पाली: भाई की जान बचाने के लिए चचेरी बहन बनी फरिश्ता, 13 घंटे के मैराथन ऑपरेशन में दान किया लीवर

राजस्थान के पाली जिले के खिंवाड़ा गांव में भाई-बहन के अटूट प्रेम की एक मिसाल सामने आई है, जहां हितेशी राठौड़ ने अपने बीमार चचेरे भाई गजराज सिंह को नया जीवन देने के लिए अपना लीवर दान कर दिया।

अटूट रिश्ते और त्याग की कहानी

राजस्थान के पाली जिले से भाई-बहन के निस्वार्थ प्रेम की एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने सभी को भावुक कर दिया है। सुमेरपुर तहसील के खिंवाड़ा गांव के रहने वाले गजराज सिंह के लिए उनकी चचेरी बहन हितेशी राठौड़ एक मसीहा बनकर उभरी हैं। जब गजराज की जान खतरे में थी, तब हितेशी ने आगे बढ़कर उन्हें अपना लीवर दान किया और उन्हें मौत के मुंह से बाहर निकाल लाईं। यह घटना साबित करती है कि कठिन समय में परिवार का साथ ही सबसे बड़ी ताकत होता है।

गंभीर बीमारी और संकट का दौर

खिंवाड़ा ठिकाणा निवासी गजराज सिंह, जो स्व. राजेन्द्रसिंह के पुत्र हैं, अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। जब उनकी स्थिति बिगड़ने लगी तो परिजन उन्हें अस्पताल ले गए। जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि गजराज का लीवर पूरी तरह खराब हो चुका है और उनकी जान बचाने का एकमात्र रास्ता लीवर ट्रांसप्लांट है। इस खबर ने पूरे परिवार को गहरे संकट में डाल दिया। परिवार के लिए यह स्थिति बहुत चुनौतीपूर्ण थी, क्योंकि ट्रांसप्लांट के लिए उपयुक्त डोनर मिलना एक कठिन प्रक्रिया होती है।

चचेरी बहन का साहसिक फैसला

जब गजराज की चचेरी बहन हितेशी राठौड़, जो कुलदीपसिंह की पुत्री हैं, को उनके भाई की गंभीर बीमारी के बारे में पता चला तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के बड़ा फैसला लिया। हितेशी ने घोषणा की कि वे अपने लीवर का हिस्सा दान करेंगी। हितेशी एक संयुक्त परिवार का हिस्सा हैं। उनके पांच भाई-बहन हैं और वे अविवाहित हैं। वहीं दूसरी ओर, गजराज की इकलौती बहन की शादी हो चुकी है। हितेशी के इस निर्णय ने न केवल गजराज को जीवनदान दिया, बल्कि पूरे परिवार में एक नई उम्मीद की किरण जगा दी।

13 घंटे तक चला मैराथन ऑपरेशन

लीवर ट्रांसप्लांट की यह जटिल सर्जरी 27 मार्च 2026 को अहमदाबाद के शैल्बी हॉस्पिटल में संपन्न हुई। डॉक्टरों की एक कुशल टीम ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया। यह सर्जरी इतनी कठिन थी कि इसे पूरा होने में करीब साढ़े 13 घंटे का समय लगा। इस दौरान गजराज सिंह और हितेशी राठौड़ दोनों ही जीवन और मौत के बीच जूझ रहे थे। आखिरकार, हितेशी के लीवर का हिस्सा गजराज में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित कर दिया गया। मेडिकल टीम की मेहनत और दोनों भाई-बहनों के मजबूत जज्बे के कारण यह ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा।

फिटनेस और अनुशासन बना संजीवनी

हितेशी राठौड़ अपनी फिटनेस को लेकर बेहद गंभीर रहती हैं और वह कई मैराथन प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा ले चुकी हैं। उनकी यही स्वस्थ जीवनशैली इस बड़ी सर्जरी के लिए एक बड़ा आधार बनी। डॉक्टरों का कहना है कि हितेशी की शारीरिक मजबूती के कारण ही वे इस कठिन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक झेल सकीं। ऑपरेशन के बाद भी डॉक्टरों ने हितेशी को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, लीवर ट्रांसप्लांट के बाद डोनर को करीब एक साल तक अपने स्वास्थ्य का बहुत अधिक ध्यान रखना पड़ता है, जिसका हितेशी पूरी गंभीरता से पालन कर रही हैं।

पांच महीने बाद सामान्य जीवन

अब इस ऑपरेशन को लगभग पांच महीने बीत चुके हैं। वर्तमान में गजराज सिंह और उनकी बहन हितेशी दोनों ही पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपना सामान्य जीवन व्यतीत कर रहे हैं। रक्षाबंधन जैसे त्योहारों पर राखी बांधने और उपहार देने के चलन से इतर, हितेशी ने अपने शरीर का हिस्सा देकर भाई-बहन के रिश्ते को एक नए अर्थ दिए हैं। उनका यह त्याग यह दर्शाता है कि रिश्तों की डोर प्यार और समर्पण से कहीं ज्यादा मजबूत होती है।

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