गुरुग्राम के घर खरीदारों के लिए अधूरी हकीकत
गुरुग्राम में अपनी मेहनत की कमाई लगाकर आशियाना खरीदने वाले हजारों लोगों के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। सरकारी दस्तावेजों और रिकॉर्ड में जिन हाउसिंग सोसायटियों को रहने के लिए पूरी तरह तैयार बताकर ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट यानी OC जारी कर दिए गए, असल में वहां स्थिति बिल्कुल उलट है। इन सोसायटियों में पहुंचने पर न तो पक्की सड़कें मिलती हैं और न ही बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं। सेक्टर-108 में स्थित आरओएफ अलांते और एंबियंस लैगून जैसी नामी रिहायशी सोसायटियों के निवासी आज इस बदहाल व्यवस्था के बीच रहने को मजबूर हैं।
कागजों पर आलीशान, हकीकत में वीरान
शहर के कई हाउसिंग प्रोजेक्ट्स के निवासियों का कहना है कि उनके प्रोजेक्ट्स को प्रशासन की ओर से OC मिल चुका है, जिसका सीधा मतलब है कि सरकारी तौर पर वहां रहने की पूरी अनुमति दी गई है। हालांकि, जब लोग अपने घरों में शिफ्ट हुए, तो उन्हें बुनियादी जरूरतों के लिए भी संघर्ष करना पड़ा। आरओएफ अलांते सोसायटी इसका सबसे सटीक उदाहरण है। यहां रहने वाले निवासियों का आरोप है कि सोसायटी के मुख्य द्वार तक पहुंचने के लिए आज भी पक्की सड़क नहीं है। साथ ही बिजली और पानी के कनेक्शन के लिए भी उन्हें भारी जद्दोजहद का सामना करना पड़ रहा है। जिस जगह को कागजों में रहने लायक घोषित किया गया, वहां जिंदगी शुरू करना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन गई है। वहीं, एंबियंस मॉल के नजदीक स्थित एंबियंस लैगून के निवासियों ने भी इसी तरह की शिकायतें की हैं। निवासियों के अनुसार, जो सुविधाएं बिल्डर ने बिक्री के समय देने का वादा किया था, वे अब तक पूरी नहीं हुई हैं। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया है कि मुख्य रिहायशी प्रोजेक्ट के लिए आवंटित जमीन का इस्तेमाल किसी और काम के लिए किया जा रहा है।
जांच में खुली OC देने की धांधली
यह मामला कोई एक-दो शिकायतों तक सीमित नहीं है। अप्रैल महीने में मुख्यमंत्री उड़नदस्ता और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग (DTCP) ने संयुक्त रूप से शहर के कई रिहायशी प्रोजेक्ट्स का अचानक निरीक्षण किया था। इस जांच के बाद सामने आई तस्वीरें बेहद चौंकाने वाली थीं, जिन्होंने ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट देने की पूरी प्रक्रिया पर ही गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच के दायरे में आए 22 रिहायशी कॉम्प्लेक्स के पास वैध OC मौजूद था, लेकिन उनमें से 14 प्रोजेक्ट्स में निर्माण का काम अभी भी जोरों पर चल रहा था। निरीक्षकों ने पाया कि कई इमारतों की स्थिति केवल कंक्रीट के ढांचे जैसी थी। कहीं प्लास्टर पूरा नहीं हुआ था, कहीं फर्श का काम अधूरा था, तो कहीं किचन और बाथरूम में प्लंबिंग तक चालू स्थिति में नहीं थी। सवाल यह उठता है कि जब ये प्रोजेक्ट रहने के लिए तैयार ही नहीं थे, तो इन्हें OC का प्रमाण पत्र मिला कैसे?
1500 OC पर खड़े हुए बड़े सवाल
जांच के बाद अधिकारियों ने 1 जुलाई 2025 से लेकर 15 मार्च 2026 के बीच जारी किए गए सभी ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट्स की बारीकी से पड़ताल शुरू कर दी है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, इस जांच में यह बात सामने आई है कि करीब 1,500 OC समय से पहले या बिना काम पूरा हुए जारी कर दिए गए थे। अब संकट केवल उन परिवारों का नहीं है जो सुविधाओं के बिना वहां रह रहे हैं, बल्कि असली सवाल उस प्रशासनिक तंत्र पर है जिसने अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा बताकर लोगों को रहने की अनुमति दे दी। इस संबंध में गुरुग्राम के डिस्ट्रिक्ट टाउन प्लानर प्रवीण चौहान ने स्पष्ट किया है कि करीब 1,500 ऐसे मामले मिले हैं जिनमें बिल्डिंग पूरी न होने के बावजूद OC जारी हुए हैं। उन्होंने जानकारी दी कि इन मामलों में शामिल संबंधित आर्किटेक्ट्स को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया है। सरकारी सूत्रों का मानना है कि इन प्रोजेक्ट्स के निरीक्षण की जिम्मेदारी संभालने वाले आर्किटेक्ट्स की भूमिका भी जांच के दायरे में है, क्योंकि उन्हीं की रिपोर्ट के आधार पर OC देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया था।
प्रोजेक्ट्स के नाम पर भरोसे का सवाल
गुरुग्राम जैसे आधुनिक होते शहर में घर का अर्थ सिर्फ चार दीवारें नहीं, बल्कि वहां की सुविधाएं भी हैं। जब प्रशासन खुद अधूरे घर को रहने योग्य बताकर प्रमाण पत्र दे देता है, तो यह केवल निर्माण में कमी का मामला नहीं, बल्कि घर खरीदारों के उस भरोसे का भी उल्लंघन है जो वे सरकारी सिस्टम पर करते हैं। साल 2022 के हरियाणा विधानसभा मॉनसून सत्र के दौरान, बादशाहपुर के तत्कालीन विधायक राकेश दौलताबाद के एक प्रश्न के जवाब से पता चला था कि 1992 से लेकर अब तक गुरुग्राम में केवल 93 रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को ही टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग से कंप्लीशन सर्टिफिकेट मिल पाया है।
बढ़ती आबादी और घटती सुविधाएं
आरओएफ अलांते का उदाहरण लें, तो यहां जिन लोगों ने कई साल पहले 20 लाख रुपये से अधिक की कीमत पर घर बुक किए थे, उन्हें 2024 के मध्य में रहने की मंजूरी मिली थी। उस समय बिल्डर ने उन्हें अत्याधुनिक सुविधाओं का वादा दिया था। द्वारका एक्सप्रेसवे के पास प्रॉपर्टी की कीमतें चार गुना तक बढ़ने के साथ ही, वहां रहने वालों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। आज वहां लगभग 450 परिवार रह रहे हैं, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग नौ गुना अधिक हैं। निवासी वहां की लोकेशन से प्रभावित होकर आए थे, जो एक्सप्रेसवे से केवल 3 किमी और एयरपोर्ट से आधे घंटे की दूरी पर है। लेकिन आज जमीनी हकीकत इन वादों से कोसों दूर नजर आती है।
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