अपने जिगर के टुकड़े को जब माता-पिता पहली बार घर की दहलीज से बाहर किसी प्ले स्कूल में भेजते हैं, तो उनके मन में उम्मीदों का एक नया आसमान होता है। उन्हें लगता है कि बच्चा वहां जाकर नई चीजें सीखेगा, नए दोस्त बनाएगा और खेल-खेल में उसका बचपन और निखरेगा। कामकाजी माता-पिता अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा महंगे स्कूलों की फीस में यह सोचकर लगा देते हैं कि उनका लाडला वहां सुरक्षित हाथों में रहेगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्ले स्कूल को आप पूरी तरह सुरक्षित मान रहे हैं, वहां बंद कमरों के पीछे मासूमों के साथ क्या सलूक हो रहा है? आज के दौर में जब माता-पिता दोनों नौकरीपेशा हैं और बच्चों को बहुत कम उम्र में प्री-स्कूल भेजने का चलन बढ़ रहा है, तब यह सवाल बेहद डरावना और गंभीर हो जाता है। जो छोटे बच्चे अभी ठीक से बोल भी नहीं पाते, वे अचानक स्कूल जाने के नाम से ही कांपने लगते हैं। बच्चों के मन में बैठा यह अनजाना डर इस बात का साफ संकेत है कि हमारी निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक हो रही है। हाल ही में राजधानी दिल्ली के एक प्ले स्कूल से सामने आए एक दिल दहला देने वाले मामले ने हर माता-पिता की रूह को कंपा कर रख दिया है।
प्ले स्कूल में क्रूरता की सारी हदें पार
उत्तर-पूर्वी दिल्ली के एक प्ले स्कूल में 3 साल के मासूम बच्चे के साथ जिस तरह की बर्बरता की गई, उसने प्ले स्कूलों के बड़े-बड़े दावों की पोल खोल दी है। वह मासूम बच्चा स्कूल से घर लौटते ही पूरी तरह गुमसुम हो जाता था, रात को सोते समय अचानक डरकर रोने लगता था और यहां तक कि शौचालय जाने से भी घबराने लगा था। जब परेशान माता-पिता ने इस बात की गहराई से छानबीन की और आखिरकार पुलिस की मदद से स्कूल के CCTV फुटेज खंगाले, तो सामने आया सच किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी था। बच्चे को कई घंटों तक एप्रन की मदद से एक कुर्सी पर बांधकर रखा जाता था, उसके कान खींचे जाते थे और उसे बुरी तरह डराया-धमकाया जाता था। यह सिर्फ किसी एक बच्चे की दर्दनाक कहानी नहीं है, बल्कि देश के कई प्ले स्कूलों में बच्चों के साथ होने वाले अघोषित टॉर्चर की कड़वी हकीकत है। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता का जागरूक होना और अपनी आंख-कान खुले रखना बेहद जरूरी हो गया है।
अचानक बदल गया मासूम का व्यवहार
यह चौंकाने वाला मामला उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मौजपुर और जाफराबाद इलाके में स्थित मकून्स किड्स स्कूल से सामने आया है। इस स्कूल में पढ़ने वाले 3 साल के एक मासूम बच्चे के व्यवहार में अचानक रहस्यमयी और डरावने बदलाव देखने को मिले। वह रात को सोते समय चीखने लगता था और स्कूल जाने का नाम लेते ही थर-थर कांपने लगता था। शुरुआत में उसके माता-पिता को लगा कि नया स्कूल होने के कारण शायद बच्चा जाने में नखरे कर रहा है। लेकिन जब बच्चे के शरीर पर अजीब से निशान दिखाई दिए और उसने टॉयलेट जाने के नाम पर बुरी तरह रोना शुरू कर दिया, तो परिजन उसे डॉक्टर के पास ले गए।
