मानसून के दौरान बागवानी में आने वाली चुनौतियां
मानसून का मौसम पेड़-पौधों के लिए जीवनदायिनी माना जाता है, लेकिन इसके साथ ही यह बागवानों के लिए नई मुसीबतें भी लेकर आता है। बारिश की वजह से बगिया में हरियाली तो छाई रहती है, लेकिन लगातार बनी रहने वाली नमी और उमस कीट-पतंगों को पनपने के लिए बेहतरीन वातावरण प्रदान करती है। कई बार हम केवल खाद और पानी पर ध्यान देते हैं, जबकि असल चुनौती इन छोटे कीटों से पौधों को बचाना होती है। अगर समय रहते फल मक्खी, सफेद मक्खी, एफिड्स और थ्रिप्स जैसे कीटों की पहचान न की जाए, तो ये न केवल पत्तियों और नई कोंपलों को खराब कर सकते हैं, बल्कि पूरी फसल को भी बर्बाद कर सकते हैं। किसान अंशुमान सिंह बताते हैं कि मानसून में पौधों को बारिश से बचाना तो फिर भी आसान है, लेकिन इन अदृश्य कीटों का प्रबंधन करना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है।
सबसे पहले जल निकासी का रखें ध्यान
बारिश के मौसम में बगिया की सुरक्षा का सबसे प्राथमिक नियम है कि गमलों और क्यारियों में कहीं भी जलभराव न होने दें। जब गमलों में लंबे समय तक पानी जमा रहता है, तो मिट्टी में ऑक्सीजन का संचार रुक जाता है, जिससे जड़ों के सड़ने की समस्या पैदा हो जाती है। सुनिश्चित करें कि हर गमले के नीचे पर्याप्त निकासी छेद हों और अगर गमलों के नीचे प्लेट या ट्रे रखी है, तो उनमें जमा पानी को तुरंत हटा दें। क्यारियों में भी जल निकासी के लिए उचित नालियां बनाना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही, मिट्टी में पोषक तत्वों को संतुलित करने के लिए वर्मीकम्पोस्ट या पूरी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद का उपयोग करना चाहिए। पौधों में हवा का प्रवाह बनाए रखने के लिए समय-समय पर सूखी, पीली पड़ चुकी और संक्रमित पत्तियों की छंटाई करना बहुत जरूरी है ताकि फंगस का खतरा कम रहे।
फल मक्खी से बचाव के उपाय
मानसून के दौरान बागवानों के लिए सबसे सिरदर्द बनने वाला कीट 'फ्रूट फ्लाई' है। यह कीट खासतौर पर अमरूद और आम जैसे फलों के साथ-साथ लौकी, तोरई, करेला, खीरा और कद्दू जैसी गूदेदार सब्जियों को भारी नुकसान पहुंचाता है। इसकी मादा कीट फल की बाहरी त्वचा में छेद करके अंडे देती है, जिससे फल अंदर ही अंदर सड़ने लगता है और अंत में जमीन पर गिर जाता है। इससे निपटने का सबसे असरदार तरीका 'मेथिल यूजेनॉल फेरोमोन ट्रैप' का इस्तेमाल करना है। यह यंत्र फल मक्खी को अपनी तरफ आकर्षित कर फंसा लेता है, जिससे उनकी संख्या पर नियंत्रण पाना आसान हो जाता है।
एफिड्स और सफेद मक्खी का प्रबंधन
एफिड्स यानी माहू और सफेद मक्खी आकार में बहुत छोटे होते हैं, लेकिन ये पौधों की कोशिकाओं से रस चूसकर उन्हें पूरी तरह सुखा सकते हैं। ये मुख्य रूप से भिंडी, मिर्च, बैंगन और गोभी जैसी सब्जियों की पत्तियों के पीछे छिपकर हमला करते हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि ये कीट पौधों में वायरस जनित बीमारियों को फैलाते हैं। इनके प्रबंधन के लिए 'पीले स्टिकी ट्रैप' का उपयोग करना चाहिए। पीले रंग के प्रति आकर्षित होने वाले ये कीट ट्रैप की चिपचिपी सतह पर चिपक जाते हैं, जिससे पौधों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
थ्रिप्स से कैसे करें बचाव
बारिश और उमस के मौसम में थ्रिप्स जैसे बारीक कीट प्याज, लहसुन, मिर्च और टमाटर की फसलों को निशाना बनाते हैं। ये कीट पत्तियों और फूलों को खुरचकर उनका रस चूसते हैं, जिसके कारण पत्तियां ऊपर की ओर मुड़ने लगती हैं और पौधे की वृद्धि रुक जाती है। थ्रिप्स पर निगरानी रखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए नीले रंग के चिपचिपे ट्रैप सबसे उपयोगी साबित होते हैं। इन ट्रैप्स को पौधों के करीब लगाने से कीटों की मौजूदगी का तुरंत पता चल जाता है और उनकी आबादी बढ़ने से पहले ही उन्हें काबू किया जा सकता है।
तना और फल छेदक कीटों का खतरा
बैंगन, टमाटर और भिंडी जैसी फसलों के लिए तना और फल छेदक कीट सबसे बड़ी मुसीबत होते हैं। इन कीटों के लार्वा तने और फलों के अंदर घुस जाते हैं, जिससे बाहर से पौधा स्वस्थ दिखता है लेकिन अंदर से खोखला हो जाता है। साथ ही इल्लियां गोभी और टमाटर की पत्तियों को तेजी से खाकर पौधों को कमजोर कर देती हैं। इन कीटों की वयस्क तितलियों या पतंगों को फंसाने के लिए ल्यूर आधारित फेरोमोन ट्रैप का उपयोग किया जाना चाहिए। यह कीटों के प्रजनन चक्र को तोड़कर उनकी अगली पीढ़ी को पनपने से रोकता है।
सोलर लाइट ट्रैप की उपयोगिता
मानसून में कई हानिकारक कीट रात के समय अधिक सक्रिय होते हैं। तना छेदक पतंगे, कुछ विशेष भृंग और कटवॉर्म जैसे कीड़े अंधेरे का फायदा उठाकर पौधों पर हमला करते हैं। ऐसे में 'सोलर लाइट ट्रैप' बहुत काम आता है। रात में जब ये कीट रोशनी की ओर आकर्षित होते हैं, तो वे ट्रैप के जाल या पानी के बर्तन में गिरकर नष्ट हो जाते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि कीटों को फसल पर अंडे देने से पहले ही पकड़ लिया जाता है। चूँकि यह सूर्य की ऊर्जा से चलता है, इसलिए बिजली की खपत नहीं होती और इसे बार-बार चालू या बंद करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
पौधों को सहारा और अन्य सावधानियां
तेज बारिश और हवा के कारण कई बार पौधों के नाजुक तने टूट जाते हैं, इसलिए उन्हें लकड़ी, बांस या धागे के सहारे बांधकर सीधा रखना जरूरी है। इसके अलावा, सुरक्षा के तौर पर हर 15 दिन के अंतराल पर नीम के तेल का छिड़काव करना कीटों और फंगस के प्रबंधन में काफी मददगार साबित होता है। मानसून में अपनी बगिया को हरी-भरी बनाए रखने का एकमात्र तरीका यही है कि पौधों को केवल प्रकृति के भरोसे न छोड़ें। नियमित साफ-सफाई, उचित जल निकासी, कीटों की शुरुआती पहचान और सही समय पर ट्रैप्स का प्रयोग करके आप अपनी फसल को बारिश के मौसम में भी सुरक्षित रख सकते हैं।
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