UPSC सफलता की कहानी: पिता बेचते हैं चाय और नाश्ता, बेटे ने असिस्टेंट कमांडेंट बनकर बदला परिवार का भाग्य

मुजफ्फरपुर के घनश्याम जायसवाल ने विपरीत आर्थिक परिस्थितियों और कई असफलताओं के बावजूद यूपीएससी परीक्षा में सफलता प्राप्त कर असिस्टेंट कमांडेंट का पद हासिल किया है।

संघर्ष और सफलता की अनूठी गाथा

मुजफ्फरपुर के बैरिया के रहने वाले घनश्याम जायसवाल ने अपनी कड़ी मेहनत और अटूट संकल्प के बल पर एक मिसाल कायम की है। गरीबी और सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग यानी UPSC की कठिन परीक्षा को उत्तीर्ण कर असिस्टेंट कमांडेंट का पद प्राप्त किया है। यह उपलब्धि उनके परिवार के लिए गौरव का विषय है। घनश्याम के पिता शत्रुधन शाह मुजफ्फरपुर के बैरिया बस स्टैंड पर ठेले पर चाय और नाश्ते की दुकान चलाते हैं, जबकि उनकी माता गीता देवी एक गृहिणी हैं। घनश्याम सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं और घर की माली हालत का उन पर गहरा असर था, लेकिन उन्होंने इसे अपनी बाधा नहीं बनने दिया।

शिक्षा और शुरुआती दौर

घनश्याम की पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत मुजफ्फरपुर के बैरिया स्थित नथुनी भगत विद्यालय से हुई, जहाँ उन्होंने 10वीं तक की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उन्होंने रामेश्वर सिंह कॉलेज से विज्ञान संकाय में 12वीं की पढ़ाई की और आगे चलकर राजनीति विज्ञान में ऑनर्स के साथ अपना स्नातक पूरा किया। उनके मन में कॉलेज के दिनों से ही सिविल सेवा में जाने का विचार आ गया था। घनश्याम बताते हैं कि बचपन में उनका सपना था कि वे IIT में जाकर इंजीनियर बनें, लेकिन कुछ कारणों से यह सपना सच न हो सका। इसके बाद उन्होंने अपनी मेहनत की दिशा को यूपीएससी की ओर मोड़ लिया और प्रशासनिक सेवा में अपना करियर बनाने का निश्चय किया।

असफलताओं से होकर गुज़रा सफर

घनश्याम का यूपीएससी तक पहुंचने का रास्ता कतई आसान नहीं था। उन्होंने अपनी इस कामयाबी से पहले लंबा संघर्ष देखा है। उन्होंने बताया कि इस दौरान उन्हें करीब 10 से अधिक अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं में नाकामी का मुंह देखना पड़ा। यहां तक कि यूपीएससी की मुख्य परीक्षा के लिए उन्होंने 6 प्रयास किए, लेकिन हर बार उन्हें सफलता से वंचित रहना पड़ा। कुल मिलाकर, उनकी यह जीत लगभग पांच वर्षों की कठिन तपस्या और निरंतर प्रयासों का फल है। उन्होंने खुद पर विश्वास बनाए रखा और हार मानने के बजाय हर असफलता से कुछ न कुछ नया सीखने का प्रयास किया।

कोचिंग से मिली आर्थिक मजबूती

कोविड महामारी के बाद के दौर में जब परिस्थितियां और चुनौतीपूर्ण हो गईं, तो घनश्याम ने अपना खर्च निकालने के लिए बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। वे 12वीं तक के छात्रों को ट्यूशन पढ़ाते थे। इस काम से न केवल उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली, बल्कि बच्चों को पढ़ाने के दौरान उनके खुद के विषय भी मजबूत होते गए। पढ़ाते-पढ़ाते रिवीजन करने का यह तरीका उनके लिए काफी कारगर साबित हुआ। आज घनश्याम जायसवाल की यह कहानी उन हजारों युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत है, जो आर्थिक तंगी के चलते अपने सपनों को पूरा करने से डरते हैं। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर व्यक्ति के इरादे बुलंद हों, तो असफलताएं केवल मंजिल तक पहुंचने की सीढ़ियां बनकर रह जाती हैं।

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