देश की राजनीति में Gen-Z का दबदबा: क्या विधानसभाओं में इनकी आवाज वाकई दमदार है?

सभी राजनीतिक दल नई पीढ़ी यानी Gen-Z को लुभाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, लेकिन नौ प्रमुख राज्यों की विधानसभाओं में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व चौंकाने वाला है। आइए जानते हैं कि आखिर इन सदनों में Gen-Z की मौजूदगी का जमीनी हाल क्या है।

राजनीति के गलियारों में Gen-Z की तलाश

मौजूदा समय में भारत की राजनीति में Gen-Z यानी 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी चर्चा का मुख्य केंद्र बनी हुई है। देश के तमाम बड़े राजनीतिक दल इस पीढ़ी को भविष्य के सबसे निर्णायक वोट बैंक के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि युवाओं को अपने पाले में करने के लिए नई-नई रणनीतियां बनाई जा रही हैं। हालांकि, जब हम विधानसभा के भीतर इनकी वास्तविक भागीदारी और आवाज की पड़ताल करते हैं, तो तस्वीर उम्मीदों से काफी अलग दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा और मध्य प्रदेश तक, बड़ी युवा आबादी होने के बावजूद विधानसभाओं में Gen-Z की मौजूदगी बहुत सीमित है। सवाल यह है कि जिस पीढ़ी के दम पर सत्ता का गणित साधा जा रहा है, उसकी बात उठाने के लिए सदन में पर्याप्त चेहरे क्यों नहीं हैं?

उत्तर प्रदेश: 15 फीसदी आबादी लेकिन नाममात्र का प्रतिनिधित्व

उत्तर प्रदेश की राजनीति में Gen-Z का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, लेकिन 403 सदस्यों वाली विधानसभा में इनका प्रतिनिधित्व बहुत कम है। तकनीकी दृष्टि से वर्तमान में यूपी विधानसभा में Gen-Z के केवल दो विधायक मौजूद हैं। 2022 के चुनाव में 26 वर्ष की आयु में जीत हासिल करने वाले कई नेता अब 30 वर्ष के हो चुके हैं, इसलिए वे इस श्रेणी से बाहर हो गए हैं। इस श्रेणी में प्रमुख नाम गाजीपुर की सैदपुर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विधायक अंकित भारती का है। इसके अलावा, रायबरेली की हरचंदपुर सीट से जीत दर्ज करने वाले राहुल राजपूत भी इस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं। राहुल जब जीतकर आए थे, तो वे राज्य के सबसे युवा विधायकों में से एक थे। प्रदेश की आबादी में इस पीढ़ी की बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद, विधानसभा में इनकी संख्या काफी कम है।

बिहार विधानसभा का गणित

बिहार में युवा चेहरों को लेकर काफी चर्चा होती है, लेकिन 243 सदस्यीय विधानसभा में Gen-Z विधायकों की संख्या मात्र 2 है। यदि हम 40 वर्ष या उससे कम उम्र के कुल विधायकों की बात करें, तो यह संख्या 32 है। इनमें से मैथिली ठाकुर और सोनम रानी मुख्य रूप से Gen-Z का प्रतिनिधित्व करती हैं, क्योंकि दोनों का जन्म 1997 के बाद हुआ है। मैथिली ठाकुर का जन्म 25 जुलाई 2000 को हुआ है और वे अलीनगर सीट से विधायक हैं, जबकि त्रिवेणीगंज से विधायक सोनम रानी का जन्म 5 मई 1998 को हुआ है।

झारखंड और उत्तराखंड में स्थिति

झारखंड विधानसभा में वर्तमान में 81 विधायक हैं, जिनमें से एक भी सदस्य Gen-Z श्रेणी का नहीं है। राज्य में 40 वर्ष से कम उम्र के कुल 5 विधायक जरूर हैं, लेकिन वे सभी मिलेनियल्स पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं। वहीं, उत्तराखंड का हाल भी कुछ ऐसा ही है। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सभी दल युवाओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल सदन में Gen-Z का कोई भी प्रतिनिधि मौजूद नहीं है। यहां की 70 सीटों वाली विधानसभा में गिने-चुने मिलेनियल्स विधायक ही हैं, जो युवा प्रतिनिधित्व का दावा करते हैं।

