बिहार के गयाजी जिले में स्थित दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय (CUSB) के वैज्ञानिकों ने विज्ञान जगत में एक बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर और उनकी टीम ने नैनो प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक ऐसी क्रांतिकारी तकनीक और उत्पाद की खोज की है, जो आने वाले समय में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज और औद्योगिक प्रदूषण से निपटने में वरदान साबित हो सकती है। वैज्ञानिकों की इस टीम ने सौर ऊर्जा यानी सूरज की रोशनी का प्रभावी इस्तेमाल करके पानी को साफ करने और कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने वाली एक विशेष नैनो तकनीक विकसित की है। इस ऐतिहासिक खोज के लिए भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय द्वारा दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय को पहला पेटेंट प्रदान किया गया है।
12 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद मिली बड़ी सफलता
वैज्ञानिकों को यह शानदार मुकाम रातों-रात नहीं मिला है, बल्कि इसके पीछे पूरे 12 वर्षों का निरंतर शोध और कड़ी मेहनत छिपी है। इस अनोखे आविष्कार के पेटेंट के लिए साल 2019 में भारत सरकार के पेटेंट कार्यालय में आवेदन दाखिल किया गया था। कड़े तकनीकी परीक्षणों और लंबी प्रक्रिया के बाद, आखिरकार वर्ष 2026 के अगस्त महीने में वैज्ञानिकों की इस खोज को पेटेंट का आधिकारिक सर्टिफिकेट मिल गया। इस ऐतिहासिक पेटेंट का शीर्षक "संवर्धन सौर उत्प्रेरण हेतु प्रथम एवं द्वितीय निकट अवरक्त क्षेत्र में ट्यूनेबल प्लॅस्मोनिक होलो सिल्वर नैनो शेल्स का शुन्य आरपीएम संश्लेषण" है। यह खोज पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल और सौर ऊर्जा के कुशल दोहन पर आधारित है।
इस खोज को अंजाम देने वाले तीन प्रमुख वैज्ञानिक
इस बेहद महत्वपूर्ण नैनो उत्पाद को तैयार करने में तीन प्रमुख वैज्ञानिकों की भूमिका सबसे खास रही है। इस अनुसंधान टीम के मुख्य आविष्कारक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अमिय प्रियम हैं। उनके साथ इस शोध कार्य में शोधार्थी भावेश कुमार दाधीच और भुवनेश्वर में स्थित कालिंग औद्योगिक प्रौद्योगिकी संस्थान के डॉक्टर भव्य भूषण ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन वैज्ञानिकों की टीम के सामूहिक प्रयास से ही नैनो तकनीक के क्षेत्र में भारत को यह बड़ी सफलता मिली है।
क्या है इस तकनीक की खासियत और कैसे काम करते हैं नैनोशेल?
प्रोफेसर अमिय प्रियम ने इस नैनो तकनीक की खूबियों के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता इसका "शून्य घूर्णन गति आधारित हरित संश्लेषण" यानी Zero RPM Green Synthesis होना है। इस प्रक्रिया की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें नैनोशेल के निर्माण के दौरान किसी भी तरह की चुंबकीय या यांत्रिक सरगर्मी (मैकेनिकल स्टीरिंग) की जरूरत नहीं पड़ती है। मशीनों को घुमाने की जरूरत न होने के कारण इसमें बिजली या बाहरी ऊर्जा की खपत पूरी तरह से खत्म हो जाती है, जिससे यह पूरी प्रक्रिया बेहद सस्ती, लागत प्रभावी और पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल बन जाती है।
