रक्षा बंधन और भद्रा का महत्व
भाई और बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक रक्षा बंधन का त्योहार हर साल धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र, सुख और सौभाग्य की प्रार्थना करते हुए उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं। सनातन धर्म की परंपरा के अनुसार, हर मांगलिक कार्य को करने से पहले शुभ मुहूर्त का विचार करना अनिवार्य माना गया है। रक्षा बंधन के अवसर पर भी भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा काल में राखी बांधना शुभ नहीं माना जाता है। आखिर भद्रा कौन हैं और उनके समय को अशुभ क्यों माना जाता है, आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
भद्रा का पौराणिक परिचय
धार्मिक कथाओं और पुराणों के अनुसार, भद्रा सूर्य देव और छाया की पुत्री हैं, जिन्हें शनिदेव की बहन माना गया है। शास्त्रों में भद्रा का स्वरूप काफी उग्र बताया गया है। उनका रंग काला, बाल लंबे और दांत बड़े बताए गए हैं। मान्यता है कि जन्म लेते ही भद्रा यज्ञ और सभी शुभ व मांगलिक कार्यों में विघ्न डालने लगी थीं। उनके उग्र स्वभाव और कार्यों के कारण सूर्य देव काफी चिंतित रहते थे। कई विवाह प्रस्तावों के ठुकराए जाने के बाद, सूर्य देव ने इस समस्या के समाधान के लिए ब्रह्मा जी से परामर्श किया।
ब्रह्मा जी ने दिया स्थान
मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने भद्रा के लिए एक निश्चित स्थान निर्धारित किया। उन्होंने भद्रा को निर्देश दिया कि वे पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल लोक में एक तय समय के दौरान ही विचरण करें। ब्रह्मा जी ने भद्रा से कहा कि यदि कोई व्यक्ति तुम्हारे समय में शुभ कार्य करे और तुम्हारा सम्मान न करे, तो तुम उस कार्य में बाधा उत्पन्न कर सकती हो। इसी आदेश के तहत भद्रा को हिंदू पंचांग के विष्टि करण में विशेष स्थान प्राप्त हुआ।
पंचांग और विष्टि करण
हिंदू पंचांग के पांच मुख्य अंग होते हैं, जिनमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण शामिल हैं। एक तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है और हर तिथि में दो करण होते हैं। कुल 11 करण माने गए हैं। इनमें बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि को चर करण कहा जाता है। शेष चार करण शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न स्थिर माने गए हैं। ज्योतिष शास्त्र में इसी विष्टि करण को भद्रा कहा गया है।
भद्रा कब प्रभावी रहती है?
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भद्रा की स्थिति विभिन्न तिथियों के आधार पर तय होती है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी और पूर्णिमा के पूर्वार्ध, चतुर्थी और एकादशी के उत्तरार्ध, तथा कृष्ण पक्ष की तृतीया और दशमी के उत्तरार्ध में भद्रा का प्रभाव रहता है। इसके अतिरिक्त, सप्तमी और चतुर्दशी के पूर्वार्ध में भी भद्रा का वास माना जाता है। पृथ्वी लोक पर भद्रा का समय किसी भी शुभ कार्य के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है।
राखी क्यों नहीं बांधी जाती भद्रा काल में?
भद्रा को अत्यंत उग्र और नकारात्मक माना जाता है। यही कारण है कि विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यक्रमों के साथ-साथ रक्षा बंधन पर भी राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है। पौराणिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि रावण की बहन शूर्पणखा ने भद्रा काल में ही उसे राखी बांधी थी, जिसके परिणामस्वरूप बाद में रावण का विनाश हुआ।
रक्षा बंधन 2026 की स्थिति
इस वर्ष रक्षा बंधन का त्योहार 28 अगस्त, दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा। ज्योतिष गणनाओं के अनुसार, इस दिन भद्रा का प्रभाव सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगा। अतः भद्रा का दोष नहीं रहेगा और राखी बांधने के लिए पूरा दिन शुभ बना रहेगा। पंचांग के अनुसार, इस दिन सुबह का समय पूरी तरह भद्रा से मुक्त है, जिससे राखी बांधने में कोई बाधा नहीं आएगी।
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