अंबाला जेल में अनोखी पहल: 17 कैदी बनेंगे शिक्षक, 236 बंदियों को साक्षर बनाने का लक्ष्य

अंबाला सेंट्रल जेल में उल्लास-नव भारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत निरक्षर कैदियों को शिक्षित करने की मुहिम शुरू की गई है, जिसमें शिक्षित कैदी ही अपने साथी बंदियों को पढ़ाएंगे।

शिक्षा का नया अध्याय: जेल की सलाखों के पीछे खुली पाठशाला

आमतौर पर जेल का नाम सुनते ही जहन में सजा और सख्ती की तस्वीरें उभरती हैं, लेकिन हरियाणा के अंबाला सेंट्रल जेल में अब एक अलग ही तस्वीर देखने को मिल रही है। शिक्षा विभाग ने एक अनूठी पहल शुरू की है जिसके जरिए सलाखों के पीछे बंद कैदी न केवल नई चीजें सीख रहे हैं, बल्कि अपनी जिंदगी को सुधारने के लिए किताब और कलम का सहारा भी ले रहे हैं। अंबाला शिक्षा विभाग ने जेल में मौजूद निरक्षर बंदियों को शिक्षित करने के लिए उल्लास-नव भारत साक्षरता कार्यक्रम को एक मिशन के रूप में लिया है। इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि कैदियों को पढ़ाने के लिए बाहर से किसी शिक्षक को नहीं बुलाया गया है, बल्कि जेल में ही मौजूद 17 शिक्षित कैदियों ने स्वेच्छा से शिक्षक की जिम्मेदारी संभाली है।

सर्वे से सामने आए चौकाने वाले आंकड़े

इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत शिक्षा विभाग द्वारा किए गए एक गहन सर्वे के साथ हुई। इस सर्वे के दौरान अंबाला सेंट्रल जेल के अंदर 236 ऐसे कैदी पाए गए जो पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे। वहीं, उसी जेल में 17 ऐसे बंदियों की पहचान की गई जो पढ़े-लिखे थे और साक्षरता अभियान में योगदान देने के इच्छुक थे। शिक्षा विभाग ने तुरंत सभी 236 निरक्षर कैदियों को उल्लास पोर्टल पर एक विद्यार्थी यानी लर्नर के रूप में पंजीकृत किया, जबकि 17 शिक्षित कैदियों को स्वैच्छिक शिक्षक या वॉलंटियर टीचर के तौर पर रजिस्टर किया गया। अब ये 17 कैदी अपने साथियों को साक्षर बनाने की जिम्मेदारी पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं।

सितंबर 2026 में होगी विशेष परीक्षा

इस शैक्षणिक अभियान का अगला चरण परीक्षा है। जेल में पढ़ रहे इन 236 कैदियों को आगामी सितंबर 2026 में आयोजित होने वाली उल्लास परीक्षा में शामिल होने के लिए तैयार किया जा रहा है। शिक्षा विभाग की योजना है कि ज्यादा से ज्यादा कैदी इस परीक्षा को उत्तीर्ण करें। इस परीक्षा में सफल होने वाले प्रतिभागियों को भारत सरकार की ओर से आधिकारिक साक्षरता प्रमाण पत्र दिया जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि यह प्रमाणपत्र न केवल उनकी शैक्षणिक उपलब्धि को दर्शाएगा, बल्कि जेल से रिहा होने के बाद उन्हें मुख्यधारा के समाज में सम्मानजनक तरीके से जीवन जीने में भी मदद करेगा।

अंबाला जिले का साक्षरता मिशन और लक्ष्य

अंबाला जिला शिक्षा अधिकारी सुधीर कालड़ा ने इस परियोजना के व्यापक लक्ष्यों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि उल्लास कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक अत्यंत महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट है, जिसका मूल उद्देश्य पूरे देश को शत-प्रतिशत साक्षर बनाना है। इस साल अंबाला जिले को कुल 34 हजार लोगों के पंजीकरण का लक्ष्य सौंपा गया था। हालांकि, शिक्षा विभाग की टीम ने मेहनत और समन्वय के साथ काम करते हुए इस निर्धारित लक्ष्य को पीछे छोड़ दिया है और अब तक कुल 35,054 लोगों को उल्लास पोर्टल पर पंजीकृत कर लिया है।

कैसे काम करता है उल्लास कार्यक्रम

सुधीर कालड़ा ने प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए बताया कि उल्लास कार्यक्रम के तहत किसी भी निरक्षर व्यक्ति को एक लर्नर के रूप में जोड़ा जाता है और उसके मार्गदर्शन के लिए एक शिक्षित व्यक्ति को वॉलंटियर के तौर पर पंजीकृत किया जाता है। ये शिक्षक अपने शिक्षार्थियों को बुनियादी साक्षरता प्रदान करते हैं। उनकी प्रगति को मापने के लिए हर साल मार्च और सितंबर के महीने में परीक्षा आयोजित की जाती है। अभी तक अंबाला जिले के करीब 22,000 लोगों को इस कार्यक्रम के तहत साक्षरता प्रमाण पत्र प्रदान किए जा चुके हैं।

शिक्षा के लिए उम्र या स्थान का बंधन नहीं

शिक्षा विभाग की इस मुहिम का दायरा केवल जेल तक ही सीमित नहीं है। विभाग का प्रयास है कि जिले के कोने-कोने, गांव, गली और मोहल्लों में इसे ले जाया जाए। युवाओं को प्रेरित किया जा रहा है कि वे अपने आसपास के उन लोगों की पहचान करें जो पढ़-लिख नहीं सकते। जिला शिक्षा अधिकारी के अनुसार, कोई भी युवा जिसने कम से कम छठी कक्षा तक पढ़ाई की है, वह वॉलंटियर बनकर किसी को भी पढ़ा सकता है। चाहे घर का कोई बुजुर्ग हो या पड़ोस का कोई व्यक्ति, एक शिक्षित नागरिक का योगदान किसी के जीवन को पूरी तरह बदल सकता है।

दीवारों को लांघकर बदल रही है तकदीर

अंबाला जेल में शुरू हुई यह पाठशाला यह साबित कर रही है कि सीखने और सिखाने की कोई उम्र नहीं होती और जेल की मजबूत दीवारें भी शिक्षा के प्रसार को नहीं रोक सकतीं। जब एक कैदी दूसरे कैदी को अक्षर ज्ञान देता है, तो यह केवल पढ़ाई नहीं होती, बल्कि यह मानवीय सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम होता है। शिक्षा विभाग को उम्मीद है कि यह पहल न केवल उन 236 कैदियों के जीवन में बदलाव लाएगी, बल्कि समाज में साक्षरता के प्रति एक सकारात्मक संदेश भी भेजेगी, जिससे आने वाले समय में जिले का साक्षरता प्रतिशत और बेहतर हो सकेगा।

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