भोपाल: टायर पंक्चर जोड़कर पाले चार बच्चे, मौत के बाद भी नहीं पहुंचे वारिस, बोले- संपत्ति नहीं तो रिश्ता कैसा?

भोपाल के एक वृद्धाश्रम में पिता की मौत के बाद उनके चार बच्चों ने अंतिम संस्कार में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया। बच्चों का कहना है कि जब पिता ने उन्हें कोई संपत्ति नहीं दी, तो वे उनके अंतिम संस्कार के लिए क्यों आएं?

दर्दनाक दास्तान: एक पिता की बेबसी

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से रिश्तों को शर्मसार कर देने वाला एक ऐसा मामला सामने आया है, जो सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या आज के दौर में मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह खत्म हो चुकी हैं? यह कहानी घनश्याम राजपूत की है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन टायर पंक्चर बनाने जैसे मेहनत के कामों में बिता दिया। उन्होंने अपनी मेहनत की पाई-पाई अपने चार बच्चों को बेहतर भविष्य देने में खर्च कर दी, लेकिन जब उन्हें अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपने बच्चों के सहयोग की जरूरत थी, तो उन्हीं बच्चों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया।

जीवनभर का संघर्ष और बच्चों का क्रूर बर्ताव

घनश्याम राजपूत पिछले करीब 3 सालों से भोपाल के आनंद धाम वृद्धाश्रम में रह रहे थे। उन्होंने टायर-ट्यूब का काम करके अपने चारों बच्चों को न केवल पाला-पोसा, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए दिन-रात एक कर दिए। हालांकि, बुढ़ापे की दहलीज पर पहुँचते ही उनके बच्चों ने उनके साथ क्रूरता की हदें पार कर दीं। करीब 1 साल पहले, उन्हीं के बच्चों ने उन्हें इंदौर बस स्टैंड पर लावारिस हालत में छोड़ दिया था। उस वक्त सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से उन्हें आनंद धाम वृद्धाश्रम में आश्रय मिला था।

संपत्ति की लालच ने छीनी अंतिम विदाई

घनश्याम राजपूत ने अपने अंतिम क्षणों तक अपने बच्चों के आने की उम्मीद संजोए रखी, लेकिन 4 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई। जब वृद्धाश्रम की ओर से उनके परिजनों को सूचित किया गया, तो बच्चों की प्रतिक्रिया बेहद चौंकाने वाली और संवेदनहीन थी। बच्चों ने आने से साफ इनकार कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि जब पिता ने उनके नाम कोई संपत्ति नहीं की, तो वे उनके अंतिम संस्कार में शामिल होकर अपना समय क्यों बर्बाद करें? उन्होंने यह भी सवाल किया कि पिता ने उनके लिए किया ही क्या था।

वृद्धाश्रम की संचालिका ने बयां किया दर्द

आनंद धाम वृद्धाश्रम की संचालिका माधुरी मिश्रा ने बताया कि जब भी किसी बुजुर्ग की मृत्यु होती है, तो बच्चों के पास कॉल करना एक प्रक्रिया होती है। उन्होंने कहा कि अक्सर ऐसे मामलों में बच्चे तब सक्रिय होते हैं जब उन्हें जमीन-जायदाद या मृत्यु प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है। घनश्याम के मामले में भी यही हुआ। उनके साथ रहने वाले अन्य बुजुर्गों का कहना है कि घनश्याम हमेशा अपने बच्चों के आने का इंतजार करते थे, लेकिन उनके परिवार का कोई सदस्य उनसे मिलने नहीं आया।

क्या घटते संस्कार हैं चिंता का विषय?

यह घटना केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं है, बल्कि समाज के गिरते नैतिक मूल्यों का आईना है। इससे पहले सोनीपत में भी ऐसी ही घटना देखने को मिली थी। हाल ही में विश्व वृद्धजन दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चिंता जताते हुए कहा था कि घरों के सूने होने और वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ने की स्थिति बेहद व्यथित करने वाली है। जिस पिता ने पसीने की बूंदों से बच्चों का भविष्य सींचा, आज उसी पिता को अंतिम विदाई के लिए भी तरसना पड़ा। यह संवेदनहीनता आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा रही है।

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