भिंडी की फसल में रोगों का बढ़ता संकट
भिंडी की खेती करने वाले किसानों के लिए इस समय फसल को रोगों से बचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो पीत सिरा मोजेक और सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट जैसे रोग पूरी फसल को बर्बाद कर सकते हैं। इन बीमारियों के कारण न केवल पत्तियों की सेहत बिगड़ती है, बल्कि भिंडी के फल भी छोटे और टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय, बिलासपुर के कृषि रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद निर्मलकर ने इन रोगों से निपटने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि यदि किसान शुरुआती दौर में ही इन रोगों के संकेतों को पहचान लें और सही कदम उठाएं, तो भारी नुकसान से बचा जा सकता है।
पीत सिरा मोजेक की पहचान और लक्षण
भिंडी में होने वाला पीत सिरा मोजेक एक बेहद खतरनाक विषाणुजनित रोग है। इसकी पहचान करना ज्यादा मुश्किल नहीं है। सबसे पहले पत्तियों के किनारों और उनके सिरों पर मौजूद हरापन धीरे-धीरे कम होने लगता है और वहां पीलापन उभर आता है। इस अवस्था में पत्ती का बाकी हिस्सा हरा बना रहता है, जिससे पत्ती पर हरे और पीले रंग का एक मिश्रित जाल जैसा नजर आता है। यही विशिष्ट लक्षण इसे पीत सिरा मोजेक नाम देता है। जैसे-जैसे यह रोग पौधे के अन्य हिस्सों में फैलता है, पूरी पत्ती पीली पड़ सकती है और उसमें बचा हुआ हरापन भी पूरी तरह समाप्त हो जाता है। इस प्रक्रिया का सीधा असर पौधे के विकास पर पड़ता है, जिससे उसकी वृद्धि रुक जाती है और फल का उत्पादन काफी गिर जाता है।
संक्रमित पौधों को नष्ट करना ही एकमात्र उपाय
डॉ. निर्मलकर के अनुसार, पीत सिरा मोजेक से बचाव का सबसे कारगर तरीका स्वच्छता है। यदि किसान को खेत में शुरुआती तौर पर किसी भी पौधे में इस रोग के लक्षण दिखाई दें, तो उसे तुरंत वहां से उखाड़कर अलग कर देना चाहिए। संक्रमित पौधों को खेत के आसपास ही छोड़ना बाकी स्वस्थ पौधों के लिए खतरे को निमंत्रण देने जैसा है, क्योंकि इससे वायरस के फैलने की गति बढ़ जाती है। इन प्रभावित पौधों को खेत से बाहर ले जाकर नष्ट कर देना ही समझदारी है।
वायरस फैलाने वाले कीटों का प्रबंधन
यदि खेत में इस रोग का प्रकोप बढ़ जाए, तो वायरस फैलाने वाले वाहक कीटों पर काबू पाना अनिवार्य हो जाता है। इन कीटों को रोकने के लिए किसान कृषि विशेषज्ञों की देखरेख में कीटनाशकों का छिड़काव कर सकते हैं। डॉ. निर्मलकर ने इमिडाक्लोप्रिड 17.8 SL या थायमेथोक्साम जैसे प्रभावी कीटनाशकों के उपयोग का सुझाव दिया है। हालांकि, इन दवाओं की सटीक मात्रा और छिड़काव का तरीका स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की अनुशंसा के अनुसार ही तय करना चाहिए ताकि फसल को कोई अन्य नुकसान न हो।
सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट का खतरा
भिंडी की फसल में पीत सिरा मोजेक के अलावा दूसरी मुख्य समस्या सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट यानी पत्ती धब्बा रोग है। इस रोग में पत्तियों के निचले हिस्सों में धब्बे उभरने लगते हैं। धीरे-धीरे यह समस्या पूरी पत्ती को प्रभावित करने लगती है। जब यह रोग बढ़ता है, तो पौधे की उत्पादन क्षमता पर सीधा बुरा असर पड़ता है। इससे निकलने वाली भिंडी टेढ़ी और आकार में छोटी रह जाती है, जिससे बाजार में उसकी गुणवत्ता गिर जाती है और किसानों को सही दाम नहीं मिल पाता।
फफूंदनाशी के जरिए प्रभावी रोकथाम
सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट को रोकने के लिए शुरुआती अवस्था में फफूंदनाशी का छिड़काव करना एक सफल रणनीति है। विशेषज्ञों ने मैनकोजेब या मैनकोजेब-कार्बेंडाजिम युक्त दवाओं के प्रयोग की सलाह दी है। इसे तैयार करने के लिए प्रति लीटर पानी में लगभग 3 ग्राम दवा का घोल बनाना चाहिए। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी दवा का छिड़काव करने से पहले उत्पाद के लेबल पर दिए गए निर्देशों को ध्यान से पढ़ें और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ से परामर्श जरूर लें।
नियमित निगरानी से मिलेगी सुरक्षा
कुल मिलाकर, भिंडी की फसल की सुरक्षा पूरी तरह से किसान की सतर्कता पर निर्भर करती है। डॉ. विनोद निर्मलकर ने जोर देकर कहा है कि किसानों को नियमित रूप से अपने खेतों का निरीक्षण करना चाहिए। समय पर रोगग्रस्त पौधों को हटाना, कीटों को नियंत्रित रखना और फफूंदनाशकों का सही उपयोग करना ही इस समस्या का एकमात्र समाधान है। समय रहते इन छोटे-मोटे उपायों को अपनाकर किसान अपनी भिंडी की फसल को बड़े नुकसान से बचा सकते हैं और बेहतर उत्पादन सुनिश्चित कर सकते हैं।
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