10 अगस्त 1947: दिल्ली में तिरंगे पर नेहरू की दलील और कराची में जोगेंद्रनाथ मंडल पर जिन्ना की मेहरबानी

10 अगस्त 1947 के दिन भारत और पाकिस्तान के विभाजन की पृष्ठभूमि में दिल्ली और कराची में दो बड़ी राजनीतिक घटनाएं घटी थीं, जिसने इतिहास की दिशा बदल दी।

दिल्ली में तिरंगे और यूनियन जैक की जुगलबंदी

10 अगस्त 1947 का दिन इतिहास के पन्नों में बेहद अहम है। उस समय दिल्ली में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया चल रही थी। उस दौरान जवाहरलाल नेहरू और माउंटबेटन के बीच एक विशेष विषय पर चर्चा हुई थी, जिसमें यह तय किया जाना था कि भारत के नए राष्ट्रध्वज के साथ यूनियन जैक को किस प्रकार फहराया जाएगा। नेहरू ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कई बातें कहीं, जो उस समय के बदलते राजनीतिक समीकरणों को दर्शाती थीं।

कराची में जोगेंद्रनाथ मंडल का उभार

दूसरी ओर, कराची में भी राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर थी। उसी दिन मोहम्मद अली जिन्ना ने जोगेंद्रनाथ मंडल के प्रति अपना विशेष झुकाव प्रदर्शित किया। जिन्ना ने उन पर अपनी कृपा दृष्टि दिखाते हुए उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी। यह घटनाक्रम उस समय के पाकिस्तान के गठन और वहां की राजनीति में दलित प्रतिनिधित्व के दावों के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया था।

दो अलग दिशाओं में बढ़ते कदम

एक तरफ दिल्ली में नेहरू एक स्वतंत्र राष्ट्र की पहचान को लेकर कूटनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास कर रहे थे, तो दूसरी तरफ कराची में जिन्ना अपनी नई सरकार को आकार देने के लिए जोगेंद्रनाथ मंडल का सहारा ले रहे थे। इन दोनों घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि आने वाले समय में भारत और पाकिस्तान के बीच किस प्रकार की अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं काम करेंगी। इन घटनाक्रमों का विश्लेषण आज भी इतिहासकार बारीकी से करते हैं क्योंकि इनसे उन परिस्थितियों का पता चलता है, जिनमें दो अलग राष्ट्रों का जन्म हुआ था।

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