डॉक्टर के क्लिनिक में हुआ खौफनाक खुलासा
डॉक्टर ने जब बच्चे की शारीरिक जांच की, तो एक बेहद परेशान करने वाला सच सामने आया। डॉक्टर ने बताया कि बच्चे के कान के भीतरी हिस्से में गंभीर सूजन है, जो किसी शारीरिक प्रताड़ना या मारपीट के कारण हुई है। इसके बाद जब डरे हुए माता-पिता ने स्कूल प्रबंधन से CCTV फुटेज दिखाने का अनुरोध किया, तो उन्होंने टाल-मटोल करना शुरू कर दिया। हद तो तब हो गई जब स्कूल प्रशासन ने फुटेज दिखाने के एवज में पैसों की मांग तक कर डाली। आखिरकार, माता-पिता ने पुलिस प्रशासन की मदद ली। जब पुलिस ने दखल देकर फुटेज निकलवाई, तो सच देखकर सबके रोंगटे खड़े हो गए। स्कूल की एक महिला आया (अटेंडेंट) उस 3 साल के बच्चे को एप्रन की मदद से घंटों कुर्सी से बांधकर रखती थी और उसे बेरहमी से पीटती थी। इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए FIR दर्ज की और स्कूल की प्रिंसिपल व आरोपी महिला अटेंडेंट सहित कई लोगों को POCSO एक्ट के तहत गिरफ्तार कर लिया। इसके साथ ही शिक्षा विभाग ने भी मामले की जांच के लिए एक विशेष कमेटी का गठन किया है।
गुमसुम होता बचपन और नजरअंदाज होते शुरुआती संकेत
यह देश के अनगिनत मध्यमवर्गीय और कामकाजी परिवारों की रोजमर्रा की कहानी बनती जा रही है। बहुत छोटे बच्चे अपनी तकलीफों को शब्दों में खुलकर बयां नहीं कर पाते। वे स्कूल से आने के बाद अचानक शांत हो जाते हैं, उनका खिलौनों से मन हट जाता है या वे डरे-सहमे रहने लगते हैं। कई बच्चे स्कूल की वर्दी देखते ही रोने लगते हैं या पेट दर्द और सिरदर्द का बहाना बनाने लगते हैं। अक्सर अभिभावक इसे स्कूल न जाने का साधारण बहाना समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन कई बार इसके पीछे स्कूल के स्टाफ का अमानवीय व्यवहार या प्रताड़ना छिपी होती है। जब तक माता-पिता इस बात को समझ पाते हैं, तब तक बच्चा गहरे मानसिक आघात (ट्रॉमा) का शिकार हो चुका होता है। इसलिए बच्चों के व्यवहार में आने वाले हर छोटे बदलाव को बेहद गंभीरता से लेना चाहिए।
प्ले स्कूल में दाखिला कराते समय इन बातों की करें जांच
अपने बच्चे का किसी भी प्ले स्कूल में एडमिशन कराने से पहले केवल स्कूल की चमचमाती इमारत या बड़े-बड़े विज्ञापनों को देखकर आकर्षित न हों। दाखिले से पहले इन महत्वपूर्ण बिंदुओं की गहराई से जांच करें:
- लाइव CCTV एक्सेस: क्या स्कूल प्रशासन माता-पिता को क्लासरूम और परिसर का लाइव CCTV एक्सेस देने के लिए तैयार है? जिस स्कूल की प्रणाली में पारदर्शिता नहीं होती, वहां बच्चों की सुरक्षा को लेकर हमेशा बड़ा खतरा बना रहता है।
- टीचर-स्टूडेंट रेशियो (शिक्षक-छात्र अनुपात): एक छोटे बच्चे की देखभाल और निगरानी के लिए कितने शिक्षक या आया मौजूद हैं, इसकी जानकारी लें। कक्षा में बच्चों की संख्या कम होनी चाहिए ताकि हर बच्चे पर बराबर ध्यान दिया जा सके।
- सपोर्ट स्टाफ का बैकग्राउंड वेरिफिकेशन: स्कूल में काम करने वाले शिक्षकों, सहायिकाओं, ड्राइवरों और सुरक्षा गार्डों का पुलिस वेरिफिकेशन हुआ है या नहीं, इसकी लिखित पुष्टि अवश्य मांगें।
