आजादी का वह ऐतिहासिक दिन
इतिहास के पन्नों में 11 अगस्त की तारीख बलूचिस्तान के लिए बेहद खास है। साल 1947 में इसी दिन कलात रियासत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घोषित किया गया था। यह घोषणा भारत और पाकिस्तान के आधिकारिक तौर पर आजाद होने से कुछ दिन पहले ही कर दी गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने भी उस समय इस स्वतंत्रता को मान्यता दी थी। हालांकि, यह आजादी महज 229 दिनों तक ही टिक सकी। एक सुनियोजित साजिश के तहत जिन्ना ने अपने ही कानूनी मुवक्किल यानी खान ऑफ कलात को धोखा दिया और सैन्य ताकत के बल पर बलूचिस्तान पर कब्जा कर लिया। इस पूरे घटनाक्रम में 27 मार्च 1948 को ऑल इंडिया रेडियो द्वारा प्रसारित की गई एक खबर ने ऐसी स्थिति पैदा की जिसने इतिहास की दिशा बदल दी। आज भी यह एक बड़ा रहस्य है कि आखिर वह रिपोर्ट किसने तैयार की थी और उसके पीछे का असली मकसद क्या था।
बलूचिस्तान का भूगोल और विभाजन
आज के दौर में बलूचिस्तान जिस रूप में पाकिस्तान के नक्शे पर दिखाई देता है, उसकी सीमाएं 1970 में तय हुई थीं। बलोच लोग सांस्कृतिक रूप से पश्तून, उजबेक या कुर्द समुदाय की तरह अपनी एक विशिष्ट पहचान रखते हैं। ऐतिहासिक रूप से बलोच आबादी का विस्तार केवल पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत और अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों में भी इनका गहरा प्रभाव रहा है। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान फारस यानी आज के ईरान और अफगानिस्तान के साथ सीमाएं तय करते समय बलोच आबादी को तीन देशों के बीच बांट दिया गया था।
कलात और उसकी छोटी रियासतें
ब्रिटिश शासन के समय बलूचिस्तान में 'कलात' एक मुख्य रियासत थी। कलात के शासक को 'खान' की उपाधि से जाना जाता था, जैसे अन्य जगहों पर नवाब, निजाम या महाराजा हुआ करते थे। कलात के अधीन तीन अन्य छोटी रियासतें भी थीं: खारान, लास बेला और मकरान। भौगोलिक दृष्टिकोण से खारान ईरान की सीमा से लगे रेगिस्तानी इलाके में थी, लास बेला सिंध के पास समुद्र तट पर स्थित थी, और मकरान भी समुद्र किनारे ईरान के करीब बसी थी। इसके अलावा, समुद्र के किनारे एक और महत्वपूर्ण स्थान था 'ग्वादर', जो उस समय ओमान का हिस्सा हुआ करता था। आज जिस ग्वादर बंदरगाह की चर्चा हर तरफ होती है, वह तब ओमान का अधीन क्षेत्र था।
अंग्रेजों के साथ कलात का समझौता
कलात की रियासत का अंग्रेजों के साथ एक विशेष समझौता था। इसके तहत विदेश नीति और सुरक्षा से जुड़े सभी प्रमुख मामले ब्रिटिश राज के अधीन थे, और उनकी सेना कलात में तैनात रहती थी। रेलवे के विकास का कार्य भी अंग्रेजों ने स्वयं संभाल रखा था। क्वेटा और उसके आसपास के इलाके को ब्रिटिश सरकार ने 'ब्रिटिश बलूचिस्तान' के नाम से सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया था। खान ऑफ कलात का मानना था कि उनकी रियासत को ब्रिटिश राज के तहत आने वाली अन्य रियासतों से अलग दर्जा मिलना चाहिए, क्योंकि उनकी स्थिति बराबरी की थी।
मोहम्मद अली जिन्ना की दोहरी भूमिका
