अमेरिका में गरजे मोहन भागवत: कहा- धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, कर्मभूमि के प्रति वफादार रहें प्रवासी भारतीय

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में 'यूनिवर्सल वननेस' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म का दायरा रस्मों-रिवाजों से कहीं बड़ा है। उन्होंने विदेशों में बसे भारतीयों को अपनी कर्मभूमि के प्रति निष्ठावान रहने और भारत की उदारवादी संस्कृति को वैश्विक स्तर पर फैलाने का आह्वान किया।

अमेरिका में गूंजा 'एक दुनिया, एक मानवता' का संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉक्टर मोहन भागवत इन दिनों अमेरिका के दौरे पर हैं। न्यूयॉर्क में आयोजित 'यूनिवर्सल वननेस' सेलिब्रेशन के दौरान उन्होंने हजारों की संख्या में मौजूद लोगों के सामने भारत की विविधता में एकता और हिंदू जीवन दर्शन के सार पर विस्तृत चर्चा की। मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में अमेरिका के 39 राज्यों और 853 शहरों से आए लगभग 6 हजार प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। इसके अलावा, अमेरिका की 250 से अधिक संस्थाओं के प्रतिनिधि और विभिन्न विश्वविद्यालयों के 250 से ज्यादा विद्यार्थी इस आयोजन के गवाह बने।

विविधता और एकता भारत का डीएनए

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि भारत के लिए 'विविधता में एकता' महज एक नारा नहीं, बल्कि यह देश के डीएनए में रचा-बसा है। उन्होंने कहा कि भारत का मूल कर्तव्य केवल स्वयं इस विविधता को आत्मसात करना नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया को यह एहसास कराना है कि अलग-अलग रास्तों से चलने के बावजूद मंजिल एक हो सकती है। मोहन भागवत ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई व्यक्ति खुद को हिंदू कहता है और यह सोचता है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, तो वह हिंदू होने के मूल अर्थ को ही नहीं समझता। उन्होंने कहा कि हिंदू विचार का अर्थ ही हर व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करना और बिना किसी भेदभाव के इंसानों के साथ व्यवहार करना है।

धर्म: पूजा-पाठ से परे का दर्शन

भागवत ने जोर देकर कहा कि धर्म को कभी भी केवल मजहब, उपासना पद्धति या कर्मकांडों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि हालांकि पूजा और परंपराएं अपनी जगह आवश्यक हैं, लेकिन धर्म का वास्तविक उद्देश्य बहुत व्यापक है। धर्म का काम इंसान को सत्य और ईश्वर के मार्ग तक ले जाना है। उन्होंने शिव स्तोत्र का उदाहरण पेश करते हुए समझाया कि जिस प्रकार अलग-अलग नदियां अंततः एक ही सागर में मिल जाती हैं, उसी तरह सत्य को प्राप्त करने के तरीके भिन्न हो सकते हैं, परंतु अंतिम लक्ष्य एक ही है। उन्होंने समाज में मौजूद दो तरह की प्रवृत्तियों का जिक्र किया, जिसमें एक 'जियो और जीने दो' की भावना पर आधारित है, जबकि दूसरी अपनी विचारधारा दूसरों पर थोपने की कोशिश करती है। भारत इसी पहली उदारवादी प्रवृत्ति का समर्थक रहा है।

प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष संदेश

अमेरिका समेत पूरी दुनिया में रह रहे भारतीय मूल के नागरिकों को मोहन भागवत ने उनकी जिम्मेदारियों का एहसास कराया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि वे जिस देश में रह रहे हैं, वहां की 'कर्मभूमि' के प्रति पूर्ण रूप से वफादार रहें। उनके अनुसार, प्रवासी भारतीयों का कर्तव्य है कि वे अपने निवास वाले देश के विकास और समाज की बेहतरी के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दें। भागवत ने कहा कि भारत को उनसे किसी विशेष अपेक्षा की जरूरत नहीं है, बस वे भारत द्वारा दी गई जीवन-दृष्टि के साथ जिएं। उन्होंने 'देने' के संस्कार पर जोर देते हुए कहा कि कोई व्यक्ति क्या कमाता है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह समाज के साथ कितना साझा करता है। हमारा अस्तित्व किसी न किसी के ऋण पर टिका है, इसलिए हम पर दुनिया को वापस लौटाने का दायित्व है।

पर्यावरण और विकास का संतुलन

कार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख ने दुनिया के सामने मौजूद पर्यावरण और विकास की गंभीर चुनौती पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आज विकास की होड़ में पर्यावरण को लगातार नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसका समाधान विकास को रोकना नहीं, बल्कि ऐसा मार्ग चुनना है जिसमें विकास के साथ-साथ प्रकृति का संरक्षण भी हो सके। उन्होंने कहा कि भारत के पूर्वजों ने त्याग और संयम के जरिए दुनिया को ऐसा जीवन जीने की सीख दी है, जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखे। भागवत के अनुसार, आज पूरी दुनिया को उसी जीवनशैली की आवश्यकता है जो समाज और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का एहसास कराए।

संघ के सेवा कार्यों का लेखा-जोखा

मोहन भागवत ने इस अवसर पर संघ द्वारा किए जा रहे सेवा कार्यों की भी चर्चा की। उन्होंने जानकारी दी कि वर्तमान में स्वयंसेवक समाज के वंचित और जरूरतमंद वर्गों के लिए करीब 1.30 लाख सेवा प्रकल्प चला रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि इन कार्यों में कभी भी धर्म, जाति या पंथ के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता। उन्होंने 1996 में हरियाणा के चरखी दादरी में हुए भीषण विमान हादसे को याद किया, जिसमें भारी संख्या में मुस्लिम यात्रियों की जान गई थी। भागवत ने बताया कि उस समय स्वयंसेवकों ने धर्म की परवाह किए बिना राहत कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लिया और शवों की पहचान तथा अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में भी पूरी मदद की।

पांच सूत्रीय कार्ययोजना

इस आयोजन में 30 देशों के 180 धार्मिक नेताओं ने भविष्य के लिए एक पांच सूत्रीय कार्ययोजना की घोषणा की। इस प्रस्ताव के माध्यम से धार्मिक नेताओं ने संकल्प लिया कि धर्म का इस्तेमाल कभी भी नफरत फैलाने, अपमान करने या किसी समुदाय के प्रति हिंसा को सही ठहराने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। 'वन वर्ल्ड, वन ह्यूमैनिटी' के संदेश के साथ नेताओं ने स्पष्ट किया कि यदि दुनिया में कहीं भी किसी समुदाय की गरिमा या सुरक्षा खतरे में पड़ती है, तो वे एक साथ मिलकर उसके पक्ष में अपनी आवाज उठाएंगे। कार्यक्रम में स्वामी विवेकानंद के विचारों का स्मरण करते हुए भागवत ने कहा कि हर राष्ट्र का एक उद्देश्य और नियति होती है, और भारत का मिशन दुनिया को मानवता का संदेश देना है।

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