- शौचालय की सुरक्षा और स्वच्छता: स्कूल के वॉशरूम खुद जाकर देखें। यह सुनिश्चित करें कि वे साफ-सुथरे हों और वहां बच्चों की मदद के लिए केवल प्रशिक्षित महिला स्टाफ ही तैनात हो।
- सरप्राइज विजिट (अचानक दौरा): जब भी आप स्कूल देखने जाएं, तो लंच टाइम या छुट्टी होने से ठीक 15 मिनट पहले अचानक पहुंचें। इस दौरान आपको स्कूल के स्टाफ का वास्तविक व्यवहार और वहां की व्यवस्था की असली तस्वीर साफ नजर आ जाएगी।
- सपोर्ट स्टाफ का टर्नओवर: स्कूल प्रबंधन से पूछें कि उनके यहां काम करने वाले आया और कर्मचारी कितने पुराने हैं। यदि सपोर्ट स्टाफ हर 2-3 महीने में बदल रहा है, तो समझ लें कि वहां के कार्य परिवेश या बैकग्राउंड वेरिफिकेशन में जरूर कोई बड़ी गड़बड़ी है।
- कमरों की बनावट और पारदर्शिता: चेक करें कि प्ले स्कूल के कमरे बहुत बंद या बेसमेंट में तो नहीं बने हैं। क्लासरूम ऐसे होने चाहिए जहां बाहर से भी कांच के माध्यम से पारदर्शिता बनी रहे।
स्कूल से लौटने के बाद बच्चे से रोजाना पूछें ये सवाल
जब बच्चा स्कूल से वापस घर लौटे, तो उससे 'आज टीचर ने क्या पढ़ाया' या 'होमवर्क मिला या नहीं' जैसे उबाऊ सवाल पूछने के बजाय, उसके साथ प्यार से बैठकर ये अनौपचारिक बातें करें:
- आज स्कूल में तुम्हारा सबसे पसंदीदा पल कौन सा था और तुमने किस दोस्त के साथ सबसे ज्यादा मस्ती की?
- क्या आज तुम्हें किसी बात से डर लगा या किसी ने तुम्हें डांटा?
- क्या आज क्लास में टीचर ने किसी बच्चे को कोई सजा दी थी?
- स्कूल में तुम्हें कौन सी मैम या दीदी सबसे ज्यादा अच्छी लगती हैं और किससे सबसे ज्यादा डर लगता है?
- टीचर-स्टूडेंट का रोल प्ले (खेल): घर पर बच्चे के साथ एक मजेदार खेल खेलें। बच्चे से कहें कि आज वह 'टीचर' बनेगा और आप या उसका कोई खिलौना 'स्टूडेंट' बनेगा। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, खेल-खेल में बच्चा हूबहू वही शब्द, डांटने का लहजा और हरकतें दोहराएगा जो उसके साथ स्कूल के बंद कमरों में हुई हैं। यह बच्चों के मन का सच जानने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है।
अदृश्य संकेत और रेड फ्लैग्स: इन लक्षणों को पहचानें
बच्चे मानसिक तनाव या प्रताड़ना को हमेशा बोलकर नहीं बताते, लेकिन उनका शरीर और व्यवहार इसके स्पष्ट संकेत देने लगता है। इन 4 मुख्य रेड फ्लैग्स पर हमेशा कड़ी नजर रखें:
- बिहेवियरल रिग्रेशन (व्यवहार में गिरावट): यदि कोई बच्चा जो पूरी तरह से टॉयलेट-ट्रेंड हो चुका था, वह अचानक रात को बिस्तर गीला करने लगे या दोबारा अंगूठा चूसना शुरू कर दे, तो समझ लें कि वह गंभीर मानसिक तनाव में है।
- शारीरिक संवेदनशीलता (टच-सेंसिटिविटी): यदि सिर या कान को छूने पर बच्चा अचानक सहम जाता है या झटके से खुद को दूर खींचता है, तो यह शारीरिक शोषण का संकेत हो सकता है।
- नींद का पैटर्न बिगड़ना (नाइट टेरर्स): सोते समय अचानक चिल्लाकर उठ जाना, हाथ-पैर मारना या डर के मारे पसीने से भीग जाना।
