पद्म श्री मुकुंद नायक: अभावों में पला बढ़ा, नागपुरी संगीत से दुनिया भर में बनाई अपनी अलग पहचान

झारखंड के प्रसिद्ध लोक कलाकार मुकुंद नायक ने अपनी मेहनत और नागपुरी संगीत के प्रति समर्पण से न केवल देश में, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी अपनी पहचान बनाई है।

नागपुरी लोक संगीत के वैश्विक दूत

पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित मुकुंद नायक आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उन्होंने अपनी कला और नागपुरी लोक संगीत के प्रति अपने अटूट प्रेम के माध्यम से झारखंड की संस्कृति को विश्व पटल पर गौरवान्वित किया है। मुकुंद नायक ने न केवल हजारों गीतों की रचना की है, बल्कि एक दर्जन से अधिक देशों की यात्रा कर अपनी प्रस्तुतियों से अंतरराष्ट्रीय दर्शकों का मन मोह लिया है। उनका जीवन संघर्ष, प्रेरणा और कला के प्रति समर्पण की एक मिसाल है।

गरीबी में बीता बचपन और संगीत की शुरुआत

मुकुंद नायक का जन्म 1949 में सिमडेगा जिले के बोकबा गांव में हुआ था। वे बताते हैं कि उनका शुरुआती जीवन बेहद कठिन परिस्थितियों और अभावों के बीच बीता। वे जिस परिवार से आते थे, उनके माता-पिता किसान थे। बचपन इतना संघर्षपूर्ण था कि कई वर्षों तक उनके पास पहनने के लिए जूते तक नहीं थे। इसके बावजूद, उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में संगीत की गहरी समझ और संस्कार मिले। मुकुंद नायक याद करते हैं कि उनके पिता स्वयं भी गाते थे, जिससे घर का वातावरण हमेशा संगीतमय बना रहता था। महज 5 वर्ष की आयु से ही उन्होंने गाना और बजाना सीखना शुरू कर दिया था। मेलों में लोगों को नागपुरी गीत गाते देख ही उनकी रुचि इस विधा में बढ़ती चली गई और धीरे-धीरे उन्होंने इसे अपने जीवन का ध्येय बना लिया।

शिक्षा और करियर का सफर

मुकुंद नायक की शिक्षा सिमडेगा, चाईबासा और देवघर जैसे विभिन्न स्थानों पर पूरी हुई। अपनी कला के प्रति समर्पित रहने के साथ-साथ उन्होंने सरकारी सेवा में भी योगदान दिया। वे झारखंड सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग से सेवानिवृत्त हुए हैं। पेशेवर जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी उन्होंने अपनी लोक संस्कृति को कभी पीछे नहीं छोड़ा। उन्होंने न केवल मंच पर प्रदर्शन किया, बल्कि लोक गीतों की रचना में भी अपना बड़ा योगदान दिया है।

भाषा के प्रति सम्मान का संघर्ष

मुकुंद नायक याद करते हैं कि एक समय ऐसा था जब समाज के कई लोग नागपुरी भाषा को उपेक्षा की दृष्टि से देखते थे और इसे बोलने वालों का उपहास उड़ाया जाता था। उन्होंने एक लंबा समय इस हीन भावना को मिटाने में बिताया। उनके अनुसार, नागपुरी भाषा उनकी आत्मा की अभिव्यक्ति है और जो भाषा हृदय से निकलती है, वही वास्तव में आत्मा की भाषा कहलाती है। मुकुंद नायक का सदैव यह सपना रहा कि नागपुरी भाषा को वह मान-सम्मान और प्रतिष्ठा मिले जिसकी वह हकदार है। आज उनकी मेहनत रंग लाई है और नागपुरी में अनगिनत बेहतरीन रचनाएं लिखी जा रही हैं।

पुरस्कार और उपलब्धियां

उनकी उत्कृष्ट कला यात्रा के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक पद्म श्री से नवाजा गया है। इसके अलावा उन्हें झारखंड गौरव सम्मान, झारखंड रत्न और अन्य सांस्कृतिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वर्ष 2019 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके पिता द्वारा बनाए गए सकारात्मक पारिवारिक माहौल ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया, जिससे वे अभावों को पीछे छोड़कर संगीत की साधना में लीन रह सके। आज मुकुंद नायक झारखंड की सांस्कृतिक पहचान का पर्याय बन चुके हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए एक आदर्श के रूप में स्थापित हैं।

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