ऑस्ट्रेलिया में चिकित्सा और कानून का पेचीदा मामला
ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड प्रांत से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे चिकित्सा जगत और कानूनी विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया है। यह मामला जुड़ा है सरोगेसी से, जहां एक महिला ने नवंबर 2025 में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया, लेकिन इन बच्चों का जैविक जुड़ाव अलग-अलग दंपतियों से है। इस घटना ने क्वींसलैंड के सरोगेसी कानूनों की पेचीदगियों को सबके सामने ला खड़ा किया है, क्योंकि मौजूदा कानून में ऐसी किसी स्थिति का स्पष्ट प्रावधान मौजूद नहीं था।
सरोगेसी और प्राकृतिक गर्भधारण का दुर्लभ संयोग
इस पूरे मामले की शुरुआत एक सरोगेसी समझौते के साथ हुई थी। क्वींसलैंड की रहने वाली एक महिला, जो पहले से ही अपने पति के साथ पांच बच्चों की मां थी, ने एक ऐसे दंपति की मदद करने का फैसला किया जो बच्चा चाहने के बावजूद गर्भाशय न होने के कारण गर्भधारण करने में असमर्थ थे। दोनों परिवारों के बीच अल्ट्रुइस्टिक सरोगेसी यानी बिना किसी व्यावसायिक लेन-देन वाली सरोगेसी पर सहमति बनी।
अप्रैल 2025 में चिकित्सा प्रक्रिया के तहत इच्छुक दंपति का भ्रूण आईवीएफ (IVF) तकनीक के माध्यम से सरोगेट महिला के गर्भ में प्रत्यारोपित किया गया। हालांकि, इसी दौरान एक अप्रत्याशित और दुर्लभ घटना घटी। उस प्रक्रिया के दौरान महिला स्वाभाविक रूप से भी गर्भवती हो गई। नतीजतन, महिला के गर्भ में दो भ्रूण विकसित होने लगे, जिनमें से एक आईवीएफ तकनीक से था और दूसरा प्राकृतिक रूप से गर्भधारण करने के कारण।
जांच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा
आईवीएफ प्रक्रिया के लगभग दो हफ्ते बाद जब महिला का अल्ट्रासाउंड किया गया, तो डॉक्टरों को गर्भ में दो भ्रूण दिखाई दिए। आगे की गहन जांच के बाद जो तथ्य सामने आए, वे चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से बेहद असामान्य थे। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि गर्भ में पल रही एक बच्ची आईवीएफ तकनीक से थी और उसका जैविक संबंध उन इच्छुक दंपतियों से था जिनके लिए महिला सरोगेट बनी थी। वहीं, दूसरा बच्चा, जो एक लड़का था, वह प्राकृतिक गर्भधारण का परिणाम था और उसका जैविक संबंध उस महिला और उसके पति से था जिसने उसे जन्म दिया था।
कानूनी पहेली और कानून की व्याख्या का संकट
नवंबर 2025 में एक ही दिन सी-सेक्शन प्रक्रिया के जरिए दोनों बच्चों का जन्म हुआ। हालांकि दोनों बच्चों का पालन-पोषण अब उनके संबंधित जैविक माता-पिता अलग-अलग घरों में कर रहे हैं और दोनों परिवारों के बीच बच्चों की कस्टडी को लेकर कोई आपसी विवाद नहीं है, फिर भी यह मामला अदालत की दहलीज तक पहुंच गया।
मामले के अदालत पहुंचने का मुख्य कारण क्वींसलैंड का मौजूदा सरोगेसी कानून था। कानून के नियमों के अनुसार, सरोगेसी से पैदा हुए जुड़वां बच्चों को अलग-अलग माता-पिता के पास नहीं भेजा जा सकता है। सरोगेसी अधिनियम में 'बर्थ सिब्लिंग्स' यानी एक ही गर्भावस्था से जन्मे भाई-बहनों को लेकर एक विशेष परिभाषा दी गई है। कानून यह कहता है कि यदि जुड़वां बच्चे सरोगेसी वाली गर्भावस्था से हुए हैं, तो उनका पैरेंटेज ऑर्डर उन दंपतियों के पक्ष में होना चाहिए जिन्होंने सरोगेसी का विकल्प चुना था।
इस मामले में कानूनी पेच यह फंस गया कि हालांकि दोनों बच्चे एक ही गर्भावस्था का हिस्सा थे, लेकिन वे एक ही माध्यम से गर्भ में नहीं आए थे। कानून की इस अस्पष्ट व्याख्या ने न्यायपालिका के सामने एक नई चुनौती पेश कर दी है कि क्या एक ही गर्भ से पैदा हुए दो अलग-अलग जैविक पृष्ठभूमि वाले बच्चों पर एक ही कानून लागू किया जा सकता है। यह केस भविष्य में सरोगेसी कानूनों में संशोधन और नई नियमावली बनाने की दिशा में एक बड़ा आधार बन सकता है।
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