कला से बदली तकदीर
झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले सूरज आज कला की दुनिया में एक बड़ा नाम बन चुके हैं। वे अपनी पारंपरिक आदिवासी कलाकृतियों के दम पर न केवल अपनी जीविका चला रहे हैं, बल्कि पूरे देश में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। सूरज मुख्य रूप से डोकरा आर्ट और लकड़ी की नक्काशी के विशेषज्ञ हैं। अपनी मेहनत और इस प्राचीन विधा की बदौलत वे हर महीने 50,000 रुपये से भी अधिक की कमाई कर रहे हैं।
क्या है डोकरा कला
सूरज जिस डोकरा कला का उपयोग करते हैं, वह अत्यंत प्राचीन है और इसमें मुख्य रूप से पीतल, कांसे और मोम का मिश्रण उपयोग किया जाता है। इस विधि में सबसे पहले मोम से एक सांचा या स्टैच्यू तैयार किया जाता है। इसके बाद पिघले हुए तांबे या पीतल को मोम के सांचे के भीतर डाला जाता है। एक बार जब यह धातु जम जाती है, तो मोम को हटा दिया जाता है, जिससे मूर्ति का अंतिम रूप बाहर आता है। यह वही तकनीक है जो हड़प्पा सभ्यता के समय में प्रचलित थी, जिसके कारण इन कलाकृतियों की बनावट और डिज़ाइन बेहद खास और अद्वितीय नजर आते हैं।
लकड़ी की नक्काशी और भगवान जगन्नाथ
अपनी कला को और अधिक विस्तार देते हुए, सूरज लकड़ी से भी अद्भुत मूर्तियां बनाते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन कलाकृतियों को बनाने के लिए वे जंगल की सूखी लकड़ियों या अपने घर के आसपास लगे पेड़ों की लकड़ियों का ही उपयोग करते हैं। उनके द्वारा बनाई गई भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां इतनी जीवंत होती हैं कि देखने वाला हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है। इन मूर्तियों को और भी आकर्षक बनाने के लिए वे फलों और सब्जियों से तैयार किए गए ऑर्गेनिक पेंट का इस्तेमाल करते हैं। लकड़ी से बनी भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की बाजार में भारी मांग है और इनकी कीमत लगभग 500 रुपये से शुरू होती है।
प्रदर्शनियों में धूम और विदेशी ग्राहकों की पसंद
सूरज की कला केवल रांची तक सीमित नहीं है। उन्होंने दिल्ली समेत भारत के विभिन्न शहरों में आयोजित प्रदर्शनियों में अपने स्टॉल लगाए हैं। उनकी कला का जादू ऐसा है कि वहां आने वाले विदेशी मेहमान भी इन मूर्तियों की सराहना किए बिना नहीं रह पाते। वे न केवल इन कलाकृतियों को खरीदते हैं, बल्कि उन्हें अपने साथ ले जाना भी पसंद करते हैं। इसके अलावा, पीतल से बनी देवी-देवताओं की मूर्तियां, कछुए और खरगोश जैसी आकृतियां भी ग्राहकों के बीच काफी लोकप्रिय हैं।
संस्कृति का संरक्षण और भविष्य की राह
सूरज के अनुसार, उनकी शैली बाजार में उपलब्ध अन्य वस्तुओं से पूरी तरह अलग है, क्योंकि इस विशेष विधा में काम करने वाले कलाकारों की संख्या बहुत कम है। बड़े व्यापारिक उद्यमी और कला प्रेमी अब सीधे उनसे संपर्क कर रहे हैं ताकि अपने घरों और कार्यालयों को सजाने के लिए इन खास कलाकृतियों को खरीद सकें। सूरज न केवल एक कुशल कारीगर हैं, बल्कि वे एक ऐसे संरक्षक भी हैं जो लुप्त होती आदिवासी कला और संस्कृति को एक नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि लगन और हुनर सही दिशा में हो, तो पारंपरिक कला के माध्यम से भी एक सफल करियर बनाया जा सकता है।
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