भारत में विधायक कितना कमाते हैं? सैलरी से लेकर गाड़ी-घर तक, जानिए हर राज्य का अलग गणित

भारत में विधायकों का वेतन और सुविधाएं हर राज्य के अनुसार अलग-अलग हैं, जहां तेलंगाना में यह 2.75 लाख रुपये तक पहुंच जाता है तो वहीं केरल में यह 70 हजार रुपये के आसपास है। तमिलनाडु सरकार के हालिया फैसले के बाद से देशभर के विधायकों को मिलने वाले वेतन, भत्तों और सरकारी सुविधाओं पर बहस फिर से तेज हो गई है।

तमिलनाडु के फैसले से बढ़ी चर्चा

तमिलनाडु में थलापति विजय सरकार की ओर से लिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद देशभर के विधायकों के वेतन और सुविधाओं को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। सरकार ने राज्य के सभी 234 विधायकों को सरकारी गाड़ी मुहैया कराने के साथ ही हर महीने 1 लाख रुपये का अतिरिक्त भत्ता देने की घोषणा की है। इस नई व्यवस्था के तहत, विधायकों को गाड़ी, ईंधन और उसके रख-रखाव के खर्च के लिए प्रतिमाह 75,000 रुपये और एक सहायक के वेतन के तौर पर 25,000 रुपये दिए जाएंगे। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार ने विधायकों के लिए हेल्थ इंश्योरेंस कवर को भी पहले के मुकाबले बेहतर बनाया है। इस फैसले ने इस ओर ध्यान खींचा है कि भारत के अलग-अलग राज्यों में विधायकों की कमाई और उन्हें मिलने वाली सुविधाएं एक-दूसरे से कितनी भिन्न हैं।

विधायकों के वेतन का संवैधानिक आधार

यह समझना बेहद जरूरी है कि भारत में विधायकों के वेतन और भत्तों का निर्धारण पूरी तरह से राज्य का विषय है। जहां देश के सांसदों का वेतन और अन्य सुविधाएं संसद द्वारा तय की जाती हैं, वहीं विधायकों के मामले में यह शक्ति संबंधित राज्य की विधानसभा के पास होती है। हर राज्य की अपनी विधानसभा अलग कानून बनाकर वेतन और भत्तों का ढांचा तैयार करती है। यही कारण है कि पूरे भारत में विधायकों के वेतन में कोई एकरूपता देखने को नहीं मिलती है। पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश राज्यों में विधायक स्वयं ही कानून पारित करके अपनी सैलरी और भत्तों में संशोधन करते हैं, जिसके चलते राज्यों के बीच कुल पैकेज में भारी अंतर पैदा हो गया है।

तेलंगाना और केरल: वेतन का अंतर

अगर हम देश के अलग-अलग राज्यों की तुलना करें, तो वेतन में व्यापक भिन्नता स्पष्ट रूप से नजर आती है। वर्ष 2025 में द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तेलंगाना के विधायक देश में सबसे अधिक वेतन पाने वाले जनप्रतिनिधियों की सूची में शीर्ष पर रहे हैं। तेलंगाना में विधायकों का मासिक वेतन 2.75 लाख रुपये तक है। यह राशि के चंद्रशेखर राव की अध्यक्षता वाली बीआरएस सरकार के समय 1.25 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.75 लाख रुपये की गई थी। इसके विपरीत, केरल के विधायक देश में सबसे कम वेतन पाने वाले विधायकों में गिने जाते हैं। केरल में एक विधायक का कुल मासिक वेतन लगभग 70,000 रुपये होता है। इस सैलरी के भीतर ही 2,000 रुपये का फिक्स्ड अलाउंस, 25,000 रुपये का निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 20,000 रुपये का न्यूनतम ट्रैवल अलाउंस, 11,000 रुपये का टेलीफोन भत्ता, 4,000 रुपये का सूचना भत्ता और 8,000 रुपये का सम्चुअरी अलाउंस शामिल होता है। इसके साथ ही उन्हें यात्रा के लिए दैनिक भत्ते भी मिलते हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह आंकड़ा अन्य राज्यों की तुलना में काफी कम रहता है।