- खान-पान में अचानक बदलाव: खाना देखते ही जी मिचलाना, उल्टी जैसा महसूस होना या अचानक से पूरी तरह खाना छोड़ देना।
स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों से लगातार संवाद रखें
केवल भारी-भरकम फीस चुका देने से माता-पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। आपको स्कूल प्रशासन के साथ सक्रिय रूप से जुड़े रहना होगा:
- महीने में कम से कम एक बार बच्चे की क्लास टीचर से व्यक्तिगत रूप से मिलें और उसके व्यवहार के बारे में विस्तृत चर्चा करें।
- बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक स्कूल पहुंचें और क्लास के भीतर चल रही गतिविधियों को अपनी आंखों से देखें।
- स्कूल के अन्य बच्चों के अभिभावकों के साथ भी संपर्क में रहें और आपस में चर्चा करें कि क्या किसी अन्य बच्चे में भी कोई असामान्य बदलाव देखा गया है।
अभिभावकों के कानूनी अधिकार
अक्सर स्कूल प्रशासन सीसीटीवी फुटेज दिखाने में टालमटोल करता है या मना कर देता है। ऐसी स्थिति में आपको अपने कानूनी अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए:
- POCSO और जुवेनाइल जस्टिस (JJ) एक्ट की सख्ती: भले ही प्ले स्कूल किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से सीधे संबद्ध न हों, लेकिन देश के सख्त कानून जैसे पॉक्सो एक्ट और जुवेनाइल जस्टिस एक्ट उन पर पूरी तरह लागू होते हैं।
- CCTV फुटेज पर कानूनी अधिकार: यदि आपको बच्चे के साथ किसी भी तरह के दुर्व्यवहार का संदेह है, तो स्कूल फुटेज छिपा नहीं सकता। मना करने पर आप तुरंत पुलिस में शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जिसके बाद पुलिस 24 घंटे के भीतर फुटेज जब्त कर सकती है।
- पंजीकरण और एनओसी (NOC): नियमों के अनुसार, हर प्ले स्कूल के लिए स्थानीय नगर निगम (MCD) या शिक्षा विभाग से एनओसी और मान्यता का सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य है। आप स्कूल से इसकी मांग कर सकते हैं।
- WhatsApp ग्रुप का सकारात्मक उपयोग: पेरेंट्स ग्रुप का इस्तेमाल केवल जन्मदिन की बधाई देने के बजाय बच्चों की सुरक्षा पर चर्चा के लिए करें। यदि कई बच्चों में एक जैसा बदलाव दिखे, तो तुरंत सामूहिक रूप से प्रबंधन से बात करें।
मासूमों का बचपन बचाना हमारी पहली जिम्मेदारी
बचपन जीवन का सबसे खूबसूरत और नाजुक दौर होता है। इसे हर तरह से सुरक्षित रखना पूरे समाज और माता-पिता की सबसे बड़ी नैतिक जिम्मेदारी है। प्ले स्कूल बच्चे की शिक्षा का पहला कदम हो सकता है, लेकिन यह उनकी सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य की कीमत पर कभी नहीं होना चाहिए। थोड़ी सी सावधानी, सूझबूझ और सतर्कता के साथ हम अपने मासूमों को किसी भी बड़ी अनहोनी से पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं। याद रखिए, आपका बच्चा शायद अपनी पीड़ा बोलकर बयां न कर पाए, लेकिन उसका व्यवहार सबकुछ साफ-साफ कह देता है, जरूरत है तो बस उसे गहराई से महसूस करने की।
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