परिसीमन पर तमिलनाडु सरकार की बड़ी हुंकार, मंत्री आधव अर्जुन बोले- सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार से ही क्यों बने प्रधानमंत्री?

तमिलनाडु में परिसीमन के मुद्दे पर विधानसभा में चर्चा के दौरान टीवीके नेता और मंत्री आधव अर्जुन ने मांग की है कि देश का प्रधानमंत्री दक्षिणी राज्यों से भी होना चाहिए। उन्होंने जनसंख्या आधारित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को तमिलनाडु के हितों के लिए नुकसानदेह बताया है।

परिसीमन के मुद्दे पर तमिलनाडु की तल्ख टिप्पणी

तमिलनाडु में परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर चल रही सियासी बहस के बीच तमिलगा वेत्री कषगम यानी टीवीके के वरिष्ठ नेता और लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन ने एक बेहद तीखा और महत्वपूर्ण बयान दिया है। विधानसभा में परिसीमन के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव पर चर्चा करते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि देश की सत्ता का केंद्र सिर्फ उत्तर प्रदेश, बिहार या गुजरात जैसे राज्य ही क्यों बने रहने चाहिए। आधव अर्जुन का मानना है कि प्रधानमंत्री पद किसी एक विशिष्ट क्षेत्र या उत्तरी राज्यों की जागीर नहीं होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आने वाले समय में भारत को दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु से भी अपना प्रधानमंत्री मिलना चाहिए।

जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व का विरोध

मंत्री ने अपने भाषण में इस बात पर जोर दिया कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था में जनसंख्या को ही प्रतिनिधित्व का मुख्य आधार बनाना दक्षिणी राज्यों के लिए चिंता का विषय बन गया है। अर्जुन के अनुसार, जिन राज्यों ने अपने स्तर पर जनसंख्या नियंत्रण के उपाय किए हैं और आर्थिक व सामाजिक विकास के मानकों पर शानदार प्रदर्शन किया है, उन्हें इस बात की राजनीतिक सजा नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर परिसीमन की प्रक्रिया केवल जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ी, तो यह उन राज्यों के लिए एक नई और गंभीर चुनौती पैदा कर देगी जिन्होंने देश की प्रगति में अपना बड़ा योगदान दिया है।

सत्ता के समीकरण पर सवाल

आधव अर्जुन ने मौजूदा चुनावी गणित पर निशाना साधते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति यह है कि मात्र पांच या छह उत्तरी राज्यों का समर्थन हासिल होने पर ही कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच जाता है। उनके मुताबिक, यह ढांचा बदलने की आवश्यकता है क्योंकि इससे देश के अन्य हिस्सों की आवाज दब जाती है। उन्होंने तर्क दिया कि जैसे तमिलनाडु विधानसभा में राज्य की जनता की आवाज पूरी मजबूती से उठाई जाती है, वैसी ही गूंज संसद में प्रधानमंत्री के रूप में दक्षिण भारत की भी होनी चाहिए। उन्होंने दावा किया कि तमिलनाडु आर्थिक दृष्टि से देश के अग्रणी राज्यों में शुमार है, बावजूद इसके कई बार राष्ट्रीय कानूनों पर राज्य की आपत्तियों और चिंताओं को संसद में उचित स्थान नहीं मिलता।

द्रविड़ विचारधारा और राज्यों की स्वायत्तता

अपने संबोधन में उन्होंने पेरियार ईवी रामासामी और सीएन अन्नादुरई जैसे दिग्गजों के विचारों का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि भारत की असली शक्ति राज्यों की स्वायत्तता और उनके सर्वांगीण विकास में निहित है। सीएन अन्नादुरई के उस सिद्धांत को दोहराते हुए कि राज्यों को नजरअंदाज करके देश का विकास संभव नहीं है, उन्होंने कहा कि परिसीमन का विवाद सिर्फ सीटों के आवंटन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्यों की राजनीतिक ताकत और उनके अस्तित्व की रक्षा से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उत्तर और दक्षिण के बीच का असंतुलन दशकों पुराना है और परिसीमन की आड़ में यह खाई और गहरी हो सकती है।

राष्ट्रीय नीतियों और तमिलनाडु के हितों का टकराव

आधव अर्जुन ने एनईईटी यानी NEET, जीएसटी यानी GST और सीएए यानी CAA जैसे मुद्दों का विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के सांसदों ने इन विषयों पर संसद में राज्य का पक्ष मजबूती से रखा, लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार ने ऐसे निर्णय लिए जिन्हें तमिलनाडु की सरकार और राजनीतिक दल अपने हितों के खिलाफ मानते हैं। मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि अगर संसद में किसी राज्य का प्रतिनिधित्व जनसंख्या घटने के कारण कम होता रहा, तो भविष्य में वह राज्य राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करने की अपनी क्षमता खो देगा। उन्होंने इस स्थिति को संविधान की संघीय भावना और समानता के सिद्धांत के खिलाफ बताया।

अमेरिकी गृहयुद्ध का ऐतिहासिक उदाहरण

बहस के दौरान उन्होंने एक दिलचस्प तुलना करते हुए अमेरिकी गृहयुद्ध का उदाहरण पेश किया। उन्होंने कहा कि अब्राहम लिंकन के दौर में अमेरिका को उत्तर और दक्षिण के बीच के गंभीर संघर्ष से गुजरना पड़ा था। उन्होंने संकेत दिया कि यदि भारत में भी राजनीतिक और आर्थिक आधार पर क्षेत्रवाद बढ़ता है, तो भविष्य में वैसी ही चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। हालांकि, उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार का हवाला देते हुए मांग की कि ऐसी व्यवस्था बननी चाहिए जिसमें देश के हर क्षेत्र को समान सम्मान और प्रतिनिधित्व मिले, न कि केवल कुछ बड़े जनसंख्या वाले राज्यों का वर्चस्व बना रहे।

राजनीतिक विरासत की एक लंबी कड़ी

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए अर्जुन ने तमिलनाडु की राजनीतिक विरासत का भी जिक्र किया। उन्होंने डीएमके के सीएन अन्नादुरई और एम. करुणानिधि के साथ-साथ एआईएडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन और पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता द्वारा राज्य के अधिकारों के लिए किए गए संघर्षों को याद किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि टीवीके पार्टी भी इसी परंपरा का निर्वहन कर रही है और संघीय ढांचे के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने जोर दिया कि राज्यों के अधिकारों की रक्षा का मुद्दा तमिलनाडु के लिए हमेशा सर्वोपरि रहा है।

विधानसभा में पारित हुआ अहम प्रस्ताव

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की ओर से बुधवार को तमिलनाडु विधानसभा में परिसीमन के खिलाफ एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया गया था। दो घंटे लंबी चली गहन बहस के बाद सदन ने सर्वसम्मति से इसे पारित कर दिया। इस प्रस्ताव के माध्यम से केंद्र सरकार से यह मांग की गई है कि लोकसभा सीटों की कुल संख्या को 543 पर ही स्थायी रखा जाए। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की भी पुरजोर मांग की गई है ताकि लोकतंत्र में भागीदारी को संतुलित किया जा सके।

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