भारत की नई रक्षा रणनीति और भविष्य की तैयारी
भारतीय रक्षा क्षेत्र में एक अत्यंत महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव किया गया है, जो आने वाले समय में देश की युद्ध क्षमता यानी वार सस्टेनेंस कैपेबिलिटी को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक बड़ा फैसला लेते हुए DRDO द्वारा विकसित की गई पारंपरिक मिसाइल प्रणालियों की तकनीक को भारतीय निजी उद्योग को ट्रांसफर करने की मंजूरी प्रदान कर दी है। यह केवल निजी कंपनियों को उत्पादन की अनुमति देने का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की मिसाइल रिप्लेनिशमेंट और सर्ज प्रोडक्शन कैपेसिटी को मजबूत करने की एक व्यापक रणनीतिक योजना है। वर्तमान में युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आधुनिक संघर्ष अब कुछ दिनों या हफ्तों में समाप्त नहीं होते हैं, जैसा कि हम यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्धों में देख रहे हैं। ऐसे में किसी भी देश की वास्तविक शक्ति केवल शुरुआती मिसाइल स्टॉक तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह इस पर निर्भर करती है कि वह युद्ध के दौरान हथियारों का उत्पादन कितनी तेजी से बढ़ा सकता है।
युद्ध के दौरान मिसाइल स्टॉक से अधिक महत्वपूर्ण है उत्पादन क्षमता
किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष में मिसाइलों की खपत अनुमान से कहीं अधिक हो सकती है। लंबी दूरी की स्ट्राइक, एयर डिफेंस और एंटी-शिप ऑपरेशंस के लिए निरंतर मिसाइलों की आवश्यकता बनी रहती है। युद्ध शुरू होने के समय जो वार रिजर्व जमा किया जाता है, वह सीमित होता है। एक निश्चित समय के बाद, सैन्य क्षमता पूरी तरह से इस बात पर टिक जाती है कि देश अपने द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियारों को कितनी जल्दी दोबारा तैयार कर सकता है। DRDO की तकनीक को निजी उद्योगों तक पहुंचाने का फैसला इसी दूरदर्शिता का परिणाम है। यदि भारत की कई निजी कंपनियां अलग-अलग मिसाइल प्रणालियों के निर्माण में सक्षम होंगी, तो देश एक मजबूत डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस खड़ा करने में सफल हो जाएगा। इससे जरूरत पड़ने पर उत्पादन को तेजी से बढ़ाने यानी सर्ज प्रोडक्शन की क्षमता विकसित होगी।
अमेरिका-ईरान और रूस-यूक्रेन युद्ध से मिले कड़े सबक
हालिया वैश्विक संघर्षों ने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि मिसाइलों की कमी युद्ध का परिणाम बदल सकती है। अमेरिका-ईरान संघर्ष (2026) के दौरान अमेरिकी सेना पर मिसाइल इंटरसेप्टर्स का भारी दबाव देखा गया। पेंटागन के आकलन के अनुसार, अमेरिका ने इजराइल की सुरक्षा में बड़ी संख्या में THAAD, SM-3 और SM-6 इंटरसेप्टर्स का उपयोग किया। रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने अपने THAAD स्टॉक का लगभग आधा हिस्सा इस्तेमाल कर लिया था। अगस्त 2026 तक ऐसी चिंताएं सामने आईं कि अमेरिका के क्रिटिकल इंटरसेप्टर स्टॉक का 80 प्रतिशत तक खर्च हो चुका है। इससे यह स्पष्ट हुआ कि सिर्फ इंटरसेप्टर की संख्या काफी नहीं है, बल्कि उत्पादन और तेजी से आपूर्ति सुनिश्चित करना अनिवार्य है। दूसरी ओर, रूस-यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन को भी इसी चुनौती का सामना करना पड़ा है। अगस्त 2026 में फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन भारी पैट्रियट इंटरसेप्टर की कमी से जूझ रहा था, जबकि रूस अपनी मिसाइल उत्पादन क्षमता को बढ़ा रहा था। यूक्रेनी खुफिया एजेंसी के मुताबिक, रूस की प्रमुख मिसाइल प्रणालियों का उत्पादन निर्धारित लक्ष्यों से 10 से 20 प्रतिशत अधिक चल रहा था।
उत्पादन का विकेंद्रीकरण: एक निर्माता से कई केंद्र
