जम्मू-कश्मीर में आरक्षण का विवाद
केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरियों के लिए लागू आरक्षण नीति इस समय चर्चा का विषय बनी हुई है। इस पूरे मामले में विवाद तब गहराया जब आरक्षण के प्रतिशत में बदलाव की कवायद शुरू हुई। वर्तमान में यह व्यवस्था एक जटिल दौर से गुजर रही है, जहां सरकारी नौकरियों में कोटा तय करने को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाएं चल रही हैं।
साल 2019 और आरक्षण का इतिहास
जम्मू-कश्मीर में आरक्षण नीति के बदलाव की जड़ें साल 2019 में देखी जा सकती हैं। यह वह समय था जब राज्य का विशेष दर्जा समाप्त कर दिया गया था। उस दौरान राज्य में आरक्षण की व्यवस्था 43 प्रतिशत पर सीमित थी। समय के साथ इसमें कई प्रशासनिक और कानूनी बदलाव किए गए, जिसने मौजूदा स्थिति को जन्म दिया है।
70 प्रतिशत आरक्षण का स्वरूप
साल 2014 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा सरकारी नौकरियों में आरक्षण को बढ़ाकर 70 प्रतिशत कर दिया गया था। इस फैसले के बाद से ही राज्य की भर्ती प्रक्रियाओं में बड़ा बदलाव देखने को मिला। हालांकि, अब इस नीति की समीक्षा की जा रही है और सरकार इसे फिर से सीमित करने का प्रयास कर रही है।
50 प्रतिशत तक सीमित करने की तैयारी
अब राज्य सरकार आरक्षण के दायरे को फिर से 50 प्रतिशत तक लाने की योजना बना रही है। इस प्रस्ताव को लेकर कैबिनेट की ओर से मंजूरी मिल चुकी है। हालांकि, यह मामला अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है, क्योंकि यह प्रस्ताव उपराज्यपाल के पास विचाराधीन है। उपराज्यपाल की अंतिम स्वीकृति के बाद ही इस बदलाव को आधिकारिक रूप से लागू किया जा सकेगा।
वर्तमान स्थिति और भविष्य
फिलहाल जम्मू-कश्मीर में आरक्षण का मुद्दा नीतिगत बदलावों के बीच अटका हुआ है। सरकार की कोशिश आरक्षण को संवैधानिक सीमाओं के अनुरूप 50 प्रतिशत पर लाने की है, जबकि पूर्व में लागू 70 प्रतिशत की व्यवस्था ने नौकरियों के समीकरण को पूरी तरह बदल दिया था। अब सभी की निगाहें उपराज्यपाल कार्यालय के फैसले पर टिकी हैं कि वे इस फाइल को कब मंजूरी देते हैं।
https://hindi.news18.com/news/knowledge/what-is-reservation-policy-in-jammu-and-kashmir-how-did-70-percent-reservation-in-government-jobs-come-about-omar-abdullah-gen-z-protest-10758916.html