बकरी पालन में बीमारियों का बढ़ता जोखिम
बकरी पालन वर्तमान समय में किसानों और पशुपालकों के लिए आमदनी का एक बेहतरीन जरिया बन चुका है। बिलासपुर क्षेत्र सहित छत्तीसगढ़ भर में बड़ी संख्या में लोग इस व्यवसाय से जुड़े हैं। हालांकि, मौसम में होने वाला बदलाव और बकरियों की अलग-अलग नस्लें उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। जानकारों का कहना है कि जहां एक ओर देसी नस्ल की बकरियां स्थानीय वातावरण में आसानी से ढल जाती हैं और उनमें रोगों से लड़ने की क्षमता अधिक होती है, वहीं दूसरी ओर विदेशी और बड़ी नस्ल की बकरियां बहुत जल्दी बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। इन बकरियों को संक्रमण से बचाने के लिए विशेष देखरेख और सतर्कता की आवश्यकता होती है।
नस्ल और देखभाल का गहरा संबंध
बिलासपुर जिला पशु चिकित्सालय के पशु चिकित्सक डॉ राम ओत्तलवार ने पशुपालकों को आगाह करते हुए बताया कि बकरियों की कई ऐसी नस्लें हैं जो मांस और दूध उत्पादन में तो आगे हैं, लेकिन उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। जमुनापारी, बीटल, ब्लैक बंगाल, सिरोही और उस्मानाबादी जैसी उन्नत नस्लों का पालन करते समय पालकों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। यदि इनके खान-पान और रहने की जगह के प्रति लापरवाही बरती जाए, तो ये निमोनिया, दस्त और पीपीआर (PPR) जैसी गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकती हैं।
सर्दी से निमोनिया तक का खतरा
मौसम का मिजाज बदलते ही बकरियों में श्वसन संबंधी समस्याएं उभरने लगती हैं। शुरुआत में यह केवल साधारण सर्दी-जुकाम के रूप में दिखाई देता है, लेकिन यदि समय रहते इसका उपचार न किया जाए, तो यह स्थिति निमोनिया में बदल जाती है जो जानलेवा हो सकती है। नमी, बारिश और ठंडी हवाओं के सीधे संपर्क में आने से बकरियों की हालत बिगड़ सकती है। डॉ राम ओत्तलवार के अनुसार, बचाव का सबसे आसान तरीका यह है कि पशुओं को सूखे और गर्म स्थान पर रखा जाए। यदि कोई बकरी बीमार दिखे, तो उसे स्वस्थ बकरियों के झुंड से तत्काल अलग कर देना चाहिए ताकि बीमारी का प्रसार न हो सके और तुरंत नजदीकी चिकित्सक से परामर्श लिया जाना चाहिए।
पीपीआर (PPR) के लक्षण और सावधानी
बकरियों में होने वाली सबसे घातक बीमारियों में से एक पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स (PPR) है। यह एक अत्यंत संक्रामक रोग है जो तेजी से एक पशु से दूसरे में फैलता है। PPR के प्रमुख लक्षणों में नाक से पानी आना, सर्दी जैसे लक्षण, मुंह के अंदर छाले या घाव का उभरना और दस्त की समस्या शामिल है। इस बीमारी की जटिलता को देखते हुए अब बाजार में प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध है। यदि आपकी बकरी में इस तरह के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो इसे बिल्कुल भी सामान्य न समझें। अक्सर पशुपालक दस्त और मुंह के छालों को नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में बड़ी आर्थिक हानि का कारण बनता है। संक्रमण को रोकने के लिए बीमार पशु को अलग करना और टीकाकरण करवाना ही एकमात्र समाधान है।
टीकाकरण है बचाव का सबसे अचूक तरीका
पशु स्वास्थ्य को लेकर पशुपालन विभाग की ओर से निरंतर टीकाकरण अभियान चलाए जा रहे हैं। शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में बकरियों को खतरनाक बीमारियों से सुरक्षित करने के लिए शिविर लगाए जाते हैं। पशुपालकों को इन सरकारी योजनाओं का लाभ उठाते हुए अपनी बकरियों का नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करना चाहिए। डॉ राम ओत्तलवार ने सलाह दी है कि पशुपालक विभागीय टीमों के साथ तालमेल बिठाकर समय-समय पर स्वास्थ्य जांच भी करवाते रहें।
बकरी पालकों के लिए उपयोगी सुझाव
- बकरियों के बाड़े को हमेशा साफ और सूखा रखें, वहां नमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए।
- बारिश के मौसम में बकरियों को रात के समय ठंडी हवाओं और ओस से बचाएं।
- यदि किसी एक बकरी में भी बीमारी के लक्षण दिखें, तो उसे तुरंत स्वस्थ समूह से अलग करें।
- खुद से कोई भी दवा देने से बचें और हमेशा योग्य पशु चिकित्सक की सलाह लें।
- टीकाकरण को लेकर लापरवाही न करें और विभाग द्वारा बताए गए समय पर वैक्सीन लगवाएं।
पशुपालकों को यह समझना होगा कि शुरुआती स्तर पर पहचान की गई बीमारी का इलाज आसान होता है। थोड़ी सी सतर्कता और स्वच्छता बरतकर आप न केवल अपनी बकरियों को सुरक्षित रख सकते हैं, बल्कि बकरी पालन के व्यवसाय को अधिक मुनाफे वाला और सफल भी बना सकते हैं।
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