ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव
पाकिस्तान के दमनकारी शासन के खिलाफ बलूचिस्तान के लोगों का संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। इस कठिन समय में बलूचिस्तान की जनता की निगाहें भारत पर टिकी हैं। यह भरोसा अचानक नहीं बना है, बल्कि इसके पीछे हजारों साल पुराना साझा इतिहास और संस्कृति है। बलूचिस्तान और भारत के बीच गहरे जुड़ाव के 5 मुख्य आधार या गेटवे हैं, जो आज भी इन रिश्तों को जिंदा रखे हुए हैं।
मेहरगढ़ सभ्यता का महत्व
बलूचिस्तान का मेहरगढ़ इलाका सिंधु घाटी सभ्यता से भी पुराना माना जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार, मेहरगढ़ की संस्कृति और वहां के अवशेषों का सीधा संबंध प्राचीन भारतीय उपमहाद्वीप की प्रगतिशील सभ्यताओं से जुड़ता है। यह स्थल इस बात का प्रमाण है कि भौगोलिक सीमाओं के बनने से पहले ही ये दोनों क्षेत्र एक ही सांस्कृतिक इकाई का हिस्सा थे।
हिंगलाज माता का शक्तिपीठ
बलूचिस्तान में स्थित हिंगलाज माता का मंदिर भारत के लाखों हिंदुओं के लिए बेहद पवित्र है। यह 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। खास बात यह है कि स्थानीय बलूच मुसलमान भी इस स्थान को अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और इसे 'नानी मां का मंदिर' कहकर पुकारते हैं। यह धार्मिक जुड़ाव सदियों से दोनों संस्कृतियों के बीच सौहार्द का सेतु बना हुआ है।
भाषा का अनूठा नाता
भाषाविदों ने यह पाया है कि बलूचिस्तान में बोली जाने वाली 'ब्राहुई' भाषा का सीधा संबंध दक्षिण भारत के द्रविड़ भाषा परिवार से है। इतने बड़े भौगोलिक फासले के बावजूद एक ही भाषा परिवार का हिस्सा होना, इस बात की ओर इशारा करता है कि प्राचीन काल में जनसमूहों का आपस में गहरा आवागमन रहा होगा।
साझा विरासत के सूत्र
बलूचिस्तान और भारत को जोड़ने वाले इन संबंधों को केवल सीमाओं के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। हिंगलाज माता की आस्था से लेकर मेहरगढ़ की प्राचीनता तक, ये सभी कड़ीयां बताती हैं कि बलूचिस्तान का गौरवशाली इतिहास और भारत की संस्कृति एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। आज भी बलूचिस्तान के लोग भारत के प्रति जो अपनापन महसूस करते हैं, उसकी जड़ें इन्हीं ऐतिहासिक तथ्यों में निहित हैं।
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