लोकसभा में पेश हुई जांच रिपोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े बहुचर्चित कैश एट होम मामले की जांच रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा के पटल पर रखी गई। संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन से एक दिन पहले तीन सदस्यीय जांच समिति ने अपने निष्कर्ष सदन को सौंपे। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ किसी भी प्रकार की साजिश के सबूत नहीं मिले हैं। हालांकि, रिपोर्ट में नकदी की भारी मात्रा और उसकी मौजूदगी को लेकर कई गंभीर टिप्पणियां की गई हैं, जो इस मामले को और अधिक पेचीदा बनाती हैं।
घटना का विवरण और नकदी का रहस्य
यह पूरा मामला पिछले साल 14 मार्च को तब सुर्खियों में आया, जब जस्टिस यशवंत वर्मा के नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर आग लग गई। आग बुझाने के दौरान और उसके बाद की स्थिति का जायजा लेने पर वहां भारी मात्रा में बेहिसाब नकदी बरामद हुई थी। इस घटना के सामने आते ही न्यायपालिका और राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई थी। जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि इतनी बड़ी धनराशि का किसी की नजर में आए बिना लंबे समय तक एक सरकारी आवास में रखा जाना अपने आप में संदेह पैदा करता है। समिति ने अपनी जांच के दौरान इस बात पर जोर दिया कि नकदी के इस तरह बरामद होने की घटना के पीछे कोई बाहरी साजिश नजर नहीं आती है।
जांच समिति का गठन और प्रक्रिया
इस गंभीर मामले की तह तक जाने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को एक उच्च स्तरीय तीन सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने की थी। समिति के अन्य सदस्यों में बॉम्बे हाई कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य शामिल थे। न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968 के तहत गठित इस समिति ने अपनी गहन कार्यवाही में मौखिक साक्ष्यों और दस्तावेजी प्रमाणों को बारीकी से रिकॉर्ड किया। अंततः समिति ने मई 2026 में अपनी विस्तृत रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी।
जस्टिस वर्मा के जवाबों पर उठाए सवाल
संसदीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जांच समिति ने जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा जांच के दौरान दिए गए बयानों पर भी कड़ी टिप्पणी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जांच के दौरान पूछे गए कई महत्वपूर्ण सवालों पर जस्टिस वर्मा टालमटोल करते रहे और उनके जवाब स्पष्ट नहीं थे। यह पहलू रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है, जिसने उनके आचरण पर सवाल खड़े किए हैं। उल्लेखनीय है कि इस पूरे विवाद के बीच, जस्टिस वर्मा ने 9 अप्रैल 2026 को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
न्यायपालिका की साख पर प्रभाव
यह मामला केवल एक न्यायाधीश के घर नकदी मिलने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा और पारदर्शिता के साथ सीधे जुड़ा हुआ था। जब यह घटना प्रकाश में आई, तो देश भर में न्यायाधीशों की जवाबदेही को लेकर गंभीर विमर्श शुरू हो गया था। रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद अब ये निष्कर्ष आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा बन चुके हैं। समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि जांच के दौरान बाहरी हस्तक्षेप या किसी साजिश का कोई संकेत नहीं मिला है, लेकिन नकदी की भारी मौजूदगी के तथ्य ने न्यायिक संस्था के सामने कई चुनौतियां भी पेश की हैं। अब जब यह रिपोर्ट संसद में पेश हो चुकी है, तो आने वाले दिनों में इस पर व्यापक चर्चा होने की संभावना है।
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