देवघर की गलियों में दिखा आस्था का अनूठा दृश्य
झारखंड के देवघर में इन दिनों सावन की फुहारों के बीच बाबा बैद्यनाथ की भक्ति का एक अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। कांवरिया पथ पर वैसे तो हर साल लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था व्यक्त करने आते हैं, लेकिन इस बार एक ऐसी विशाल कांवर आकर्षण का मुख्य केंद्र बनी है जिसे देखकर लोग ठहरने पर मजबूर हो गए हैं। यह कोई सामान्य कांवर नहीं है, बल्कि 54 फीट लंबी एक विशालकाय संरचना है। बाबा बैद्यनाथ के दरबार तक पहुंची इस कांवर के साथ 500 भक्तों का एक बड़ा जत्था भी शामिल है, जो पूरी यात्रा के दौरान निरंतर बोल बम और हर-हर महादेव के जयकारों से वातावरण को शिवमय बनाए हुए है।
साधारण कांवर से कई गुना बड़ी है यह आस्था
सामान्य तौर पर श्रद्धालु जो कांवर लेकर चलते हैं, उनकी लंबाई अमूमन 4 से 7 फीट तक होती है। इन्हें संभालना कांवरियों के लिए सहज होता है, लेकिन 54 फीट की यह कांवर अपने आप में एक चुनौती और श्रद्धा का प्रतीक दोनों है। इसे संतुलित रखना और कच्ची कांवरिया पथ पर आगे बढ़ाना कोई मामूली काम नहीं है। इस कांवर की खासियत यह है कि इसे एक साथ 9 कांवरिए अपने मजबूत कंधों पर उठाते हैं। ये श्रद्धालु बारी-बारी से कांवर को संभालते हैं और पूरी यात्रा के दौरान परस्पर सहयोग की भावना के साथ आगे बढ़ते हैं।
18 वर्षों से जारी है परंपरा
पटना सिटी के महारुफगंज निवासी रोशन कुमार ने इस यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि यह कोई पहली बार नहीं है, बल्कि वर्ष 2008 से उनकी टोली लगातार इसी 54 फीट लंबी कांवर के साथ बाबा बैद्यनाथ धाम की यात्रा कर रही है। पिछले 18 वर्षों से वे इस कठिन यात्रा को पूर्ण करने का संकल्प निभा रहे हैं। इस विशाल जत्थे में कुल 500 श्रद्धालु शामिल हैं जो कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। हालांकि कांवर को एक बार में केवल 9 लोग ही उठा सकते हैं, लेकिन कुछ दूर चलने के बाद ये कांवरिए बदल जाते हैं, जिससे सभी को भगवान शिव की सेवा का अवसर प्राप्त होता है।
सजावट में दिखता है शिव परिवार
इस कांवर की विशालता के अलावा, इसकी सजावट भी भक्तों को मंत्रमुग्ध कर रही है। इसे तैयार करने में कारीगरों को लगभग 48 घंटे का समय लगा है। कांवड़ के भीतर चांदी से निर्मित भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बेहद खूबसूरती से स्थापित की गई हैं। इसे देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो साक्षात शिव परिवार अपने भक्तों के साथ देवघर के दर्शन करने निकल पड़ा हो। रास्ते में जहां से भी यह कांवड़ गुजरती है, वहां स्थानीय लोग और अन्य श्रद्धालु रुककर इसे नमन करते हैं और इसके दर्शन करना अपना सौभाग्य समझते हैं।
सेवा और भक्ति का अनूठा संगम
श्रद्धालुओं का अडिग विश्वास है कि इस विशाल कांवर को कंधा देना मात्र एक शारीरिक कसरत नहीं है, बल्कि यह बाबा भोलेनाथ के प्रति उनकी गहरी सेवा और सच्ची भक्ति है। वे मानते हैं कि जो भी पूरी निष्ठा के साथ इस कांवर को सहारा देता है, बाबा बैद्यनाथ उसकी हर मनोकामना को अवश्य पूरा करते हैं। जब मन में अटूट श्रद्धा होती है, तो रास्ते की दूरियां, कांवर का भारी वजन और कठिन मार्ग भी भक्तों को बहुत आसान लगने लगते हैं। 500 भक्तों का यह समूह अपनी एकता, आपसी तालमेल और भगवान के प्रति समर्पित भाव के साथ बाबा धाम पहुंचा है।
आस्था की अटूट मिसाल
यह 54 फीट की विशाल कांवर केवल अपनी लंबाई के रिकॉर्ड के लिए नहीं, बल्कि आपसी सहयोग और धर्म के प्रति अटूट आस्था का संदेश देने के लिए भी चर्चा में है। इस यात्रा को निर्धारित समय के भीतर पूरा करने के लिए कांवरियों ने जो अनुशासन और दृढ़ता दिखाई है, वह अन्य श्रद्धालुओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है। सावन के इस पावन अवसर पर कांवरिया पथ पर गूंजते शिव के जयकारे और इस अनोखी कांवड़ का दृश्य देवघर की यात्रा को और भी अधिक यादगार बना रहा है।
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