दूसरे विश्व युद्ध के बाद जब यह तय हो गया कि अंग्रेजों को भारत छोड़ना होगा, तब खान ऑफ कलात ने अपनी रियासत के भविष्य को लेकर तैयारी शुरू कर दी। वे चाहते थे कि कलात एक आजाद देश के रूप में बना रहे। अपनी कानूनी लड़ाई को मजबूती देने के लिए उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना को अपना कानूनी सलाहकार नियुक्त किया। यह विडंबना ही है कि जो जिन्ना एक तरफ भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के लिए वकालत कर रहे थे, वही दूसरी तरफ कलात को आजाद देश बनाने की रणनीति भी तैयार कर रहे थे। जून 1947 में जब दो देशों के निर्माण का खाका खिंचा, तो रियासतों के सामने यह विकल्प रखा गया कि वे भारत या पाकिस्तान में से किसी एक को चुनें या फिर स्वतंत्र रहें।
जिन्ना का दबाव और कबीलाई राजनीति
खान ऑफ कलात को लगा कि उनकी डील अंग्रेजों के साथ अलग थी, इसलिए पाकिस्तान बनने का असर उन पर नहीं पड़ेगा। दूसरी ओर, जिन्ना ने अपनी रणनीति बदल ली। उन्होंने कलात के खान को यह कहकर मनाने की कोशिश की कि पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश है और बलूचिस्तान को इसमें शामिल हो जाना चाहिए। क्वेटा में कबीलों की एक बैठक जिसे 'जिरगा' कहा जाता था, बुलाई गई। वहां मुस्लिम लीग के प्रभाव में कबीलाई नेताओं ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला कर लिया। हालांकि, खान ऑफ कलात इसके विरोध में थे। उन्होंने जिन्ना को स्पष्ट कर दिया कि कलात एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में रहेगा। इसके बदले में जिन्ना ने उन्हें रक्षा, विदेश मामले और संचार के लिए पाकिस्तान के साथ समझौते का प्रस्ताव दिया। 11 अगस्त 1947 को एक स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट साइन हुआ, जिससे कलात को आधिकारिक आजादी मिली।
साजिश, अफवाह और सैन्य घेराबंदी
आजादी मिलने के बाद पाकिस्तान ने पर्दे के पीछे से अपनी चालें तेज कर दीं। जिन्ना ने खान ऑफ कलात के करीब रहकर भी उन पर लगातार दबाव बनाना शुरू किया। विदेशी मीडिया में यह दुष्प्रचार फैलाया गया कि खान भारत सरकार के साथ गुप्त बातचीत कर रहे हैं और वहां एयर बेस बनाने की योजना बना रहे हैं। इतिहासकार मानते हैं कि यह अफवाह पाकिस्तान ने खुद फैलाई थी ताकि बलोच जनता के बीच खान के खिलाफ विद्रोह पैदा किया जा सके। धीरे-धीरे जिन्ना ने खारान, लास बेला और मकरान जैसी छोटी रियासतों को सेना के दम पर पाकिस्तान में विलय करने के लिए मजबूर कर दिया। चारों तरफ से घिर चुके खान ऑफ कलात को अंततः झुकना पड़ा।
ऑल इंडिया रेडियो की रहस्यमयी रिपोर्ट
इस पूरे मामले में 27 मार्च 1948 की वह तारीख निर्णायक रही। ऑल इंडिया रेडियो पर एक रिपोर्ट प्रसारित हुई जिसमें दावा किया गया कि खान ऑफ कलात ने भारत में शामिल होने के लिए संपर्क किया था। इस खबर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हड़कंप मचा दिया। पाकिस्तान ने इसी खबर को आधार बनाकर बलूचिस्तान में सेना की कार्रवाई को उचित ठहराया। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस रिपोर्ट का खंडन करते हुए इसे पूरी तरह गलत बताया था। लेकिन सवाल यह है कि वह रिपोर्ट कहां से आई और किसने उसे प्रसारित करने का निर्देश दिया? यह इतिहास का वह पन्ना है जो आज तक एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है। इसी घटनाक्रम के बाद खान को मजबूरन पाकिस्तान में विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पड़े और 229 दिनों की वह आजादी हमेशा के लिए समाप्त हो गई।
https://hindi.news18.com/world/pakistan-khan-of-kalat-jinnah-betrayal-how-balochistan-was-forced-to-join-pakistan-in-229-days-all-india-radio-broadcast-changed-history-10740583.html