राजस्थान और हिमाचल प्रदेश: शून्य के करीब भागीदारी

राजस्थान की 200 सीटों वाली विधानसभा में Gen-Z का एकमात्र प्रतिनिधि निर्दलीय विधायक रविन्द्र सिंह भाटी हैं, जो बाड़मेर की शिव सीट से आते हैं। लगभग ढाई करोड़ Gen-Z आबादी वाले इस राज्य में केवल एक विधायक का होना यह दर्शाता है कि यह पीढ़ी अभी भी मुख्यधारा की राजनीति से दूर है। दूसरी ओर, हिमाचल प्रदेश की स्थिति और भी दिलचस्प है। यहां विधानसभा में कोई भी Gen-Z विधायक नहीं है। हालांकि, पंचायत और नगर निकाय स्तर पर इस पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी बढ़ी है। राज्य की सबसे युवा विधायक अनुराधा राणा 33 वर्ष की हैं, जिनका जन्म 1933 के दशक से अलग 1990 के बाद के दौर में हुआ है, लेकिन वे आधिकारिक रूप से इस श्रेणी से बाहर हैं। विक्रमादित्य सिंह, दीप राज, लोकेंद्र कुमार और आशीष शर्मा जैसे युवा नेता 30 से 40 वर्ष की आयु के बीच हैं, जिससे राज्य में Gen-Z की सीधी भागीदारी अभी भी शून्य बनी हुई है।

हरियाणा का चुनावी परिदृश्य

हरियाणा की 90 सदस्यीय विधानसभा में स्थिति कुछ बेहतर है, लेकिन आंकड़े फिर भी चिंताजनक हैं। 2024 के आंकड़ों के अनुसार, सदन में 40 साल से कम उम्र के कुल 9 विधायक पहुंचे हैं। इनमें से केवल 1 विधायक ही Gen-Z श्रेणी में आता है। यह आंकड़ा कुल विधानसभा का 0.9 प्रतिशत से भी कम है। कांग्रेस के युवा नेता आदित्य सुरजेवाला इस सूची में सबसे प्रमुख नाम हैं। महज 25 वर्ष की उम्र में कैथल से जीतकर वे विधानसभा पहुंचे हैं। वे न केवल इस बार के सदन के सबसे युवा सदस्य हैं, बल्कि पूरे हरियाणा विधानसभा के सबसे कम उम्र के विधायक भी हैं।

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की तस्वीर

मध्य प्रदेश में कुल 230 सीटें हैं और साल 2023 के चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला था। मोहन यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद राज्य सरकार युवाओं पर केंद्रित नीतियां बना रही है, लेकिन 1997 के बाद जन्मे किसी भी युवा ने अभी तक विधायक के तौर पर जीत हासिल नहीं की है। राज्य की सबसे युवा मंत्री प्रतिमा बागरी हैं, जो 35 वर्ष की आयु में पहली बार विधायक बनी थीं। इसी तरह छत्तीसगढ़ विधानसभा में भी स्थिति समान है। 90 सदस्यीय सदन में वर्तमान में कोई भी Gen-Z विधायक नहीं है। यहां की सबसे युवा मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े हैं, जिनका जन्म 10 नवंबर 1992 को हुआ था और वे भटगांव सीट का प्रतिनिधित्व करती हैं। निष्कर्ष के तौर पर देखें तो, भले ही दल Gen-Z को भविष्य के मतदाता मान रहे हों, लेकिन सदन की कुर्सियों तक पहुंचने का सफर अभी इस पीढ़ी के लिए काफी लंबा है।

https://hindi.news18.com/news/nation/political-party-eyes-on-youth-vote-bank-yet-gen-z-mla-in-state-assemblies-are-few-9-state-shocking-data-10786858.html