अमरनाथ यात्रा का हुआ भक्तिमय समापन, श्रीनगर के शंकराचार्य मंदिर में उमड़ा आस्था का जनसैलाब

रक्षाबंधन के पावन पर्व के साथ ही इस वर्ष की वार्षिक अमरनाथ यात्रा का विधिवत समापन हो गया है। पवित्र गुफा में अंतिम पूजा के साथ ही कश्मीर के विभिन्न शिवालयों में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखी गई।

संपन्न हुई बाबा बर्फानी की तीर्थयात्रा

जम्मू-कश्मीर में पिछले कई दिनों से चल रही वार्षिक अमरनाथ यात्रा का समापन रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर हो गया है। इस यात्रा के समापन के साथ ही अमरनाथ की पवित्र गुफा में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए। बाबा बर्फानी की गुफा हर हर महादेव और बम बम भोले के उद्घोष से गूंज उठी। सूर्योदय के समय शुरू हुई यह अंतिम पूजा पारंपरिक रूप से यात्रा के संपन्न होने का प्रतीक मानी जाती है। रक्षाबंधन का त्योहार देश भर के साथ-साथ कश्मीर घाटी में भी हर्षोल्लास और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया।

शंकराचार्य मंदिर में भक्तों का तांता

अमरनाथ यात्रा के समापन के अवसर पर घाटी के प्रमुख मंदिरों में भक्तों की अप्रत्याशित भीड़ देखी गई। विशेष रूप से श्रीनगर में स्थित ऐतिहासिक शंकराचार्य मंदिर में भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतारें लगी थीं और हर कोई बाबा भोलेनाथ की एक झलक पाने के लिए आतुर दिखाई दिया। भक्तों का उत्साह देखते ही बन रहा था। मुख्य मंदिर तक पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग पांच किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करनी पड़ी, लेकिन उनकी आस्था के आगे यह दूरी छोटी नजर आई। श्रद्धालुओं की भारी संख्या को देखते हुए प्रशासन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे ताकि किसी को भी असुविधा न हो।

रक्षाबंधन और आस्था का संगम

मौके पर मौजूद श्रद्धालुओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह दिन बेहद खास है। यह न केवल अमरनाथ यात्रा के आधिकारिक समापन का प्रतीक है, बल्कि भाई-बहन के अटूट प्रेम को समर्पित रक्षाबंधन के त्योहार के साथ इसका मेल इसे और भी पावन बना देता है। श्रद्धालुओं के अनुसार, इस दिन बहनें अपने भाइयों की दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की आजीवन सुरक्षा और समृद्धि का संकल्प लेते हैं। इस साल 57 दिन तक चली इस तीर्थयात्रा के दौरान कुल 4.80 लाख भक्तों ने पवित्र अमरनाथ गुफा में बाबा बर्फानी के दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

छड़ी मुबारक और परंपरा का महत्व

अमरनाथ यात्रा की पुरानी परंपराओं में 'छड़ी पूजा' का विशेष स्थान है। यह पवित्र छड़ी सावन महीने के पहले दिन से ही अपनी यात्रा शुरू कर देती है और रक्षाबंधन के दिन समापन तक जारी रहती है। देश के विभिन्न कोनों से आए महंत और साधु-संत इस पवित्र छड़ी की पूजा-अर्चना करते हैं और इसे पारंपरिक झंडों व पुष्पों से सुसज्जित करते हैं। छड़ी मुबारक पहलगाम और चंदनवाड़ी के दुर्गम रास्तों से होते हुए पवित्र अमरनाथ गुफा तक पहुंचती है। इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत पारंपरिक रूप से पहलगाम में लिद्दर नदी के तट पर होती है। इस प्रकार, छड़ी पूजा का आरंभ और रक्षाबंधन के दिन गुफा में होने वाली आखिरी पूजा ही इस पूरी वार्षिक तीर्थयात्रा का आधार मानी जाती है।

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