परीक्षा परिणामों से मचा हड़कंप
बिहार में चिकित्सा शिक्षा से जुड़े प्राइवेट कॉलेजों के हालिया परिणामों ने पूरे राज्य में खलबली मचा दी है। बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय यानी BUHS से मान्यता प्राप्त निजी संस्थानों के बीएससी नर्सिंग और बीफार्मा के छात्रों के सामने एक ऐसा संकट खड़ा हो गया है जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। जब रिजल्ट घोषित किया गया, तो हजारों की संख्या में छात्र-छात्राओं की मार्कशीट पर शून्य नंबर दर्ज थे। इस परिणाम को देखकर विद्यार्थियों का गुस्सा भड़क गया और उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
सड़कों पर उतरे छात्र
परिणाम आने के बाद पटना, समस्तीपुर, जहानाबाद और रोहतास जैसे प्रमुख जिलों में छात्र-छात्राओं ने सड़कों पर उतरकर जमकर विरोध प्रदर्शन किया है। छात्रों का स्पष्ट आरोप है कि उन्होंने अपनी परीक्षाओं के दौरान सभी सवालों के उत्तर लिखे थे और परीक्षा कॉपियों में काफी कुछ दर्ज किया था, इसके बावजूद उन्हें 0, 3, 4 या 5 जैसे बेहद कम अंक दिए गए हैं। छात्रों की मांग है कि उनकी कॉपियों की दोबारा निष्पक्ष जांच कराई जाए क्योंकि वे अपने अंकों से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं।
बड़े स्तर पर फेल हुए छात्र
इस पूरे मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई प्राइवेट कॉलेजों में 50 फीसदी से लेकर 80 से 90 फीसदी तक छात्र अनुत्तीर्ण हो गए हैं। रिजल्ट आते ही छात्रों के चेहरे पर मायूसी छा गई और उन्होंने इसे अपनी मेहनत का अपमान बताया है। प्रदर्शन कर रहे छात्रों का कहना है कि उन्होंने पूरे साल पढ़ाई की, लेकिन परिणाम शून्य मिलना किसी बड़े घोटाले या गड़बड़ी की ओर इशारा करता है। वे अब विश्वविद्यालय प्रशासन से कॉपियों की फिर से मूल्यांकन प्रक्रिया शुरू करने की मांग पर अड़े हुए हैं।
दावों और सच्चाई का अंतर
इस विवाद के बीच एक और हैरान करने वाली बात सामने आई है। प्रदर्शनकारी छात्रों और सूत्रों के अनुसार, कई प्राइवेट संस्थानों में प्रवेश के समय यह भरोसा दिलाया जाता था कि उनकी परीक्षा और सेंटर मैनेज हो जाएंगे। छात्रों को इस तरह का आश्वासन दिया गया था कि उन्हें परीक्षा में कोई परेशानी नहीं होगी। हालांकि, इस बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने परीक्षा और मूल्यांकन के दौरान बहुत अधिक सख्ती दिखाई है। कड़े नियमों के लागू होते ही उन तमाम दावों की पोल खुल गई है जो छात्रों को गुमराह करने के लिए किए गए थे।
संसाधनों और शिक्षकों की कमी
शिक्षा के जानकारों का मानना है कि इस खराब प्रदर्शन के पीछे प्राइवेट कॉलेजों की लचर व्यवस्था एक प्रमुख कारण है। कई नर्सिंग और फार्मेसी कॉलेजों में केवल कागजों पर ही पढ़ाई चलती है। वहां बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है और पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षकों की कमी है। सही दिशा-निर्देश और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा न मिल पाने के कारण छात्र परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते। जब विश्वविद्यालय की ओर से निष्पक्ष और सख्त तरीके से परीक्षाएं आयोजित की गईं, तो इन संस्थानों में पढ़ने वाले छात्रों की वास्तविक योग्यता सामने आ गई।
विश्वविद्यालय प्रशासन की दो टूक
हंगामे और विरोध प्रदर्शनों के बीच बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। उनका कहना है कि पिछली व्यवस्थाओं में क्या होता था, उससे वर्तमान प्रक्रिया का कोई संबंध नहीं है। अब परीक्षाओं का आयोजन और कॉपियों का मूल्यांकन पूरी पारदर्शिता और सख्ती के साथ किया जा रहा है। विश्वविद्यालय ने उन छात्रों को सलाह दी है जिन्हें अपने अंकों पर संदेह है कि वे तय सरकारी प्रक्रिया का पालन करते हुए स्क्रूटनी या पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर सकते हैं। फिलहाल, इस पूरे प्रकरण ने बिहार की पैरामेडिकल और मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
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