संसद चलो मार्च का तनाव और अभिजीत दीपके का अनुभव
कॉकरोच जनता पार्टी के संयोजक अभिजीत दीपके ने हाल ही में एक साक्षात्कार के दौरान 20 जुलाई को हुए संसद चलो मार्च के दौरान की परिस्थितियों पर विस्तार से चर्चा की है। यह दिन न केवल उनके राजनीतिक अभियान का एक बड़ा हिस्सा था बल्कि उनके लिए शारीरिक और मानसिक रूप से भी बेहद चुनौतीपूर्ण रहा। अभिजीत दीपके ने बताया कि उस समय वे तीन दिनों की लंबी भूख हड़ताल पर थे, जिसकी वजह से उनका शरीर बुरी तरह से थक चुका था और उनकी ऊर्जा पूरी तरह खत्म हो गई थी।
भूख हड़ताल और कमजोरी का प्रभाव
अभिजीत दीपके ने अपनी स्थिति के बारे में बात करते हुए कहा कि उन्हें भूख हड़ताल के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों का कोई पूर्व अनुभव नहीं था। उन्होंने बताया कि हड़ताल के पहले दो दिनों तक उन्होंने लगातार प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया और लोगों से बातचीत जारी रखी, जिसकी भारी कीमत उन्हें तीसरे दिन चुकानी पड़ी। मार्च वाले दिन सुबह ही वे बेहोश हो गए थे। उनकी शारीरिक हालत इतनी नाजुक थी कि वे पैदल चलने की स्थिति में भी नहीं थे, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में ट्रक पर सवार होना पड़ा था।
आशुतोष और सौरव से नाराजगी का कारण
इस पूरे घटनाक्रम के बीच अभिजीत दीपके के लिए सबसे बड़ी परेशानी उनके दो प्रमुख साथियों, आशुतोष रंका और सौरव दास की अनुपस्थिति बनी। दीपके ने बताया कि उस समय जंतर-मंतर पर भीड़ काफी उग्र और बेकाबू हो रही थी, और उन्हें अपने रणनीतिकारों की सबसे ज्यादा जरूरत थी। इसी दौरान सौरव और आशुतोष भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधियों के साथ बैठक के लिए चले गए थे। दीपके का आरोप है कि उन्हें वहां पांच घंटे तक रोक कर रखा गया, जबकि असली बातचीत केवल 10 मिनट की ही थी। उन पांच घंटों के दौरान, जब भीड़ पर नियंत्रण पाना कठिन हो रहा था, आशुतोष और सौरव के फोन लगातार अनरीचेबल आ रहे थे। इस संपर्कहीनता और भारी तनाव ने दीपके को अपने साथियों पर काफी नाराज कर दिया था। उन्होंने साफ कहा कि अगर उन्हें उस स्थिति का पहले अंदाजा होता, तो वे कभी भी उन्हें उस बैठक में जाने की अनुमति नहीं देते।
संसद चलो मार्च और आंदोलन का प्रभाव
यह पूरा वाकया नीट यूजी परीक्षा में हुई धांधलियों के खिलाफ शुरू हुए 37 दिनों तक चले आंदोलन का एक हिस्सा था। 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग, रायसीना रोड, जनपथ, कनॉट प्लेस और इंडिया गेट तक फैल गए थे। उस दिन दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई स्थानों पर झड़पें भी देखी गई थीं। चौतरफा दबाव का ही परिणाम था कि 25 जुलाई को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसी इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना आंदोलन समाप्त करने का निर्णय लिया था।
घटना से जुड़े प्रमुख सवाल और जवाब
- अभिजीत दीपके अपने प्रवक्ताओं पर क्यों नाराज थे? 20 जुलाई के संसद चलो मार्च के समय भूख हड़ताल के कारण दीपके अत्यंत कमजोर थे और जंतर-मंतर पर भीड़ बेकाबू हो रही थी। ऐसे में आशुतोष और सौरव का पांच घंटे तक बीजेपी नेताओं के साथ बैठक में फंसना और उनका फोन अनरीचेबल होना दीपके के लिए परेशानी और नाराजगी का बड़ा कारण बना।
- आंदोलन का अंत कैसे हुआ? नीट यूजी परीक्षा में अनियमितताओं के विरोध में 37 दिनों तक चले इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 25 जुलाई को तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया था, जिसके बाद आंदोलन को वापस ले लिया गया।
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