बिना डिग्री के भी मोटी कमाई: मधुबनी के संजीव मखाना प्रोसेसिंग से हर सीजन में बना रहे हैं 5 लाख रुपये

बिहार के मधुबनी जिले के संजीव मुखिया और उनका पूरा परिवार खेती से जुड़े मखाना फोड़ी के काम से सालाना 4 से 5 लाख रुपये की कमाई कर रहे हैं, जो उनकी मेहनत और कौशल का प्रमाण है।

मेहनत और हुनर से बदली किस्मत

आज के दौर में कमाई के लिए केवल ऊंची डिग्रियां ही काफी नहीं होतीं। बिहार के मधुबनी जिले के सप्ता गांव में रहने वाले संजीव मुखिया की कहानी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि आपके पास सही हुनर है, तो आप कठिन परिश्रम से भी शानदार मुनाफा कमा सकते हैं। संजीव मुखिया और उनका पूरा परिवार अशिक्षित है, लेकिन वे हर साल मखाना प्रोसेसिंग के काम से लाखों रुपये की कमाई कर रहे हैं। उनके लिए यह काम न केवल आजीविका का जरिया है, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का एक बड़ा माध्यम भी बन गया है।

मखाना प्रोसेसिंग से लाखों की आमदनी

संजीव मुखिया और उनका परिवार हर साल अगस्त से नवंबर के महीने के बीच अपने गांव को छोड़कर मखाना गद्दी पर जाकर बस जाते हैं। यह सिलसिला तीन से चार महीने तक चलता है। उनके दिन की शुरुआत सुबह 3 बजे से हो जाती है, जब वे सबसे पहले चूल्हा लीपकर काम के लिए तैयारी करते हैं। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य मिलकर मखाना फोड़ने, उसकी सफाई करने और उसे बोरी में पैक करने का काम करते हैं। इस मेहनत का परिणाम यह होता है कि मात्र 3 से 4 महीने की अवधि में यह परिवार 4 लाख से 5 लाख रुपये तक की बचत कर लेता है।

काम का तरीका और मजदूरी

काम करने की प्रक्रिया के बारे में बताते हुए संजीव ने जानकारी दी कि महाजन उन्हें एक मन, जो कि लगभग 40 किलो के बराबर होता है, कच्चा मखाना तौल कर देते हैं। इस पूरे मखाने को फोड़ने और उसे बाजार में बेचने योग्य बनाने के बदले में उन्हें प्रति मन 5000 रुपये का मेहनताना दिया जाता है। चूंकि पूरा परिवार मिलकर काम करता है, इसलिए वे इस निर्धारित समय में अच्छी खासी मात्रा में मखाना तैयार कर लेते हैं, जिससे उनकी कुल कमाई 5 लाख रुपये तक पहुंच जाती है।

पशुपालन से भी होता है सहारा

मखाना सीजन के अलावा, साल के बाकी महीनों में संजीव का परिवार पशुपालन के जरिए अपना जीवन यापन करता है। संजीव का कहना है कि वे भले ही किताबी रूप से पढ़े-लिखे नहीं हैं, लेकिन उन्हें काम का हुनर बखूबी पता है। साल के इन चार महीनों में परिवार हर महीने 1 लाख रुपये तक की कमाई कर लेता है, जो उनके परिवार के पालन-पोषण के लिए काफी मददगार साबित होता है। हर साल यह परिवार इस काम को दोहराता है और हर बार पहले से अधिक कुशलता के साथ अपनी कमाई सुनिश्चित करता है। संजीव मुखिया की यह यात्रा उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो यह मानते हैं कि बिना औपचारिक शिक्षा के प्रगति करना असंभव है।

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