विधायकों को मिलने वाली मुख्य सुविधाएं

विधायक को मिलने वाला केवल मूल वेतन ही उनकी वास्तविक कमाई नहीं होती है, बल्कि उन्हें मिलने वाले भत्ते भी सरकारी खजाने पर बड़ा असर डालते हैं। एक विधायक को मिलने वाली प्रमुख सुविधाओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित खर्चों को पूरा करने के लिए कॉन्स्टिट्यूएंसी अलाउंस।
  • कार्यालय संचालन और सहायक स्टाफ के खर्च के लिए सेक्रेटेरियल या ऑफिस अलाउंस।
  • सरकारी दौरों और बैठकों के लिए यात्रा और परिवहन भत्ता।
  • विधानसभा सत्रों और समितियों की बैठकों में हिस्सा लेने के लिए प्रतिदिन मिलने वाला डेली अलाउंस।
  • राज्य की राजधानी में रहने के लिए सरकारी आवास या घर का किराया।
  • विधायक और उनके परिवार के सदस्यों के लिए चिकित्सा सुविधाएं।
  • टेलीफोन, इंटरनेट और अन्य संचार साधनों के लिए विशेष भत्ता।
  • सरकारी वाहन की सुविधा या वाहन खरीदने के लिए विशेष भत्ते।
  • ऑफिस स्टेशनरी और अन्य जरूरी सामानों के लिए अलग से बजट।
  • कार्यकाल समाप्त होने के बाद राज्य के नियमों के अनुसार मिलने वाली पेंशन।

हरियाणा और ओडिशा का मॉडल

कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां विधायकों को पारंपरिक वेतन ढांचे से हटकर विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। उदाहरण के तौर पर हरियाणा में विधायकों को घर या गाड़ी खरीदने के लिए 1 करोड़ रुपये तक का लोन लेने की विशेष सुविधा प्रदान की गई है। इसके अलावा, विधायक और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मेडिकल उपचार की बेहतर सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं। इतना ही नहीं, राज्य की ओर से घर के नवीनीकरण और मरम्मत के लिए भी एडवांस राशि की व्यवस्था है। दूसरी ओर, ओडिशा की MLA लोकल एरिया डेवलपमेंट स्कीम का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है। 2025-26 से, राज्य के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के लिए 5 करोड़ रुपये का फंड आवंटित किया जाता है। हालांकि, इसे विधायक की व्यक्तिगत सैलरी नहीं माना जाना चाहिए। यह जनता के टैक्स का पैसा है जो शिक्षा, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास कार्यों के लिए खर्च किया जाता है।

वेतन में इतना अंतर क्यों है?

देशभर में विधायकों के वेतन में भारी अंतर के पीछे कई व्यावहारिक और राजनीतिक कारण हैं। पहला कारण राज्य की आर्थिक स्थिति है, जहां अधिक वित्तीय संसाधन वाले राज्य अपने विधायकों को बेहतर वेतन देने की क्षमता रखते हैं। दूसरा कारण राज्यों के भीतर रहने और काम करने की लागत है। जिन राज्यों में जीवन यापन का खर्च अधिक है, वहां के विधायकों के भत्तों में स्वतः ही वृद्धि कर दी जाती है। तीसरा, भौगोलिक स्थिति और निर्वाचन क्षेत्र का आकार भी बड़ी भूमिका निभाता है। बड़े और दूर-दराज के क्षेत्रों में काम करने वाले विधायकों का यात्रा और संपर्क का खर्च अधिक होता है, जिसे पूरा करने के लिए सरकारें समय-समय पर भत्तों में बदलाव करती रहती हैं। अंत में, राजनीतिक प्राथमिकताओं का भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि कई बार स्वयं विधायक अपनी कार्यक्षमता और महंगाई का हवाला देते हुए अपने वेतन में वृद्धि की मांग करते हैं, जिसे विधानसभा में बहुमत के माध्यम से पास कर लिया जाता है।

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