हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट में बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक खुलासे हुए हैं। राज्य में विकास कार्यों के लिए धन की भारी कमी हो गई है, क्योंकि सरकार का राजकोषीय घाटा तय सीमाओं को लांघकर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। विधानसभा में पेश की गई इस रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश का राजकोषीय घाटा बढ़कर 12,611.05 करोड़ रुपये हो गया है। इसके साथ ही, राज्य का राजस्व घाटा भी निर्धारित सीमा से कहीं अधिक होकर 6,804.61 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। इस गंभीर आर्थिक संकट के कारण राज्य सरकार के पास विकास कार्यों के लिए बजट की भारी किल्लत हो गई है।
राजस्व का बड़ा हिस्सा वेतन और पेंशन की भेंट चढ़ा
CAG की इस रिपोर्ट में राज्य सरकार के बेकाबू होते खर्चों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा केवल तीन मदों, कर्मचारियों के वेतन, सेवानिवृत्त कर्मचारियों की पेंशन और विभिन्न प्रकार की सब्सिडी के भुगतान में ही खर्च हो रहा है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य के कुल राजस्व का 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ वेतन और पेंशन की अदायगी में चला जाता है। ऐसे में विकास योजनाओं, बुनियादी ढांचे के निर्माण और जन कल्याणकारी परियोजनाओं के लिए सरकार के पास बेहद सीमित वित्तीय संसाधन बच रहे हैं। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने हाल ही में विधानसभा पटल पर इस रिपोर्ट को प्रस्तुत किया, जिसने राज्य की चरमराती आर्थिक सेहत की पोल खोल दी है।
FRBM लक्ष्यों को हासिल करने में नाकाम रही सरकार
CAG की रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हिमाचल प्रदेश सरकार राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन (FRBM) अधिनियम के तहत तय किए गए लक्ष्यों के दायरे में घाटे को नियंत्रित रखने में पूरी तरह विफल रही है।
- वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान राज्य का राजस्व घाटा 6,804.61 करोड़ रुपये दर्ज किया गया, जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) का 2.94 प्रतिशत है।
- वहीं, राज्य का राजकोषीय घाटा बढ़कर 12,611.05 करोड़ रुपये हो गया, जो कि GSDP का कुल 5.44 प्रतिशत है।
- हालांकि, इस अवधि के दौरान राज्य की अर्थव्यवस्था ने 9.20 प्रतिशत की विकास दर दर्ज की है, लेकिन इसके बावजूद वित्तीय असंतुलन की स्थिति गंभीर बनी हुई है।
राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल की हिस्सेदारी में आई गिरावट
एक और चिंता का विषय यह है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में हिमाचल प्रदेश का योगदान महज 0.70 प्रतिशत रह गया है। रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले पांच वर्षों के दौरान राष्ट्रीय GDP में राज्य की हिस्सेदारी लगातार घटी है।
हालांकि, राज्य के राजस्व स्रोतों में कुछ सुधार अवश्य देखा गया है। माल एवं सेवा कर (GST) और केंद्रीय करों में हिमाचल प्रदेश की हिस्सेदारी में 4.34 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साथ ही, गैर-कर राजस्व में भी 22.40 प्रतिशत की अच्छी वृद्धि हुई है। लेकिन इन सबके बावजूद, राज्य की केंद्रीय अनुदानों और ऋण पर निर्भरता काफी अधिक बनी हुई है।
बिजली सब्सिडी और भारी कर्ज ने बढ़ाईं मुश्किलें
रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में बिजली सब्सिडी और कर्ज राहत के उपायों के कारण सब्सिडी पर होने वाले सरकारी खर्च में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस बेतहाशा खर्च के कारण पूंजीगत व्यय यानी बुनियादी ढांचे के विकास पर होने वाले खर्च के लिए बहुत कम बजट बचा है। हिमाचल प्रदेश पर वर्तमान में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम कर्ज है, जिससे आने वाले समय में राज्य की वित्तीय मुश्किलें और अधिक बढ़ सकती हैं।
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