मां के साथ दुष्कर्म का मामला: 10 साल तक जेल में काटने के बाद आरोपी बरी, हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने एक व्यक्ति को मां से दुष्कर्म के आरोप से बरी कर दिया है। ट्रायल कोर्ट द्वारा उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद यह आरोपी 10 साल से सलाखों के पीछे था, लेकिन सबूतों के अभाव में अब उसे रिहा कर दिया गया है।

ग्वालियर में न्याय की बड़ी जीत

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने एक ऐसे मामले में फैसला सुनाया है जिसने कानूनी हलकों में चर्चा छेड़ दी है। मां के साथ दुष्कर्म जैसे गंभीर आरोपों का सामना कर रहे एक आरोपी को हाई कोर्ट ने साक्ष्यों की कमी के चलते बरी कर दिया है। यह व्यक्ति करीब 10 साल से जेल में अपनी सजा काट रहा था। निचली अदालत ने वर्ष 2017 में उसे दोषी पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे अब उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है।

घटना में देरी और संदेहास्पद परिस्थितियां

कानूनी दस्तावेजों और अदालत की सुनवाई के अनुसार, आरोपी 9 मई 2016 से लगातार जेल में बंद था। मामले की जांच के दौरान सामने आया कि जिस घटना के लिए उसे दोषी माना गया था, उसकी प्राथमिकी (FIR) घटना के 2 महीने बाद दर्ज की गई थी। इतने लंबे अंतराल ने मामले की सत्यता पर सवाल खड़ा कर दिया। हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि दुष्कर्म जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़िता के बयान को सजा का आधार बनाया जा सकता है, बशर्ते वह बयान पूरी तरह से सुसंगत, भरोसेमंद और तार्किक हो। इस मामले में पीड़िता के बयान और अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए अन्य गवाहों के बयानों में भारी विरोधाभास पाया गया।

गवाहों की विश्वसनीयता और सबूतों का अभाव

अदालत ने पाया कि जिन गवाहों ने आरोपी के विरुद्ध गवाही दी थी, उनके संबंध पहले से ही आरोपी के साथ तनावपूर्ण थे। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ने एक मोबाइल रिकॉर्डिंग का भी दावा किया था, लेकिन वह रिकॉर्डिंग कभी भी अदालत के सामने पेश नहीं की जा सकी। साक्ष्यों के नाम पर अदालत को कोई भी ऐसा ठोस सबूत नहीं मिला, जिसके दम पर आरोपी को दोषी ठहराया जा सके। हाई कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि महज संदेह के आधार पर किसी भी व्यक्ति को अपराधी करार नहीं दिया जा सकता है।

संदेह का लाभ और रिहाई के निर्देश

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत पेश करने में पूरी तरह विफल रहा है। कानून का बुनियादी सिद्धांत है कि जब तक अपराध पूरी तरह से सिद्ध न हो जाए, आरोपी को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) मिलना चाहिए। इसी आधार पर न्यायालय ने आरोपी को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया है, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। 10 साल का लंबा समय सलाखों के पीछे बिताने के बाद, अब आरोपी को अदालती प्रक्रिया से बड़ी राहत मिली है। यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि न्यायिक प्रणाली में निष्पक्ष जांच और ठोस सबूतों का होना कितना महत्वपूर्ण है।

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