जापान की नई रक्षा रणनीति
जापान ने चीन की सैन्य गतिविधियों को अपने देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक खतरा माना है। लगातार बढ़ते सैन्य दबाव और बीजिंग के आक्रामक रवैये के बीच जापान ने हथियारों की खरीद प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्णय लिया है। जापान की रक्षा योजना कितनी गंभीर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रक्षा समझौते के मात्र तीन महीनों के भीतर ही उन्होंने इंटरसेप्टर ड्रोन सिस्टम को चुन लिया है। जापान के रक्षा मंत्रालय के अधीन कार्यरत एक एजेंसी, एक्विजिशन, टेक्नोलॉजी एंड लॉजिस्टिक्स एजेंसी (ATLA) ने जानकारी दी है कि कई विकल्पों पर विचार करने के बाद टेरा बी1 (Terra B1) सिस्टम को अंतिम रूप से चुना गया है।
भविष्य के युद्ध और तकनीकी जरूरत
जापान ने अपने हालिया रक्षा व्हाइट पेपर में मानवरहित प्रणालियों पर खास जोर दिया है। टोक्यो का मानना है कि आने वाले समय के युद्धों में मानवरहित सिस्टम एक निर्णायक भूमिका निभाएंगे। व्हाइट पेपर में चीन द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI से लैस मानवरहित सिस्टम के तेजी से विकास को लेकर भी गहरी चिंता जाहिर की गई है। रक्षा विशेषज्ञों का यह स्पष्ट मानना है कि आधुनिक सेनाओं को अब ऐसे हथियारों की सख्त जरूरत है, जिनका बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो और जो दुश्मन की बदलती रणनीतियों के अनुसार खुद को तुरंत ढाल सकें। युद्ध के मैदान के अनुभवों को बिना किसी देरी के नई सैन्य रणनीतियों और हथियारों में शामिल करना ही जीत का सबसे बड़ा आधार है।
एंटी-ड्रोन सिस्टम क्या होता है?
तकनीकी शब्दावली में एंटी-ड्रोन सिस्टम को काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम (C-UAS) के नाम से जाना जाता है। इसे किसी भी देश की वायु रक्षा प्रणाली का एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच माना जा सकता है, जो आसमान में मंडराते दुश्मन के ड्रोन्स को पलक झपकते ही नष्ट करने में सक्षम है। यह एक उच्चस्तरीय एकीकृत तकनीक है, जिसे खासतौर पर मानवरहित विमानों यानी UAV और ड्रोन का पता लगाने, उनकी पहचान करने, उन्हें ट्रैक करने और अंततः उन्हें बेअसर या नष्ट करने के लिए तैयार किया गया है।
ड्रोन का आकार बहुत छोटा होता है और वे रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते हैं, जिसके कारण पारंपरिक मिसाइलें उन पर प्रभावी साबित नहीं होती हैं। यही कारण है कि एंटी-ड्रोन सिस्टम की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। यह प्रणाली मुख्य रूप से तीन चरणों में अपना काम पूरा करती है:
- डिटेक्शन और ट्रैकिंग: इस सिस्टम में हाई-टेक रडार, रेडियो फ्रिक्वेंसी सेंसर और अकाउस्टिक साउंड सेंसर लगे होते हैं। इसके साथ ही इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड कैमरे आसमान में किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखते हैं। जैसे ही कोई ड्रोन सीमा के आसपास पहुंचता है, सिस्टम तुरंत सुरक्षा बलों को सावधान कर देता है।
- एनालिसिस: उन्नत सॉफ्टवेयर की मदद से यह पता लगाया जाता है कि ड्रोन किस प्रकार का है, उसका सिग्नल कहां से संचालित हो रहा है और वह किस गति से आगे बढ़ रहा है।
- न्यूट्रलाइजेशन: खतरे की पुष्टि के बाद, सिस्टम दुश्मन के ड्रोन को दो तरीकों से खत्म करता है, जिन्हें सॉफ्ट किल और हार्ड किल कहा जाता है।
सॉफ्ट किल और हार्ड किल की कार्यप्रणाली
न्यूट्रलाइजेशन की प्रक्रिया को समझना जरूरी है क्योंकि यह दुश्मन के ड्रोन को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है:
- सॉफ्ट किल: इस प्रक्रिया में दुश्मन के ड्रोन के रेडियो सिग्नल्स या उसके GPS कनेक्शन को इलेक्ट्रॉनिक जैमर की मदद से जाम कर दिया जाता है। संपर्क टूटने के बाद या तो ड्रोन जमीन पर गिर जाता है या फिर वापस अपने शुरुआती बिंदु पर लौट जाता है।
- हार्ड किल: यदि सॉफ्ट किल काम नहीं करता है, तो हार्ड किल का सहारा लिया जाता है। इसमें एंटी-ड्रोन गन, लेजर बीम या फिर मिसाइल इंटरसेप्टर का उपयोग करके ड्रोन को सीधे हवा में ही नष्ट कर दिया जाता है।
एंटी-ड्रोन सिस्टम की जरूरत क्यों है?
आज के दौर में एंटी-ड्रोन तकनीक की मांग बढ़ने के कई प्रमुख कारण हैं:
- कम लागत में बड़ा नुकसान: पारंपरिक मिसाइलों और लड़ाकू विमानों की तुलना में ड्रोन बहुत सस्ते होते हैं, लेकिन वे किसी बड़े सैन्य ठिकाने या बुनियादी ढांचे को करोड़ों का नुकसान पहुंचाने में सक्षम हैं।
- सीमा पार तस्करी और आतंकवाद: भारत जैसे देशों के लिए यह चिंता का विषय है, क्योंकि ड्रोन के जरिए हथियार, नशीले पदार्थ और गोला-बारूद भेजने की घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी गई है।
- अचानक हमले का खतरा: आधुनिक युद्ध में ‘लोइटरिंग म्यूनिशन’ या सुसाइड ड्रोन का खतरा बढ़ गया है, जो कई घंटों तक आसमान में मंडरा सकते हैं। इनसे बचाव के लिए हमेशा सक्रिय रहने वाले एंटी-ड्रोन सिस्टम ही सबसे सटीक उपाय हैं।
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