत्वों का जमावड़ा शुरू हो जाता था। शाम ढलते ही स्कूल परिसर शराबियों का अड्डा बन जाता था और वहां जुए की महफिलें सजती थीं। ऐसे माहौल में बच्चों की पढ़ाई की कल्पना करना भी बेमानी था।
द्विजेंद्र सुमन ने इस चुनौती को स्वीकार किया और सबसे पहले विद्यालय के सामाजिक और शैक्षणिक माहौल को सुधारने का बीड़ा उठाया। उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और शिक्षा विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया। सभी के सहयोग को इकट्ठा कर उन्होंने स्कूल के चारों तरफ 8 से 10 फीट ऊंची चहारदीवारी का निर्माण करवाया और एक मुख्य गेट लगवाया। इसके बाद असामाजिक तत्वों का स्कूल परिसर में अनाधिकृत प्रवेश पूरी तरह से बंद हो गया और स्कूल का माहौल पढ़ाई के अनुकूल होने लगा।
सुरक्षा पुख्ता करने के बाद उन्होंने स्कूल के पुराने जर्जर भवनों को ध्वस्त करवाया। मलबे से निकली पुरानी ईंटों का रचनात्मक उपयोग करते हुए उन्होंने परिसर में सुंदर बागवानी तैयार करवाई। यही नहीं, जर्जर भवन से निकली पुरानी सखुआ की कीमती लकड़ियों को फेंकने के बजाय, उन्होंने उनसे बच्चों के लिए बैठने के डेस्क, बेंच और मध्याह्न भोजन करने के लिए भोजन की मेज तैयार करवाई। इस तरह कबाड़ से जुगाड़ तकनीक का इस्तेमाल कर स्कूल का वातावरण पूरी तरह बदल दिया गया।
अपनी जेब से वेतन देकर शिक्षकों की कमी को किया दूर
स्कूल का भौतिक ढांचा सुधरने के बाद द्विजेंद्र कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शिक्षकों की भारी कमी थी। अध्यापकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही थी। इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने एक बहुत ही अनूठा रास्ता निकाला। उन्होंने गांव के ही शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं को स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
शुरुआत में इन युवाओं को मानदेय देने के लिए कोई सरकारी बजट नहीं था। ऐसे में द्विजेंद्र सुमन ने अपनी खुद की सैलरी का एक हिस्सा इन युवाओं को देना शुरू किया। बाद में उनकी इस नेक पहल को देखकर ग्रामीण और समाज के अन्य लोग भी आगे आए। दान और चंदे के माध्यम से अतिरिक्त राशि जुटाई जाने लगी।
- इस अनूठी व्यवस्था की शुरुआत केवल 4 अतिरिक्त शिक्षकों से हुई थी।
- धीरे-धीरे समाज के सहयोग से यह संख्या बढ़कर 14 शिक्षकों तक पहुंच गई।
- इन मानद शिक्षकों को प्रति माह 1000 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक का मानदेय दिया जाता था।
- यह पूरी व्यवस्था वर्ष 2016 तक लगातार सुचारू रूप से चलती रही।
इस सराहनीय प्रयास का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और उनकी उपस्थिति पर पड़ा। पहले जहां स्कूल में बच्चों की उपस्थिति नगण्य रहती थी, वहीं अब 50 से 60 बच्चों की बैठने की क्षमता वाले क्लासरूम में छात्रों की उपस्थिति बढ़कर 70 से 75 प्रतिशत तक पहुंच गई। स्कूल का शैक्षणिक स्तर सुधरने से अभिभावकों का सरकारी स्कूल पर भरोसा फिर से बहाल हो गया।
जल संरक्षण और पर्यावरण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव
द्विजेंद्र कुमार केवल शिक्षा के स्तर को सुधारने तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन की दिशा में भी असाधारण काम किया। सीतामढ़ी के तत्कालीन जिलाधिकारी राजीव रौशन द्वारा चलाए जा रहे जल संरक्षण अभियान से प्रेरित होकर द्विजेंद्र सुमन ने स्कूल के भीतर उपलब्ध जल स्रोतों के पास 7 सोखता गड्ढों का निर्माण करवाया।
इस बेहतरीन जल प्रबंधन प्रणाली के कारण स्कूल परिसर में पानी की बर्बादी रुकी और भूजल स्तर को सुधारने में मदद मिली। इस नवाचार के लिए उन्हें जिला स्तर पर प्रथम पुरस्कार से नवाजा गया और उनके स्कूल को विशेष सम्मान दिया गया।
सम्मान का सफर: राज्य से लेकर देश के राष्ट्रपति तक
द्विजेंद्र कुमार के इन लगातार और निस्वार्थ प्रयासों की गूंज जल्द ही प्रशासनिक गलियारों तक पहुंची। उन्हें प्रमंडल, राज्य और अंततः राष्ट्रीय स्तर पर मान-सम्मान मिलना शुरू हुआ। पुरस्कारों का यह सिलसिला कुछ इस तरह रहा:
- 5 सितंबर 2016: शिक्षक दिवस के अवसर पर प्रमंडलीय आयुक्त ने उन्हें विशेष रूप से आमंत्रित कर सम्मानित किया।
- 5 सितंबर 2017: बिहार की राजधानी पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में राज्य सरकार द्वारा आयोजित मुख्य समारोह में उन्हें राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान से नवाजा गया।
- पुरस्कार राशि का दान: राज्य स्तरीय पुरस्कार के रूप में मिली 15 हजार रुपये की नकद सम्मान राशि को द्विजेंद्र कुमार ने अपने पास रखने के बजाय मुख्यमंत्री के माध्यम से शिक्षक कल्याण कोष में दान कर दिया।
- वर्ष 2023: द्विजेंद्र कुमार को देश के सबसे प्रतिष्ठित 'राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार' के लिए चुना गया, जहां महामहिम राष्ट्रपति ने उन्हें इस सम्मान से विभूषित किया।
इस राष्ट्रीय गौरव के ठीक बाद, इसी वर्ष 13 सितंबर 2023 को शिक्षा विभाग ने उन्हें इसी आदर्श मध्य विद्यालय में नियमित प्रधानाध्यापक के पद पर नियुक्त कर दिया। जो स्कूल कभी बदहाली और असामाजिक गतिविधियों के लिए बदनाम था, वह आज बिहार और पूरे देश के लिए एक रोल मॉडल बन चुका है। द्विजेंद्र कुमार की यह कहानी साबित करती है कि अगर एक शिक्षक ठान ले, तो सीमित संसाधनों और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सरकारी स्कूलों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदली जा सकती हैं।
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