राजस्थान निकाय चुनाव के लिए कांग्रेस की नई कार्ययोजना
राजस्थान में होने वाले आगामी नगरीय निकाय चुनाव को लेकर कांग्रेस पार्टी ने अपनी टिकट वितरण प्रक्रिया में आमूलचूल परिवर्तन किया है। पार्टी ने इस बार एक नई और सतर्क रणनीति अपनाई है जिसके तहत अब सार्वजनिक रूप से प्रत्याशियों की कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं की जाएगी। इसके बजाय कांग्रेस मुख्यालय सीधे तौर पर जिलों में सिंबल भेजने का काम करेगा और स्थानीय स्तर पर प्रत्याशियों को उनके टिकट के बारे में सूचित किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा जा रहा है ताकि चुनाव के दौरान पार्टी के भीतर होने वाली गुटबाजी और बगावत को पूरी तरह से नियंत्रित किया जा सके।
जिला अध्यक्ष और ऑब्जर्वर की होगी अहम भूमिका
कांग्रेस की इस नई रणनीति को धरातल पर उतारने की जिम्मेदारी जिला अध्यक्षों और विधानसभा स्तर पर नियुक्त किए गए पर्यवेक्षकों यानी ऑब्जर्वर को सौंपी गई है। प्रदेश कांग्रेस महासचिव स्वर्णिम चतुर्वेदी के अनुसार, प्रदेश मुख्यालय से सिंबल भेजने की शुरुआत कल से की जाएगी। प्रत्येक जिले में तैनात पार्टी के ये पदाधिकारी ही संभावित उम्मीदवारों के साथ सीधा संवाद स्थापित करेंगे। जिला स्तर से ही यह तय किया जाएगा कि किसे सिंबल दिया जाना है और उसी माध्यम से उम्मीदवार को इसकी सूचना दी जाएगी। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पार्टी का नियंत्रण नामांकन की अंतिम प्रक्रिया तक बना रहे।
फोन के जरिए दी जाएगी टिकट की जानकारी
कांग्रेस की ओर से अपनाई गई इस प्रक्रिया में फोन का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में किया जा रहा है। पार्टी सूत्रों की मानें तो उम्मीदवारों को टिकट के आवंटन की जानकारी फोन कॉल या मैसेज के माध्यम से दी जाएगी। इस नई पद्धति के अनुसार, आगामी एक या दो दिनों के भीतर कई संभावित दावेदारों को उनके मोबाइल फोन पर सिंबल मिलने का संदेश मिल सकता है। पार्टी का लक्ष्य नामांकन के आखिरी समय तक अपने प्रत्याशियों को लेकर पूरी गोपनीयता बनाए रखना है ताकि विरोधियों को अपनी रणनीति बदलने का मौका न मिले और पार्टी के भीतर भी असंतोष को दबाया जा सके।
टिकट बंटवारे में सस्पेंस की रणनीति
राजस्थान के विभिन्न नगरीय निकायों में एक ही पद के लिए दावेदारों की भीड़ लगी हुई है। कई निकायों में एक ही सीट पर एक से अधिक नेता टिकट पाने की दौड़ में शामिल हैं। ऐसे में यदि पार्टी पहले से ही आधिकारिक सूची जारी कर देती है, तो टिकट से वंचित रहने वाले नेताओं की नाराजगी और उनके बागी तेवर दिखाने का खतरा बहुत अधिक बढ़ जाता है। इसी संभावित संकट से बचने के लिए कांग्रेस ने घोषणा के बजाय सीधे वितरण पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। नामांकन के अंतिम दौर तक दावेदारों के बीच टिकट को लेकर बना रहने वाला यह सस्पेंस पार्टी को बेहतर परिणाम दिलाने में मददगार साबित हो सकता है।
क्या एकल दावेदार और अधिक दावेदार वाली सीटों में होगा अंतर?
जिन सीटों पर कांग्रेस की ओर से केवल एक ही मजबूत दावेदार का नाम सामने आया है, वहां स्थिति अपेक्षाकृत स्पष्ट है और वहां सिंबल मिलने की प्रक्रिया सहज रहने की उम्मीद है। हालांकि, जिन सीटों पर कई नेताओं ने आवेदन किया है, वहां पार्टी के लिए चुनौती काफी गंभीर बनी हुई है। इन जगहों पर पार्टी को एक तरफ तो जिताऊ उम्मीदवार का चयन करना है और दूसरी तरफ टिकट नहीं पाने वाले समर्थकों और नेताओं को समझाकर साथ रखना है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट न मिलने की स्थिति में कुछ नेता सिंबल न मिलने के बावजूद निर्दलीय या बागी होकर चुनावी मैदान में कूद सकते हैं, जिससे निपटना कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
नामांकन के अंतिम समय पर सीधा निशाना
कांग्रेस की इस नई रणनीति का सबसे खास हिस्सा सिंबल जमा कराने का समय है। पार्टी की तैयारी यह है कि सिंबल सीधे नामांकन के आखिरी दौर में रिटर्निंग ऑफिसर के पास जमा कराए जाएं। इससे पार्टी अंतिम क्षण तक अपनी चुनावी बिसात पर अपना पूरा नियंत्रण बनाए रखना चाहती है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह है कि उम्मीदवार का नाम तब तक सार्वजनिक न हो जब तक कि नामांकन प्रक्रिया अपने अंतिम पड़ाव पर न पहुंच जाए। इससे गुटबाजी को पनपने का समय नहीं मिलेगा और पार्टी अनुशासित तरीके से चुनावी मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकेगी।
बगावत रोकने का है यह मुख्य प्रयास
कुल मिलाकर, कांग्रेस की यह नई कार्यप्रणाली पार्टी की आंतरिक राजनीति को साधने का एक प्रयास है। निकाय चुनाव में टिकट वितरण की प्रक्रिया हमेशा से ही चुनौतीपूर्ण रही है, क्योंकि छोटे निकायों में स्थानीय स्तर पर दावेदारों की संख्या अक्सर बहुत अधिक होती है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह 'फोन पर सूचना' और 'सीधे सिंबल' वाला फार्मूला कितना कारगर साबित होता है। क्या यह प्रक्रिया वास्तव में बगावत को रोकने में सफल होगी या फिर अंतिम समय में फोन संदेशों के जरिए टिकट मिलने की खबर पार्टी के भीतर नए विवादों को जन्म देगी, यह सब कुछ नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।
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