मेंथा की खेती से बदली चंपारण के किसान की तस्वीर, सालाना 1500000 रुपये की हो रही कमाई

पश्चिमी चंपारण के किसान परशुराम ने धान-गेहूं की पारंपरिक खेती को छोड़कर मेंथा की खेती अपनाई है। आज वे न केवल मेंथा ऑयल का सफल व्यवसाय कर रहे हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपने उत्पाद बेचकर सालाना लाखों की कमाई कर रहे हैं।

परंपरागत खेती से हटकर नई राह

बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के किसान परशुराम ने साबित कर दिया है कि अगर सही दिशा में मेहनत की जाए, तो कृषि को एक मुनाफे वाला व्यवसाय बनाया जा सकता है। मझौलिया प्रखंड के रुलही गांव के निवासी परशुराम कभी धान और गेहूं जैसी फसलों पर निर्भर थे, जिनसे उन्हें बमुश्किल गुजारा करने लायक आमदनी हो पाती थी। लेकिन पिछले 17 वर्षों से उन्होंने अपनी खेती के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव किया है। उन्होंने पारंपरिक खेती छोड़कर मेंथा की खेती को अपनाया, जिसने न केवल उनकी किस्मत बदली है बल्कि उन्हें एक ग्लोबल बिजनेसमैन के रूप में पहचान भी दिलाई है।

साल 2009 से शुरू हुआ सफर

परशुराम बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 2009 में पुदीने यानी मेंथा की खेती की शुरुआत की थी। शुरुआत में उन्होंने केवल एक एकड़ भूमि पर इसका परीक्षण किया। परिणाम उत्साहजनक रहे और मात्र तीन से चार महीने की अवधि के भीतर उन्हें करीब 40 क्विंटल मेंथा की पैदावार हासिल हुई। इस सफलता ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण मेंथा ऑयल की मांग कॉस्मेटिक और दवा बनाने वाली कंपनियों में साल भर बनी रहती है, जिससे बाजार की चिंता लगभग खत्म हो जाती है।

बढ़ाते गए खेती का दायरा

मेंथा की खेती में लगातार मांग और बेहतर मुनाफा देखते हुए परशुराम ने धीरे-धीरे अपने उत्पादन के दायरे को विस्तार देना शुरू किया। उन्होंने 1000 हेक्टेयर में मेंथा की खेती का कार्य शुरू किया। जैसे-जैसे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती गई, उन्होंने खेती के साथ-साथ वैल्यू एडिशन की दिशा में कदम बढ़ाया। उन्होंने अपने स्तर पर मेंथा ऑयल निकालने की यूनिट स्थापित की, जिससे वे सीधे पत्तियों से तेल निकालने का काम करने लगे। आज वे एक सफल उद्यमी के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार और सालाना कमाई

परशुराम की प्रोसेसिंग यूनिट में हर साल लगभग 1000 लीटर मेंथा ऑयल तैयार किया जाता है। उनके द्वारा उत्पादित इस तेल को संघ के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजा जाता है, जहां इसकी काफी मांग है। वे अपने इस उत्पाद को 1200 से 1500 रुपये प्रति लीटर की दर से बेचते हैं। इस व्यवसाय के जरिए वे सालाना 1500000 रुपये तक की कमाई कर रहे हैं, जो कि पारंपरिक फसलों से कई गुना अधिक है।

खेती से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी

मेंथा की फसल का चक्र तीन से चार महीने का होता है। मुख्य रूप से इसे जनवरी से मार्च के महीनों के बीच रोपित किया जाता है, लेकिन किसान चाहें तो मानसून या बरसात के समय में भी इसकी खेती की शुरुआत कर सकते हैं। कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार, प्रति हेक्टेयर अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बहुत जरूरी है। इसके लिए प्रति हेक्टेयर 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम सल्फर का उपयोग खाद के रूप में करना चाहिए। सही देखभाल करने पर प्रति एकड़ 40 से 50 क्विंटल तक मेंथा की उपज आसानी से ली जा सकती है।

क्यों है मेंथा की इतनी मांग

मेंथा यानी पुदीने का तेल अपनी औषधीय और शीतल तासीर के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि इसका उपयोग व्यापक पैमाने पर हो रहा है। कॉस्मेटिक उद्योग से लेकर बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनियां और खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों में मेंथॉल का प्रमुखता से इस्तेमाल होता है। बाजार में मौजूद इन बहुआयामी उपयोगों की वजह से मेंथा की फसल किसानों के लिए एक भरोसेमंद और आय बढ़ाने वाली नकदी फसल साबित हो रही है। परशुराम की यह सफलता की कहानी बिहार के अन्य किसानों के लिए एक बड़ी प्रेरणा है।

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