जिंदगी और मौत का मंजर
नेपाल में प्राकृतिक आपदा के चलते मची तबाही के बाद अब धीरे-धीरे वहां फंसे लोगों की आपबीती सामने आ रही है। हाल ही में कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए भारतीय तीर्थयात्रियों का एक जत्था सुरक्षित स्वदेश वापस लौट आया है। इनमें से एक तीर्थयात्री, जो मूल रूप से आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम का रहने वाला है, ने उस भयावह स्थिति का वर्णन किया जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसने बताया कि बाढ़ का रौद्र रूप उनके इतने करीब पहुंच गया था कि बस 100 मीटर की दूरी ही मौत और जीवन के बीच की दीवार बनी थी। उसने इस बात को दोहराया कि ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्हें केवल ईश्वर की कृपा से ही नई जिंदगी मिली है।
मुश्किल हालातों में अपनों का सहारा
बचाए गए तीर्थयात्री ने बताया कि जब वे नेपाल में फंसे थे, तब वहां के हालात अत्यंत चिंताजनक बने हुए थे। उसने दावा किया कि आपदा के इस तांडव में करीब 250 भारतीय अभी भी लापता हैं। हालांकि इस संकट की घड़ी में उन्हें अपने राज्य के नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से पूरा सहयोग मिला। तीर्थयात्री ने कहा, नारा लोकेश ने व्यक्तिगत रूप से उनसे बात की और साथ ही उनके निर्वाचन क्षेत्र के विधायक ने भी उनका हालचाल जाना। उसने मुख्यमंत्री और इन सभी जनप्रतिनिधियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके सहयोग के बिना यह सब संभव नहीं हो पाता।
85 भारतीयों को मिला नया जीवन
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने बचाव अभियान की जानकारी देते हुए बताया कि अब तक 85 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है। हालांकि, स्थिति अभी भी नियंत्रण में नहीं है। सरकार का मुख्य ध्यान उन 315 से अधिक भारतीय नागरिकों पर केंद्रित है, जिनसे बाढ़ प्रभावित इलाकों में संपर्क पूरी तरह टूट चुका है। काठमांडू पहुंचे 21 तीर्थयात्रियों के समूह के बारे में विदेश मंत्री ने बताया कि उन्हें नेपाल की सेना ने बेहद दुर्गम इलाकों से रेस्क्यू किया है। यह बचाव कार्य कितना कठिन था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस जगह तक पहुंचना और लोगों को सुरक्षित निकालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।
भारतीय दूतावास की अहम भूमिका
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि जैसे ही इन तीर्थयात्रियों को नेपाली सेना ने बचाया, उसके तुरंत बाद काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने उनके सुरक्षित भारत लौटने की सारी व्यवस्था की। एस जयशंकर ने बताया कि वे स्वयं इन तीर्थयात्रियों से मिलने आए थे ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और उनकी यात्रा के अनुभवों को सीधे सुन सकें। बचाव के बाद वापस लौटे भारतीयों ने नेपाल सेना की वीरता और कार्यकुशलता की जमकर प्रशंसा की। अंत में विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि राहत और बचाव का यह मिशन अभी खत्म नहीं हुआ है। फिलहाल पूरी प्राथमिकता बाढ़ में फंसे उन 315 से अधिक लोगों से संपर्क साधने और उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाने पर है, जिनका फिलहाल कोई अता-पता नहीं है।
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