अब तक भारतीय रक्षा क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सरकारी संस्थानों तक सीमित रहा है। हालांकि निजी क्षेत्र ने भी रक्षा निर्माण में कदम रखा है, लेकिन मिसाइल प्रणालियों के पूर्ण उत्पादन में उनकी भूमिका का विस्तार एक ऐतिहासिक कदम है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि युद्धकाल में यदि किसी एक उत्पादन केंद्र पर दबाव बढ़ता है या सप्लाई चेन में बाधा आती है, तो अन्य केंद्र उस कमी को पूरा कर सकेंगे। इससे भारत की रणनीति धीरे-धीरे स्टॉक की संख्या से बदलकर सर्ज प्रोडक्शन कैपेसिटी की ओर मुड़ रही है।
DRDO और निजी क्षेत्र का तालमेल
इस नई व्यवस्था में जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। DRDO का मुख्य ध्यान रिसर्च, डेवलपमेंट और अगली पीढ़ी की तकनीकों को विकसित करने पर रहेगा। वहीं, निजी उद्योग मैन्युफैक्चरिंग, स्केल और सप्लाई चेन मैनेजमेंट का कार्य संभालेंगे। इससे DRDO पर उत्पादन का बोझ कम होगा और वह नई रक्षा तकनीकों को तेजी से विकसित करने में अपना अधिक समय दे पाएगा। यह मॉडल भारत को एक ऐसी व्यवस्था बनाने में मदद करेगा जिसमें नई तकनीक के शोध से लेकर उसे बड़े पैमाने पर उत्पादन में लाने तक का समय कम से कम हो।
DcPP मॉडल से औद्योगिक गहराई का विकास
डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर यानी DcPP मॉडल इस पूरी नीति की रीढ़ है। इसमें निजी कंपनियां केवल मिसाइल बनाने वाली इकाई नहीं होंगी, बल्कि वे विकास के शुरुआती चरण, प्रोटोटाइप और उत्पादन की विभिन्न प्रक्रियाओं में DRDO के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करेंगी। इससे कंपनियों के भीतर डिजाइन की समझ, सिस्टम इंटीग्रेशन और एक उन्नत रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा। लंबी लड़ाई लड़ने के लिए ऐसी औद्योगिक गहराई होना अनिवार्य है। मिसाइल की सप्लाई चेन केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि प्रोपल्शन, इलेक्ट्रॉनिक्स, गाइडेंस, सेंसर और कंपोजिट जैसी कई जटिल कड़ियों का समूह है। निजी कंपनियों के साथ MSMEs का जुड़ाव भारत की सप्लाई चेन को और अधिक लचीला बनाएगा।
प्रमुख निजी कंपनियां जो इस बदलाव में सक्षम हैं
भारत की कई दिग्गज निजी कंपनियां पहले से ही इस दिशा में काम कर रही हैं:
- टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL): यह कंपनी एयरोस्पेस और डिफेंस में अपनी मजबूत उपस्थिति रखती है और मिसाइल इंटीग्रेशन तथा आर्मर्ड व्हीकल्स के निर्माण में माहिर है।
- लार्सन एंड टुब्रो (L&T): गाइडेड वेपन सिस्टम्स और रडार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कंपनी ने भारी निवेश किया है। ज़ोरावर टैंक इसका एक बेहतरीन उदाहरण है।
- अदानी डिफेंस एंड एयरोस्पेस: कंपनी ने मध्य प्रदेश के शिवपुरी में 5 जुलाई 2026 को ₹2,500 करोड़ की लागत से दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा निजी मिसाइल मैन्युफैक्चरिंग कॉम्प्लेक्स बनाने की आधारशिला रखी है।
- कल्याणी ग्रुप और भारत फोर्ज: तोप प्रणालियों और भारी रक्षा उपकरणों में इनकी विशेषज्ञता विश्व स्तरीय है। इन्होंने राफेल के साथ मिलकर एंटी-टैंक मिसाइल फैसिलिटी भी विकसित की है।
- सोलर डिफेंस एंड एयरोस्पेस और ICOMM Tele: ये कंपनियां मिसाइल प्रोपेलेंट, रॉकेट सिस्टम और हाई-एंड गाइडेंस सिस्टम जैसे सूक्ष्म क्षेत्रों में नई तकनीक के साथ आगे बढ़ रही हैं।
निष्कर्ष: आत्मनिर्भरता से Wartime Capacity तक का सफर
भारत का यह फैसला स्पष्ट करता है कि अब रक्षा आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल आयात बंद करना नहीं, बल्कि युद्ध के समय की औद्योगिक तैयारियों को पूर्ण रूप से सक्षम बनाना है। भविष्य का युद्ध केवल सीमा पर तैनात जवानों का नहीं, बल्कि डेटा, ड्रोन, मिसाइल और लगातार हथियारों की आपूर्ति का खेल होगा। भारत की असली ताकत अब इस बात में निहित होगी कि वह संघर्ष के दौरान कितनी तेजी से अपनी मिसाइल क्षमता को रिप्लेनिश कर सकता है। यह 'स्टॉकपाइल से सर्ज कैपेसिटी' की ओर बढ़ा गया एक निर्णायक कदम है, जो भारत को एक वैश्विक रक्षा पावरहाउस बनाने में मील का पत्थर साबित होगा।
https://hindi.news18.com/news/defence/india-prepares-for-long-war-drdo-missile-tech-private-sector-ws-l-10784129.html