बागेश्वर का बदला स्वरूप
सरयू और गोमती नदियों के पावन संगम पर स्थित बागेश्वर आज के दौर में आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस एक विकसित जिला मुख्यालय बन चुका है। हालांकि, स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले की बात करें तो यह शहर आज की तुलना में बेहद शांत, प्राकृतिक रूप से संपन्न और सांस्कृतिक गरिमा का एक अनूठा केंद्र था। कत्यूरी और चंद राजाओं के वैभवशाली अतीत से लेकर गोरखा शासन और फिर ब्रिटिश हुकूमत के अधीन रहे इस कस्बे ने हमेशा से ही अपनी एक विशिष्ट पहचान धर्म, परंपराओं और व्यापारिक गतिविधियों के कारण बनाए रखी है।
इतिहास की परतों में बागेश्वर
स्थानीय जानकारों और वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, वर्तमान में बागेश्वर के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से दानपुर कहलाता था। सातवीं शताब्दी के दौरान यहां कत्यूरी राजवंश का शासन स्थापित था। इसके बाद, 1565 में राजा बालो कल्याण चंद ने दानपुर को कुमाऊं साम्राज्य का हिस्सा बना लिया। इतिहास में आगे चलकर 1791 में गोरखाओं ने कुमाऊं पर अपना वर्चस्व स्थापित किया और लगभग 24 वर्षों तक वहां शासन किया। अंततः 1814 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोरखाओं को युद्ध में पराजित किया और 1816 में संपन्न हुई सुगौली की संधि के बाद यह पूरा क्षेत्र ब्रिटिश शासन के नियंत्रण में आ गया। ब्रिटिश काल के दौरान बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले के दानपुर परगना के एक महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में प्रशासित किया जाता था।
धार्मिक केंद्र और बागनाथ मंदिर की महत्ता
आजादी से पहले के बागेश्वर की पहचान का सबसे बड़ा आधार यहां स्थित बागनाथ मंदिर और सरयू-गोमती का पवित्र संगम था। संगम पर विराजमान भगवान शिव का बागनाथ धाम प्राचीन काल से ही श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र रहा है। इस मंदिर के प्रांगण में भैरव, दत्तात्रेय, गंगा माई, हनुमान, दुर्गा और कालिका जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण मंदिर भी स्थित हैं। अपनी धार्मिक महत्ता के कारण, उस दौर में भी दूर-दराज के पहाड़ी गांवों से लोग यहां स्नान करने और पूजा-अर्चना के लिए कठिन रास्तों से होते हुए पहुंचते थे।
कैसा था उस दौर का जीवन?
आज की तरह पक्की सड़कों, चौबीसों घंटे बिजली और मोटर वाहनों की सुविधा आजादी से पहले के जीवन का हिस्सा नहीं थी। उस समय पहाड़ी जीवनशैली पूरी तरह से पैदल यात्रा और पगडंडियों पर निर्भर थी। गांवों और कस्बों के बीच वस्तुओं के परिवहन के लिए लोग मुख्य रूप से पशुओं का उपयोग करते थे। घरों का निर्माण स्थानीय सामग्री और पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला के आधार पर किया जाता था। उस काल में जीवन की गति आज के मुकाबले काफी धीमी थी और लोग अपनी दैनिक जरूरतों के लिए पूरी तरह से स्थानीय संसाधनों और प्रकृति पर ही निर्भर थे।
उत्तरायणी मेला और हिमालयी व्यापार
कुमाऊं के पर्वतीय अंचलों में व्यापार का मुख्य जरिया साप्ताहिक बाजार और मेले हुआ करते थे। बागेश्वर का उत्तरायणी मेला महज एक धार्मिक आयोजन न होकर व्यापार और सामाजिक मेलजोल का सबसे बड़ा केंद्र था। जिला प्रशासन के ऐतिहासिक अभिलेखों के मुताबिक, इस मेले में अल्मोड़ा के व्यापारियों के साथ-साथ हिमालयी क्षेत्रों से आने वाले भोटिया व्यापारी भी भारी संख्या में जुटते थे। इस दौरान घोड़े, बकरी, भेड़, ऊन, फर, नमक, जड़ी-बूटियों और पहाड़ी उत्पादों का बड़े पैमाने पर आदान-प्रदान होता था। आज के आधुनिक दौर में भी भले ही तकनीक और विकास ने बागेश्वर की सूरत बदल दी हो, लेकिन सरयू-गोमती संगम, बागनाथ मंदिर और उत्तरायणी मेले की ऐतिहासिक विरासत आज भी इस शहर की पहचान को जीवंत बनाए हुए है।
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