वैज्ञानिकों ने इस तकनीक के तहत अत्यंत सूक्ष्म आकार के खोखले सिल्वर नैनोशेल (चांदी के खोखले कण) तैयार किए हैं। इन नैनोशेल का आकार महज 40 से 62 नैनोमीटर के बीच है। इससे पहले जापान के वैज्ञानिकों के एक शोध समूह ने भी इस तरह की संरचना पर काम किया था, लेकिन उनके कणों का आकार लगभग 150 नैनोमीटर तक बड़ा था और वह केवल 800 नैनोमीटर तक के क्षेत्र में ही प्रभावी काम कर सकते थे। इसके मुकाबले, CUSB की भारतीय टीम ने बहुत ही छोटे आकार के खोखले नैनोशेल विकसित करने में सफलता हासिल की है।
इन नैनोशेल में एक विशेष द्वि-प्लास्मोनिक प्रणाली विकसित की गई है, जिसमें दो स्पष्ट अवशोषण पीक पाए जाते हैं:
- पहला, 450 से 560 नैनोमीटर के बीच क्वाड्रपोल SPR (सर्फेस प्लास्मोन रेजोनेंस) पाया गया है।
- दूसरा, 780 से 1150 नैनोमीटर के बीच सिमेट्रिक डाइपोल SPR देखा गया है।
सर्फेस प्लास्मोन रेजोनेंस को 1150 नैनोमीटर तक ट्यून करके इसे दूसरे निकट-अवरक्त क्षेत्र यानी NIR-II तक सफलतापूर्वक पहुंचाया गया है, जो इस तकनीक की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खूबी है।
कैंसर के इलाज में खुलेंगे नए रास्ते
इस तकनीक का सबसे क्रांतिकारी अनुप्रयोग कैंसर के इलाज में होने की प्रबल संभावना है। चूंकि यह तकनीक NIR-II क्षेत्र में बेहतरीन ढंग से काम करती है, इसलिए इसके जरिए मानव शरीर के भीतर अपेक्षाकृत गहराई में मौजूद ऊतकों (Tissues) तक प्रकाश को आसानी से पहुंचाया जा सकता है। भविष्य में इसका उपयोग कैंसर के इलाज के लिए संभावित फोटोथर्मल थेरेपी में किया जा सकता है।
इस थेरेपी के तहत इन विशेष नैनोशेल को सीधे कैंसर कोशिकाओं पर लक्षित किया जाएगा और फिर प्रकाश के प्रभाव से उनका तापमान बढ़ाकर उन्हें अंदर से ही नष्ट कर दिया जाएगा। हालांकि, प्रोफेसर अमिया प्रियम ने स्पष्ट किया है कि कैंसर के मरीजों पर इसके व्यावहारिक उपयोग से पहले अभी बड़े पैमाने पर प्री-क्लिनिकल और क्लिनिकल परीक्षणों से गुजरना जरूरी होगा।
प्रदूषित पानी को चुटकियों में करेगा साफ
कैंसर के उपचार के साथ-साथ यह तकनीक पर्यावरण संरक्षण और विशेष रूप से जल शोधन में भी बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। कपड़ा या वस्त्र उद्योगों (टेक्सटाइल इंडस्ट्री) से निकलने वाले विषैले रंगीन रासायनिक अपशिष्ट नदियों और जलाशयों के पानी को बुरी तरह प्रदूषित करते हैं।
इस नई तकनीक की मदद से केवल सौर ऊर्जा का उपयोग करके इन हानिकारक रंगीन अपशिष्टों को अत्यंत सूक्ष्म सांद्रता (सब पिकोमोलर लेवल) पर भी बहुत तेजी से नष्ट किया जा सकता है। यह तकनीक पानी को शुद्ध करने और वस्त्र उद्योगों के जहरीले कचरे को समाप्त करने का सबसे सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल माध्यम साबित होगी।
वैश्विक मंच पर मिली सराहना और सरकारी मदद
भारतीय वैज्ञानिकों की इस खोज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी सराहना मिल रही है। इस पूरे शोध को दुनिया की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिकाओं जैसे अमेरिकन केमिकल सोसाइटी (ACS) और रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री (RSC) के मुख्य शोध पत्रों में प्रकाशित किया गया है। इन कणों की खोखली संरचना की वैज्ञानिक पुष्टि करने के लिए आईआईटी खड़गपुर में ट्रांसमिशन इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (TEM) का उपयोग किया गया था। इस महत्वपूर्ण शोध कार्य को पूरा करने के लिए भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) से वित्तीय अनुदान भी प्राप्त हुआ था।
https://hindi.news18.com/news/business/success-story-gayaji-cusb-gets-patent-for-cancer-treatment-water-purification-technology-local18-ws-l-10793331.html