कानून और न्याय व्यवस्था में एक पुरानी कहावत है कि न्याय मिलने में भले ही देर हो जाए, लेकिन अंततः सत्य की ही जीत होती है। मध्य प्रदेश की एक महिला डॉक्टर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है, जिन्होंने अपनी योग्यता को साबित करने और अपनी मेहनत की कमाई हुई डिग्री को हासिल करने के लिए जीवन के बहुमूल्य 13 साल अदालती कमरों और फाइलों के चक्कर काटते हुए बिता दिए। शैलजा पांडे ने साल 2013 में ही अपनी MBBS की पढ़ाई पूरी कर ली थी, लेकिन प्रशासनिक अड़ंगों और नियमों की उलझन के कारण उन्हें अपनी डिग्री पाने के लिए साल 2026 तक का लंबा इंतजार करना पड़ा। आखिरकार, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने उन्हें यह बड़ी राहत दी है।
डोमिसाइल विवाद और 13 साल का लंबा कानूनी संघर्ष
यह पूरा मामला प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता का एक बड़ा उदाहरण है। शैलजा पांडे ने मध्य प्रदेश के एक प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया वैध मूल निवास प्रमाण पत्र (डोमिसाइल) जमा किया था। उन्होंने एडमिशन के वक्त अपनी हर जानकारी पूरी पारदर्शिता और ईमानदारी के साथ कॉलेज प्रशासन को सौंपी थी। उन्होंने पूरी लगन के साथ MBBS की पढ़ाई और उसके बाद की इंटर्नशिप भी पूरी कर ली। लेकिन जब वह अपनी पढ़ाई के अंतिम छोर पर थीं और डॉक्टर बनने का सपना पूरा होने ही वाला था, तभी कॉलेज प्रशासन ने उनके डोमिसाइल प्रमाण पत्र पर आपत्ति जता दी।
इस प्रशासनिक आपत्ति का नतीजा बेहद गंभीर रहा। कॉलेज प्रबंधन ने 13 जून 2013 को एक बड़ा फैसला लेते हुए शैलजा पांडे का मेडिकल कॉलेज में लिया गया एडमिशन ही रद्द कर दिया। इस एक फैसले ने शैलजा के सालों की मेहनत पर पानी फेर दिया। इसके खिलाफ उन्होंने हार नहीं मानी और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तब से लेकर अब तक, यानी पिछले 13 सालों से वह अदालत में अपने हक की लड़ाई लड़ती रहीं।
हाईकोर्ट ने उठाए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
इस मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ में हुई, जिसमें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल शामिल थे। कोर्ट ने इस मामले को बेहद विशेष और संवेदनशील माना। सुनवाई के दौरान अदालत ने एडमिशन रद्द करने के फैसले पर गहरी नाराजगी जताई और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल खड़े किए।
अदालत ने कहा कि जब छात्रा ने एडमिशन के समय कोई भी जानकारी नहीं छिपाई थी और सभी दस्तावेज ईमानदारी से पेश किए थे, तो इसमें उनकी कोई गलती कैसे हो सकती है? हाईकोर्ट ने पूछा कि:
- प्रमाण पत्र की वैधता की जांच एडमिशन के वक्त क्यों नहीं की गई?
- दस्तावेजों को जारी करने वाले अधिकारियों को नियमों की जांच सही समय पर करनी चाहिए थी, न कि पढ़ाई पूरी होने के बाद।
- जब छात्रा अपनी पूरी पढ़ाई और ट्रेनिंग खत्म कर चुकी थी, तब इतने साल बाद इस मुद्दे को उठाने का क्या औचित्य था?
इन तल्ख टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने 13 जून 2013 के उस पुराने आदेश को सिरे से खारिज कर दिया जिसके तहत शैलजा का एडमिशन रद्द किया गया था। इसके साथ ही कोर्ट ने जबलपुर की रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी को सख्त निर्देश दिया है कि वह शैलजा पांडे की MBBS की मार्कशीट और डिग्री तुरंत जारी करे।
डिग्री तो मिल गई, लेकिन भविष्य की राह में हैं नई चुनौतियां
अदालत के इस ऐतिहासिक फैसले से शैलजा पांडे के सिर से 13 साल पुराना कलंक तो मिट गया है और उन्हें अपनी डिग्री मिलने का रास्ता साफ हो गया है। लेकिन इस लंबी कानूनी लड़ाई ने उनके करियर के सामने एक बेहद पेचीदा और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। डिग्री न होने और स्टेट मेडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन न मिल पाने के कारण, शैलजा पिछले 13 वर्षों से एक भी मरीज का इलाज नहीं कर सकीं और न ही किसी अस्पताल में मेडिकल प्रैक्टिस कर पाईं।
एक डॉक्टर के लिए 13 साल तक मेडिकल फील्ड और लगातार होने वाले बदलावों से दूर रहना एक बहुत बड़ा गैप है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इतने लंबे समय तक व्यावहारिक प्रैक्टिस से दूर रहने के बाद वह सीधे मरीजों का इलाज करने के लिए पूरी तरह से तैयार और फिट हैं? क्योंकि चिकित्सा एक ऐसा क्षेत्र है जहां लगातार अभ्यास और अपडेटेड रहना मरीजों की जान के लिए बेहद जरूरी होता है।
NMC को मिला 3 महीने के भीतर समाधान निकालने का निर्देश
इस व्यावहारिक समस्या और डॉक्टर के रूप में शैलजा के भविष्य को ध्यान में रखते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक बेहद संतुलित रास्ता निकाला है। कोर्ट ने देश की सर्वोच्च चिकित्सा संस्था, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) को इस मामले में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है।
हाईकोर्ट ने NMC को निर्देश दिया है कि:
- वह प्रचलित नियमों और प्रावधानों के तहत इस बात का मूल्यांकन करे कि शैलजा पांडे वर्तमान में मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए कितनी तैयार हैं।
- यदि आवश्यक समझा जाए, तो मेडिकल यूनिवर्सिटी उनके लिए एक विशेष योग्यता परीक्षा या असेसमेंट आयोजित कर सकती है ताकि उनकी क्लिनिकल स्किल्स को जांचा जा सके।
- अदालत ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए NMC को अधिकतम 3 महीने का समय दिया है।
अदालत का स्पष्ट उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि शैलजा को अपनी डिग्री पाने के बाद अपना करियर शुरू करने के लिए अब और अधिक इंतजार न करना पड़े। 13 साल के मानसिक तनाव और संघर्ष के बाद, यह फैसला न केवल शैलजा के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है, बल्कि यह देश की कानूनी व्यवस्था में न्याय के प्रति विश्वास को भी मजबूत करता है।
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