पहाड़ों से सड़क किनारे तक कैसे आता है शीतल जल, जानें इसके पीछे का पूरा विज्ञान

उत्तराखंड के पहाड़ी रास्तों पर सड़क किनारे बहती जलधाराएं अक्सर लोगों का ध्यान खींचती हैं, लेकिन इनके निर्माण की प्रक्रिया काफी जटिल और वैज्ञानिक है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, ये प्राकृतिक जलस्रोत कैसे बनते हैं और क्या इनका पानी पीना सुरक्षित है, आइए समझते हैं।

पहाड़ी इलाकों में सड़कों के पास बहता पानी

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में यात्रा करते समय अक्सर सड़कों के किनारे पत्थर की दीवारों या ढलानों से निकलती हुई पानी की छोटी-छोटी धाराएं दिखाई देती हैं। भीषण गर्मी के मौसम में भी इन झरनों या धाराओं से निरंतर पानी बहता रहता है, जिसे देखकर राहगीर अक्सर हैरान रह जाते हैं। कई लोग इसे पूरी तरह शुद्ध और प्राकृतिक पेयजल मानकर इसका सेवन भी करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पहाड़ों की ऊंचाई से यह पानी आखिरकार सड़क तक कैसे पहुंचता है और इसके पीछे की असली वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है?

कैसे काम करती है भूगर्भीय प्रणाली

पर्यावरणविद् किशन मलड़ा के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया का आधार बारिश और बर्फबारी है। पहाड़ों पर जब बारिश होती है या बर्फ पिघलती है, तो पानी का एक बड़ा हिस्सा सीधे बहने के बजाय मिट्टी और चट्टानों की परतों के भीतर चला जाता है। यह पानी जमीन के नीचे अलग-अलग स्तरों में जाकर जमा हो जाता है और वहां संरक्षित रहता है। चट्टानों और मिट्टी की परतों के बीच फंसा हुआ यह पानी धीरे-धीरे गुरुत्वाकर्षण के कारण प्राकृतिक रास्तों से नीचे की ओर रिसता है। जब यह पानी नीचे आता है, तो उसे जहां कहीं भी चट्टानों में दरारें या प्राकृतिक निकास बिंदु मिलते हैं, वह सतह पर आ जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण के समय पहाड़ों को काटकर रास्ता बनाया जाता है, जिससे जमीन के अंदर बह रहे इन प्राकृतिक जलमार्गों के निकास द्वार खुल जाते हैं और पानी सड़क किनारे बहने लगता है।

शुद्धता और सावधानी का संतुलन

किशन मलड़ा बताते हैं कि जमीन के अंदर मौजूद चट्टानों और मिट्टी की परतों से गुजरते समय पानी का प्राकृतिक रूप से फिल्टरेशन यानी छनन हो जाता है। यही कारण है कि इन जलस्रोतों का पानी अक्सर देखने में काफी साफ और तापमान में बहुत ठंडा होता है। हालांकि, यह पूरी तरह सही नहीं है कि हर प्राकृतिक जलस्रोत का पानी पीने के लिए सुरक्षित ही हो। यदि जलस्रोत के आसपास गंदगी है, कचरा पड़ा है या वहां पशुओं का आना-जाना अधिक है, तो पानी दूषित होने की पूरी संभावना रहती है। इसके अलावा, ऊपरी इलाकों में मौजूद प्रदूषण भी पानी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए, बिना किसी उचित जांच या सावधानी के इन स्रोतों का पानी सीधे पीना जोखिम भरा हो सकता है।

जलस्रोतों का संरक्षण है अनिवार्य

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ये जलस्रोत पहाड़ों की असली जीवनरेखा हैं। ये न केवल स्थानीय निवासियों की प्यास बुझाते हैं, बल्कि जंगलों और वहां की पारिस्थितिकी तंत्र को भी जीवित रखते हैं। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में इन प्राकृतिक स्रोतों का संरक्षण बेहद जरूरी हो गया है। स्थानीय स्तर पर हमें इन धाराओं को बाधित करने से बचना चाहिए। साथ ही, जलस्रोत के आसपास कूड़ा-करकट न फैलाना और उनके प्राकृतिक रास्तों के साथ छेड़छाड़ न करना हम सभी की जिम्मेदारी है। यह बहती हुई जलधारा प्रकृति के उस जलचक्र का हिस्सा है, जिसे बचाकर ही हम भविष्य की जल सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।

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